सिंह के सामने मोदी के ‘राजनीतिक-एटार्नी जेटली’ क्यों उतरे?

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नोटबंदी के मामले में आर्थिक और राजनीतिक रूप से ‘डिफेंसिव-मोड’ में खड़ी मोदी-सरकार को मनमोहन सिंह की अप्रत्याशित बौध्दिक-आक्रामकता ने हतप्रभ और परेशान कर दिया है। मनमोहन सिंह के इस ऑफेंस को वो घटनाक्रम मजबूत कर रहा है, जो विमुद्रीकरण के आर्थिक-मुहानों से बह रहा है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने मनमोहन सिंह से मुकाबला करने की बागडोर अपने सबसे विश्वसनीय ‘राजनीतिक-एटॉर्नी’ वित्तमंत्री अरुण जेटली को सौंपी थी। इस तारतम्य में नोटबंदी की पहली वर्षगांठ पर अरुण जेटली और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक-शास्त्रार्थ में मनमोहन सिंह के गंभीर सवालों के जवाब में जेटली के खीज भरे तर्क बौने नजर आते हैं।
मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व के अध्येता मानते थे कि नोटबंदी की पहली सालगिरह पर प्रधानमंत्री खुद सामने आकर देश के जनमानस में घुमड़ रहे सवालों का समाधान करेंगे। तीन साल से आकाशवाणी के रेडिओ पर ‘मन की बात’ के जरिए देश से ‘मोनोलॉग’ कर रहे प्रधानमंत्री ने आश्चर्यजनक रूप से इस महत्वपूर्ण राजनीतिक-अवसर पर खुद उपस्थित होना समयोचित नहीं माना और अपने वित्तमंत्री अरुण जेटली को मैदान में उतार दिया। मोदी समझते हैं कि विमुद्रीकरण के कसीदे काढ़ने वाले सरकारी आंकड़ों का आधार पोला और पिलपिला है। बचाव की दलीलों को पुख्ता बनाने की ताकत उनमें नहीं है। आंकड़ों की कमतर और कमजोर संरचनाओं के सहारे जेटली ने जिस तरह से मनमोहन सिंह का मुकाबला किया, वो नोटबंदी की सफलताओं को सुर्ख नहीं बनाता है।
नोटबंदी के शास्त्रार्थ में 85 वर्षीय मनमोहन सिंह के भारी पड़ने की सबसे बड़ी वजह दक्ष अर्थशास्त्री के रूप में उनका ट्रैक-रिकार्ड है। 22 मई 2004 में भारत के प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह आर्थिक-सुधारों के पुरोधा माने जाते हैं। 1991 में प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक-सुधारों के युग का सूत्रपात उन्होंने ही किया था। उसके परिणाम सामने दिख रहे हैं। उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना संभव नहीं है। नोटबंदी के परिणामों का परीक्षण कर रही संसदीय समिति के सामने सिंह ने ही रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को उन सवालों का जवाब देने से रोक दिया था, जो देश-हित में नहीं थे।
लोकसभा में नोटबंदी पर बहस के दरम्यान सिंह के बयानों की पुष्टि रिजर्व बैंक और विकास-दर के आंकड़े कर रहे हैं। मोदी ने उनकी यह कहकर खिल्ली उड़ाई थी कि ‘बाथरूम में रेनकोट पहन कर नहाने का हुनर मनमोहन सिंह से सीखा जाना चाहिए, क्योंकि 26 सालों तक आर्थिक फैसले में इतने घोटाले सामने आने के बावजूद उन पर कोई दाग नहीं लगा है।’ मोदी के बयान को आमतौर पर पसंद नहीं किया गया था। नोटबंदी के साल भर बाद सिंह व्दारा कही गई हर बात सही सिध्द हो रही है। इसीलिए नोटबंदी अथवा जीएसटी की समस्य़ाओं पर उभरे सवालों पर उनकी बात को गंभीरता से सुना जा रहा है।
कांग्रेस ने सिंह को गुजरात के चुनाव प्रचार में उतार दिया है, जहां व्यापारी जीएसटी और नोटबंदी से बेहद परेशान और नाराज हैं। सिंह ने अहमदाबाद और सूरत के व्यापारियों के सामने नोटबंदी को संगठित लूट और कानूनी डाका निरूपित किया है। भाजपा आरोपों को लेकर बेचैन और असहज है कि लोग सिंह की बातों को वजनदार और गंभीर मानते हैं। भाजपा के पास सिंह के आरोपों के सटीक राजनीतिक जवाब नहीं हैं। सिंह का यह आरोप भाजपा के दोहरे चरित्र पर प्रहार करता है कि नोटबंदी और जीएसटी का सबसे ज्यादा फायदा चीन को हो रहा है। पिछले एक साल में भारत में चीन का आयात 23 प्रतिशत बढ़कर 1.96 लाख करोड़ से 2.41 लाख करोड़ हो गया है। ये तथ्य लोगों के दिलों में घर करते हैं। इससे विचलित जेटली मनमोहन सिंह के नैतिक धरातलों पर प्रहार करते हैं। जेटली का कहना है कि 2जी, राष्ट्रमंडलीय खेल घोटाले और कोयला-आवंटन के जरिए देश को लूटने वाली कांग्रेस को नोटबंदी पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है। राजनीति की फौरी-जरूरतों के मान से मनमोहन सिंह और अरुण जेटली की दलीलों का अपना-अपना भाजपाई और कांग्रेसी मोल है, लेकिन झूठ-सच के इस राजनीतिक फरेब में जनता गफलत का शिकार होती रहती है। उसे सिर्फ बाबाजी का ठुल्लू ही हासिल होता है…।

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