पनामा का ‘सीक्वल’ पैराडाइज-लीक्स :  काले कुबेरों की नई कहानी…

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अप्रैल 2016 में पनामा पेपर्स के खुलासे के बाद से, मल्टी एजेंसी इन्वेस्टीगेशन की रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठी मोदी-सरकार के सामने पैराडाइज दस्तावेजों की ताजा रिपोर्ट बीन बजाते हुए कोबरा-डांस करने लगी है। पैराडाइज दस्तावेजों में कई नामी-गिरामी नाम सवाल बनकर सामने खड़े हैं। ब्यो,रा सोमवार को सुर्खियों में आया है। भारत में पनामा पेपर्स का अफसाना अप्रैल 2016 को उजागर हुआ था। सवा साल बाद पैराडाइज दस्तावेजों के जरिए काले धन के व्यवस्थापन की काली कहानी फिर सुर्खियों में है। दोनों खुलासे की सूत्रधार ‘इंटरनेशनल कन्सॉर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट’ (आईसीआईजे) नामक संस्था है, जिसमें 100 से ज्यादा मीडिया-समूह शरीक हैं। मीडिया-समूहों के खोजी पत्रकारों ने 100 से ज्यादा देशों में काले धन के व्यवस्थापन के काले धंधे को सूचीबद्ध किया है। पनामा पेपर्स ने बताया था कि पनामा देश में फर्जी कम्पनियों और मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए अरबों रुपये विदेशी बैंको में जमा करके बेहिसाबी पैसे को वैधानिकता देने की कोशिशें की गईं। पनामा-लीक्स में 2.14 लाख प्रतिष्ठानों के 1.15 लाख दस्तावेजों की जांच की गई थी। पनामा-पेपर्स में भारत की 500 हस्तियों के नाम काले धन और टैक्स-चोरी के आरोपियो में शरीक थे। इस मर्तबा इन खोजी पत्रकारों ने 1.34 करोड़ दस्तावेजों को खंगाल कर काले धन की कहानी का खुलासा किया है। पैराडाइज लीक्स में भारत के 714 धनपतियों के नाम हैं। काले धन की कहानियों के सिरों को पकड़ कर हम पैराडाइज दस्तावेज को पनामा लीक्स का सीक्वल मान सकते हैं।

पनामा-लीक्स में केन्द्र-सरकार की कार्रवाई अभी तक सामने नहीं आई हैं, जबकि पनामा पेपर्स में नाम होने के कारण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस्तीफा देना पड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी के सामने सोशल-मीडिया के ये सवाल अभी तक अनुत्तरित हैं कि पाकिस्तान जैसे देश में इतनी बड़ी कार्रवाई हो सकती है, तो मोदी-सरकार अभी तक हाथ पर हाथ धरकर कैसे और क्यों बैठी है?

पनामा-लीक्स की जांच-पड़ताल के लिए मोदी-सरकार ने मल्टी एजेंसी ग्रुप बनाया था, जिसके जिम्मे 11,010 करोड़ रुपयों की ब्लैनक-मनी की जांच थी। पनामा-लीक्स में उद्योग, राजनीति और फिल्म जगत की हस्तियों में बड़ा और चर्चित नाम अमिताभ बच्चन का था, जो पैराडाइज-लीक्स में भी सुर्खियां बटोर रहे हैं। पनामा-लीक्स में अमिताभ के अलावा ऐश्वर्या राय बच्चन, फिल्म अभिनेता अजय देवगन, छत्ती सगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, गौतम अडानी के भाई विनोद अडानी जैसी हस्तियों के नाम शामिल थे। पैराडाइज-लीक्स में अमिताभ के अलावा मोदी-सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा, भाजपा सांसद आरके सिन्हा, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव-प्रभारी अशोक गेहलोत, विजय माल्या सहित कई हस्तियों के नाम शामिल हैं। लोगों की दिलचस्पी यह है कि 714 ताकतवर भारतीयों के गुप्त निवेश का खुलासा होने के बाद मोदी-सरकार कैसे ‘रिएक्ट’ करेगी ? खुलासा इस बात की तस्दीक करता है कि कार्पोरेट-जगत के धनपति, प्रभावशाली राजनेता, अमीर लोग फर्जी कंपनियों, ट्रस्ट या फाउंडेशन के माध्यम से अपने लेन-देन को छिपाकर कर-अपवंचन करके काला धन पैदा करते हैं।

काले धन की राजनीति की दिन-रात दुहाई देने वाली मोदी-सरकार ने पनामा-लीक्स के नाम पर कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं की है, जबकि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का पूरा परिवार जांच के दायरे में है। प्रधानमंत्री मोदी ने अप्रैल 2016 में पनामा-मामले में 15 दिनों में जांच-रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे। सवा साल की अवधि बीत जाने के बाद भी सरकार मल्टी एजेंसी इन्वेस्टीगेशन व्दारा की गई कार्रवाइयों के बारे में चुप है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र-सरकार को निर्देश दिए थे कि वो मल्टी एजेंसी इन्वेस्टीगेशन व्दारा सरकार को सौंपी गई रिपोर्टों के आधार पर स्टेट्स-रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखे। लेकिन अभी तक स्टेटस पता नहीं चल सका है।

टैक्स-हैवन माने जाने वाले देशो में खाते खोलने का एकमात्र उद्देश्य कानून की खामियों के सहारे कर-अपवंचन करना होता है। देश के बैंकिंग-सिस्टम और कर प्रणाली को लांघ कर देश के कोष को नुकसान पहुंचना होता है। काले धन के काले समुन्दर के इन महाबली तैराकों को पकड़ना आसान नहीं है। पनामा-लीक्स की तरह इस मर्तबा भी लोग कह रहे हैं कि उनके वित्तीय लेनदेन में कुछ भी अनियमित नहीं है। इन काले-कुबेरों से यह पूछना जरूरी है कि यदि सब कुछ ठीक है,तो हजारों करोड़ का यह खजाना गरीब हिन्दुस्तान की बैंकों की तिजोरियों के बजाय टैक्स-हैवन कहलाने वाले मुल्कों में क्यों रखा है?

 

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