प्रदूषण से बचने के लिये पराली का भूसा और खाद बनाने का सुझाव

नयी दिल्ली। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय पंजाब में फसल कटने के बाद पराली जलाए जाने के धुंये से दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण जनित धुंध की समस्या के समाधान के लिये पराली के बहुद्देशीय उपयोग की कार्ययोजना पर काम कर रहा है। नीति आयोग और सीआईआई की संयुक्त रिपोर्ट में पराली के व्यवसायिक और घरेलू इस्तेमाल की कार्ययोजना पेश की गयी है। पर्यावरण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ए के मेहता की अगुवायी में नीति आयोग और सीआईआई के संयुक्त कार्यबल ने पंजाब में पराली के बहुउपयोग के तरीके सुझाते हुये इस बाबत कार्ययोजना पेश की है। इसमें हर साल सर्दी शुरू होने से पहले दिल्ली के प्रदूषण का कारण बनने वाली धान की फसल की पराली को जलाने से किसानों को रोकने के लिये इसके दो उपयोग सुझाये गये हैं। पहला, पराली का भूसा बनाकर इसका व्यवसायिक इस्तेमाल करने और दूसरा, पराली से खाद बना कर किसानों को इस्तेमाल के लिये वितरित करना बेहतर तरीके हैं।

कार्यबल ने दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में हवा की गुणवत्ता के खराब होने में पराली की भूमिका के प्रभावों का पिछले साल नवंबर में अध्ययन शुरू किया था। इस साल जून तक चले अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल फसल की कटाई से 60 करोड़ टन फसल अवशेष निकलता है। इसमें पंजाब में हर साल धान की पराली की हिस्सेदारी दो करोड़ टन है। समिति ने पराली जलाने की किसानों की मजबूरी को स्वीकार करते हुये इसका बहुउपयोग सुनिश्चित करने के लिये उद्योग जगत से इसमें सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत पर बल दिया है। समिति ने मसौदा रिपोर्ट में पराली की किसानों से खरीद सुनिश्चित करने और आद्योगिक इकाईयों को बेच कर इसके बहुउपयोग के उपाय सुझाये हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक पराली का भूसा, रासायनिक उद्योगों के अलावा ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र की औद्योगिक इकाईयों में विभिन्न कार्यों में इस्तेमाल में आता है। सरकार को औद्योगिक इकाईयों के सामंजस्य से पंजाब में खेत पर ही किसानों से पराली की उचित दाम पर खरीद सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया है। यह कीमत कम से कम पराली काटने के लिये मजदूरी पर होने वाले व्यय के बराबर रखने का उपाय बताया गया है। इस बारे में भारतीय किसान सभा के महासचिव अतुल अंजान की अगुवाई में किसानों के समूह ने पंजाब का दौरा कर किसानों के सहयोग से ही इस समस्या के समाधान निकालने की पहल की। उन्होंने इस रिपोर्ट से इत्तेफाक जताते हुये कहा कि पंजाब में धान की अक्तूबर में कटाई के बाद किसानों के पास गेंहू की बुआई के लिये महज दो सप्ताह का समय बचता है। पराली को कटाने पर किसान को समय और पैसे का दोहरा नुकसान होता है। ऐसे में किसान के पास धान की पराली के तत्काल निस्तारण का एकमात्र विकल्प इसे जलाना ही बचता है।

अंजान ने सरकार को पराली की कटाई को मनरेगा की कार्यसूची में शामिल करने का सुझाव देते हुये कहा कि इससे पंजाब में बेरोजगार बैठे लाखों खेतिहर मजदूरों से किसान पराली की कटाई करा सकेंगे। इसका दोहरा लाभ, बेरोजगारी और पर्यावरण संकट के समाधान के रूप में होगा। कार्यबल ने हालात का व्यवहारिक अध्ययन करने के लिये इलाके में किसानों की मौजूदा कार्यप्रणाली का जायजा लेने के बाद मसौदा रिपोर्ट तैयार की है। इसमें किसान और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से समस्या और समाधान के हरसंभव पहलुओं पर विचार विमर्श के आधार पर कार्ययोजना पेश की गई है। कार्यबल के समक्ष किसानों ने यह स्वीकार किया कि पराली जलाना, अगली फसल के लिये खेत तैयार करने की उनकी तात्कालिक मजबूरी है।

किसान इस बात से वाकिफ हैं कि जली हुयी पराली की राख दीर्घकाल में मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम करती है। रिपोर्ट में फसल अवशेष के आर्थिक और वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिये सरकार और उद्योग जगत की साझा पहल को जरूरी बताया गया है। इसके लिये दो सूत्रीय कार्ययोजना भी पेश की गयी है। पहला, रासायनिक, ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां सामूहिक स्तर पर किसानों से पराली की कटाई कर एकत्र करने के बाद इसका औद्योगिक इस्तेमाल करें। दूसरा उपाय छोटे या मझोले किसान पराली को खेत की जुताई करते हुये मिट्टी में ही दबा रहने दें जिससे यह खाद बन कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ायेगी।

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