मप्र का 62 वां स्‍थापना दिवस : हमें चाहिए मुक्ति का राग ‘शिवरंजनी’

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राग शिवरंजनी को कोमल रागों में गिना जाता है। इस राग की यह खूबी है कि इसके माध्‍यम से कोमल मनोभावों और दर्द की अनुभूति दोनों को अभिव्‍यक्‍त किया जा सकता है। चिकित्‍सा में रागों के प्रयोग के हिमायती विश्‍लेषकों का मानना है कि यह राग याददाश्‍त बढ़ाने में उपयोगी है। मप्र के स्‍थापना दिवस के मौके पर इस राग का जिक्र इसलिए कि प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने विकास का एक स्‍वप्‍न देखा है। अपने इस मधुर स्‍वप्‍न को पूरा करने के लिए उन्‍होंने शासन-प्रशासन की अपनी टीम को मध्यप्रदेश के भविष्य और विकास का रोडमैप बनाने का जिम्‍मा दिया है। वरिष्‍ठ मंत्रियों तथा अफसरों की समितियों ने अपने कौशल के आधार पर प्रदेश को गंदगी मुक्त बनाने, भ्रष्टाचार मुक्त बनाने, आतंकवाद और गरीबी मुक्त बनाने के साथ महिला सशक्तिकरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सरल व्यापार, पेयजल, हर घर में बिजली, किसानों की आय दोगनी करने, गौवंश सुरक्षा, कैशलेस ट्रांजेक्शन जैसे विषयों पर रोडमैन बना लिया है। मुख्‍यमंत्री के निर्णय के अनुसार स्‍थापना दिवस पर यह रोडमैप जनता को समर्पित किया जाएगा। यहां तक तो सबकुछ मधुर है मगर यदि ‘तंत्र’ और ‘जन’ यदि इस स्‍वप्‍न को आत्‍मसात नहीं कर पाया तो राग शिवरंजनी का दूसरा पक्ष (दर्द की अभिव्‍यक्ति) मुखर हो उठेगा।

क्‍यों चाहिए हमारी भागीदारी?

मप्र ने बीते कुछ सालों में तरक्‍की के हर पायदान पर रिकार्ड तोड़ उपस्थिति दर्ज की है। मसलन, गत 14 वर्षों में सिंचाई क्षेत्र 7 लाख हेक्टेयर से बढ़ कर 40 लाख हेक्टेयर हुआ है। लाड़ली लक्ष्मी योजना, सायकिल प्रदाय योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना सहित प्रदेश की कई योजनाएं अब अन्य राज्यों में लागू की जा रही है। मध्यप्रदेश देश में दलहन, तिलहन, चना, मसूर, सोयाबीन, अमरूद, टमाटर और लहसुन उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। गेहूँ , अरहर, सरसों, आंवला, संतरा, मटर और धनिया उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। मध्यप्रदेश का वर्ष 2004-05 में कृषि उत्पादन 2.14 करोड़ मीट्रिक टन था जो वर्ष 2016-17 में बढ़कर 5.44 करोड़ मीट्रिक टन हो गया है। मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है, जिसने प्रदेश के नागरिकों को समय-सीमा में सेवाएँ प्रदान करने की कानूनी गारंटी प्रदान की है। इसके बाद 20 अन्य राज्यों ने भी इस तरह के कानून को अपने राज्यों में क्रियान्वित किया है। तकनीकी संस्थाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2003 की तुलना में इंजीनियरिंग कालेज 63 से बढ़कर 187, पालीटेक्निक कालेज 44 से 151 और आई.टी.आई. 159 से बढ़कर 1038 हो गयी हैं।

मगर, ये उपलब्धियां कागजी महसूस होती हैं, जब हम देखते हैं कि इस तरक्‍की के बाद भी जनता के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं।कृषि विकास दर 20 होने के बाद भी किसान क्‍यों असंतुष्‍ट हैं? क्‍यों डेढ़ दशक में 15 हजार से अधिक किसानों ने आत्‍महत्‍या की है? शिक्षा संस्‍थानों की बाढ़ के बाद भी क्‍यों अच्‍छे इंजीनियरों व डॉक्‍टरों, कुशल श्रमिक की कमी है? क्‍यों हमारी शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं गुणवत्‍तापूर्ण नहीं है? क्‍यों भ्रष्‍टाचार की दर घोषित रूप से बढ़ रही है?

क्‍यों प्रदेश के किसी सार्वजनिक कार्य में समाज और नागरिकों की ईमानदार भागीदारी महसूस नहीं होती? मुनाफे के लालच के कारण हमारे यहां पेटलावद जैसी घटनाएं होती हैं जहां अवैध विस्‍फोटक के फटने से करीब सौ लोगों ने जान गंवा दी थी। हम नर्मदा सहित अन्‍य नदियों में अवैध उत्‍खनन करते हैं। निर्लजता से वन्‍य और खनिज संपदा, भूजल का दोहन करते हैं, फसलों को कीटनाशकों और दूध को रासायनिक इंजेक्‍शनों से जहरीला बनाते हैं। शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं नहीं देते, व्‍यापार करते हैं। यही कारण है कि मुख्‍यमंत्री शिवराज की चाहत के अनुरूप प्रदेश का स्थापना दिवस एक दिन की गतिविधि अथवा औपचारिकता न रहकर जन आंदोलन बनना चाहिए। पहले तो प्रदेश के विकास का रोडमैप ईमानदारी से बनना चाहिए और फिर हर नागरिक को इससे जुड़ना चाहिए। तभी वह स्‍वप्‍न पूरा होगा जिसका आज संकल्‍प लिया जा रहा है।

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