नोटबंदी की सियासत में पीछे छूटे गरीबों के सवाल

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नोटबंदी के ‘ब्लैक-होल’ में फंसी देश की इकॉनामी पर होने वाले ‘सोशियो-इकॉनामिक’ रेडिएशन के प्रभावों से जुड़े सवालों के दो पाटो के बीच वह गरीब पिस रहा है, जिसके नाम पर नोटबंदी के उपाय को लागू किया गया था। लोगों की उम्मीदें दरकने लगी हैं। सरकार टूटते तारों की पूंछ से बंधी रोशनी से लोगों को चमत्कृत करना चाहती है, लेकिन आतिशबाजी के पीछे दौड़ते अंधेरे आतंक पैदा कर रहे हैं। ‘ब्लैक-होल’ थ्योकरी से जुड़े अनेक अनबुझे सवालों की तरह ही नोटबंदी के नफा-नुकसान का गणित भी शून्य से जूझता नजर आ रहा है। नोटबंदी पर हावी सियासत ने उन सवालों को धुंधला दिया है, जिन्हें सबसे पहले एड्रेस किया जाना चाहिए।
नोटबंदी के निहित उद्देश्यों की सूची में आतंकवाद और नक्सली गतिविधियों पर नियंत्रण के अलावा नकली नोटो का खात्मा भी था। आखिर में कैशलेस इकॉनामी भी इसका हिस्सा बन गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े कहते हैं कि बजरिए नोटबंदी, काले धन को स्वाहा करने के उद्देश्यों को हासिल करने में मोदी-सरकार असफल रही है। आतंकवाद की मुसीबतें भी कम नहीं हुई हैं। भाजपा दावे जरूर कर रही है कि उसने नोटबंदी के लक्ष्यों को पा लिया है, लेकिन सरकार के पास वो पुख्ता आंकड़े मौजूद नहीं हैं, जो यह विश्वास पैदा कर सकें कि नोटबंदी लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल कर लिया गया है। नोटबंदी के आर्थिक पहलुओं को नजरअंदाज करके मोदी-सरकार ने इसे राजनीतिक औजार के रूप में ज्यादा इस्तेमाल किया है। उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा की भारी-भरकम जीत के गरूर में वो सभी सवाल बौने हो गए, देश की अर्थ-व्यवस्था के लिहाज से जिनके उत्तर तत्काल ढूंढे जाना जरूरी था।
लोकसभा में चर्चा करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि विमुद्रीकरण के कारण देश की विकास-दर में 2 प्रतिशत तक गिरावट हो सकती है। सिंह ने मोदी के इस कदम को देश की संगठित लूट और कानूनी डाका निरूपित किया था। मोदी ने ‘हार्वर्ड यूनिवर्सिटी’ और ‘हार्ड-वर्क’ यूनिवर्सिटी के नाम पर खिल्ली उड़ाते हुए मनमोहन सिंह के बयान को खारिज कर दिया था। साल भर बाद लोग मनमोहन सिंह के ऑब्जर्वेशन्स को गंभीरता से सुन और मान रहे हैं, जबकि मोदी-सरकार की बेरुखी और अनदेखी ने खुद प्रधानमंत्री के शब्दों को कमजोर किया है। उनकी सभाओं में मोदी-मोदी की अनुगूंज में शामिल विश्वास के तत्व बिखरने लगे हैं। नोटबंदी के समर्थन में सरकारी मशीनरी की समूची आंकड़ेबाजी बेअसर साबित हो रही है।
सोमवार को सीएनबीसी-टीवी 18 के साथ एक इंटरव्यू में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि व्यापार-व्यवसाय और गरीबों पर नोटबंदी की गहरी चोट का अंदाजा आर्थिक-आंकड़ों या इंडिकेटर से नहीं लगाया जा सकता। नोटबंदी पर सियासत अब बंद होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी भूल को मान लेना चाहिए और देश की अर्थ-व्यवस्था में जान फूंकने के लिए सबका सहयोग लेना चाहिए।
सही-गलत के सांचों में नोटबंदी से जुड़ी प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक-परिकल्पनाओं का आकलन निकट भविष्य में संभव नहीं है। इसका लाभ उठाते हुए मोदी ने नोटबंदी को गरीबी और अमीरी की मायावी लड़ाई में तब्दील कर दिया है। यह उनके लिए फायदेमंद राजनीतिक-सौदा है। देश के लिए नोटबंदी भले ही लाभदायक सिध्द नहीं हो, लेकिन भाजपा को इसका राजनीतिक-लाभांश मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के बाद अब भाजपा गुजरात में इसका इस्तेमाल कर रही है। नोटबंदी का राजनीतिक-इस्तेमाल देश के लिए घातक है। नोटबंदी बड़ा आर्थिक निर्णय था, जिसकी बुनियाद को सर्वसम्मत बनाना जरूरी था। भाजपा सरकार ने सबके साथ मिलकर समस्या का निदान खोजने में कभी भी दिलचस्पी नहीं ली है। साल भर बाद भी लोग उन गुमनाम चेहरों से अनभिज्ञ हैं, जिनके भरोसे यह फैसला किया गया था। मनमोहन सिंह ने नोटबंदी पर सियासत बंद करने का सुझाव दिया है। राजनीतिक-सफलताओं के सुरूर में गाफिल भाजपा मानने को तैयार नहीं है कि लोग तकलीफ में हैं।

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