राहुल के ‘राजनीतिक-मोमेण्टम’ में ‘हार्डकोर’ हिन्दुत्व का ‘स्पीड-ब्रेकर’

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दिल्ली में 20 नवम्बर को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के बाद राहुल गांधी घोषित तौर पर अब कांग्रेस के सुप्रीम कमॉण्डर हैं। उनके अध्युक्ष बनने की अब औपचारिकता ही शेष है। राहुल अपने और कांग्रेस के सबसे बुरे दौर में संगठन की कमान संभाल रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के नाते राहुल गांधी के सामने कांग्रेस की राजनीतिक-बहाली की गंभीर चुनौतियां मौजूद है। कांग्रेस के लिए बुरा वक्त इसलिए है कि राजनीतिक रूप से वह जनता के बीच आरोपों के कठघरे में खड़ी है। उसकी मान्यताओं पर सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व जनता का मूड भांपने में लगातार असफल रहा है। भाजपा ने देश के राजनीतिक-मिजाज को बदल दिया है। सेक्युलर राजनीति की थ्यो री अब जनता पढ़ने और सुनने को तैयार नहीं है। चुनाव की जमीन पर मुसलमानों का राजनीतिक-वजूद धुंआ उगल रहा है। सामाजिक समरसता और समन्वय जैसे मुद्दे बेमतलब और गुजरे जमाने की बातों में शुमार होने लगे हैं।
और, राहुल के लिए बुरा वक्त इसलिए है कि कांग्रेस की राजनीतिक-अप्रासंगिकता और अप्रासंगिक-राजनीति के लिए उन्हें और उनके परिवार को गुनाहगार ठहराया जा रहा है। राहुल के पहले, आजाद भारत के 71 सालों में से 36 सालों तक कांग्रेस पर गांधी-नेहरू परिवार काबिज रहा है। इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के बाद चार साल (1951-1954) तक पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे। नेहरू के बाद इंदिराजी दो किश्तों में 1959-1960 और 1978-1984 के दरम्यान 7 वर्षों तक कांग्रेस-प्रमुख रहीं। इंदिराजी की हत्या के बाद के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने छह साल (1985-1991) तक कांग्रेस की कमान संभाली थी। राजीव की मौत के बाद 1998 से 2017 तक, लगातार 19 सालों से सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं। अब कांग्रेस के सुप्रीमो के रूप में राहुल गांधी के कंधों पर कांग्रेस के जीर्णोध्दार की जिम्मेदारी आई है। फिलवक्त कांग्रेस के राजनीतिक मालखाने में असफलताओं का जबरदस्त भंगार जमा है। लोकसभा में उसके सांसदों की संख्या (44) इतनी भी नहीं है कि वह औपचारिक रूप से विरोधी दल का दर्जी हासिल कर सके। केन्द्र शासित राज्यों सहित तीस प्रदेशों में बमुश्किल चार छोटे-छोटे, महत्वहीन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें काबिज हैं।
भारत में यह राजनीति का संक्रमण-काल है, जबकि 71 साल पुराने देश में ‘ऑइडियोलॉजिकल-शिफ्ट’ के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक ऐसी केन्द्र-सरकार कार्यरत है, जिसके पास अपना बहुमत है। बहुमत की ताकत के सहारे मोदी-सरकार शासन-प्रशासन और राजनीति की धुरी को 360 डिग्री तक घुमाना चाहती है। सत्ता के रूपान्तरण की यह प्रक्रिया समाज और सरकार की धाराओं को अलग-अलग रंगों में बांट रही है। राजनीति के सैध्दांतिक धरातलों पर यह बंटवारा समाज में असहजता पैदा कर रहा है। राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूपान्तरण की इस प्रक्रिया के परिणामों को आंकना तत्काल संभव नहीं है। भले ही इन प्रक्रियाओं में राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाओं के बुलबुले उठना शुरू हो गए हों लेकिन इन बुलबुलों को तूफान में बदलने की कूबत कांग्रेस के पास नहीं है। एक संगठन के नाते कांग्रेस में वह मोमेण्टम पैदा करने का सामर्थ्य नहीं है, जो परिवर्तन का सबब बनता है। सबसे पहले एक राजनेता के रूप में राहुल गांधी को इन बुलबुलों को तूफान में तब्दील करने की महारत हासिल करना होगी। ‘हार्डकोर’ हिन्दुत्व की पुख्ता राजनीतिक जमीन भाजपा का सबसे सुरक्षित और कारगर रण-क्षेत्र है। न तो कांग्रेस संगठन के बतौर इतनी मजबूत है और ना ही कांग्रेस के नीतिगत औजारों में इतनी धार है कि वो भाजपा के ‘हार्डकोर’ हिन्दुत्व की इस किले-बंदी को तोड़ सकें। ‘हार्डकोर’ हिन्दुत्व के उफानों को सॉफ्ट हिन्दुत्व के किनारों की ओर मोड़ने का उपक्रम कांग्रेस कैसे और कितना कर पाएगी, यह बड़ा सवाल राहुल के सामने मौजूद है। कांग्रेस के भीतर राहुल के सामने चुनौतियां लगभग नगण्य हैं। लेकिन कांग्रेस की आंतरिक-राजनीति को साधने के अलावा राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करना है। गुजरात के चुनाव-अभियान में राहुल के राजनीतिक-व्यक्तित्व में निखार देखने को मिल रहा है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति राजनेताओं से भिन्न किस्म की निरन्तरता और गतिशीलता की अपेक्षा करती है। राजनीति के इस ‘स्पीडोमीटर’ से लय मिलाने के लिए राहुल को अपनी ड्रायविंग-शैली को बदलना होगा।

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