127वीं जयंती पर जवाहरलाल नेहरू को कैसे याद किया जाए…

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आजादी की पौ फटने के साथ उगे हम जैसे तटस्थ हिन्दुस्तानियों के लिए यह नामुमकिन है कि वह उन पंडित जवाहरलाल नेहरू को, जिन्हें उनका समूचा बचपन चाचा नेहरू के नाम से जानता और दुलारता रहा है, बदनामी के उन तौर-तरीकों या बोझिल और बेहया हर्फों के साथ याद करें, जो आजकल उनके बारे में सुनियोजित तरीके से सोशल-मीडिया पर ट्रोल होते रहते हैं। ज्यादातर लोग उन्हें, सर्व-समावेशी, दूरद्रष्टा लोकतांत्रिक नेता अथवा भिलाई स्टील प्लाण्ट, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड, बालको, भाखरा नंगल बांध, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेण्टर, आयटीआय या एम्स जैसे सार्वकालिक सार्वजनिक उपक्रमों के प्रवर्तक या संस्थापक के नाते पहचानते हैं। यदि वर्तमान सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता-आंदोलन की मान्य अवधारणाओं के अनुरूप नेहरू को याद करना पसंद नहीं करते हैं अथवा कांग्रेस की ‘लीगेसी’ को नकारना चाहते हैं, तो यह भी संभव नहीं है कि लोग नेहरू के योगदान की उस स्क्रिप्‍ट को स्वीकार करें, जो भाजपा या उसके प्रवर्तक सोशल-मीडिया पर प्रस्तुत कर रहे हैं। बेहतर होता कि हम नेहरू को कांग्रेस या भाजपा के चश्मे से देखने के बजाय सिर्फ नेहरू की तरह देखते और परखते।

आधुनिक भारत के निर्माता और स्वप्नद्रष्टा के रूप में नेहरू के योगदान को खारिज करना संभव नहीं है। देश की आजादी का ऐतिहासिक-श्रेय़ छुटपुट विवादों और अपवादों को छोड़कर मुकम्मिल तौर पर महात्मा गांधी के नाम दर्ज है। गांधी के साथ उनके सहयोगियों के किस्से धारावाहिक की तरह चलते हैं। इन कथानकों में नेहरू का नाम प्रमुख है लेकिन फेहरिस्त में नेहरू अकेले नहीं हैं।

यह आरोप निराधार है कि नेहरू-गांधी को कालजयी बनाने के लिए देश के दूसरे महानायकों को सुनियोजित तरीकों से अंधेरों में ढकेला गया है। जिन्हें नकारने या पीछे ढकेलने की बातें होती हैं, उन्हें देश बखूबी जानता-पहचानता है। इन नेताओं को कोई भी कमतर नहीं मानता था, क्योंकि आजादी के ऊषा-काल में हमें सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सुभाषचन्द्र बोस, बालगंगाधर तिलक जैसे नेताओं के बारे में भी उतनी ही शिद्दत से पढ़ाया जाता था। प्रारम्भिक कक्षाओं में ये तीन सवाल प्रश्नपत्रों का अनिवार्य अंग होते थे कि ‘तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा’ या ‘आजादी हमारा जन्दसिध्द अधिकार है’ या ‘आराम हराम ‘ जैसे राष्ट्रीय नारे किन नेताओं ने गढ़े हैं? ज्यादातर बच्चों को इन सवालों के जवाब में शत-प्रतिशत अंक मिलते थे।

यह बता पाना भी मुश्किल है कि शहीद भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद के अक्स जहन में कब और किसने गढ़े थे? एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बचपन की स्मृतियों में यह भी शामिल है कि रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास का बचपन का नाम ‘राम-बोला’ था या उनकी पत्नी रत्नावली उन्हें छोड़कर मायके चली गईं थी। रामायण पढ़ने या समझने की उम्र से बरसों पहले  ‘मांगी नाव, न केवट माना, कहि तुम्हारा मरमु मै जाना’ जैसी चौपाइयां महज इसलिए याद हो गई थीं कि छठी-सातवीं की कक्षाओं में ‘राम-केवट प्रसंग’ पाठ्यक्रम का हिस्सा था। ये किस्से उन आरोपों को काटते हैं कि देश की शिक्षा-व्यवस्था को योजनापूर्वक एक दिशा-विशेष की ओर ढकेला गया है।

अनेक तथ्यों के साथ देश, संस्कृति और समाज के इन महानायकों की मूरत जहन में सजीव है। इऩ प्रतिमानों को ‘तोड़ना-बदलना’ अथवा ‘सिलेक्ट-रिजेक्ट’ करना मुश्किल है। मनुष्य का जहन किसी की राजनीतिक-बपौती अथवा  कोरी स्लैट नहीं है कि उस पर बनने वाले अक्स सत्तासीनों के चाहे अनुसार बनें,मिटें और उभरें…। आप इबारत बदल सकते हैं, जहन नहीं। आप वर्तमान बदल सकते हो, अतीत नहीं। अतीत बदलने के नाजायज तरीके वितृष्णा पैदा करते हैं। जो अपने महानायकों के चरित्र में विद्रूपता पैदा करता है, वह अपने प्रति भी अविश्वास रचता है। जो सत्ता अतीत के साथ न्याय नहीं कर सकती, वह वर्तमान के साथ क्या और कैसे न्याय कर सकेगी? भाजपा के इतिहास-पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी या अटल बिहारी वाजपेयी भी वर्तमान नीति-नियंताओं से पूछ सकते हैं कि उन्हें हाशिए पर ढकेलने का सबब क्या है? क्या उन्हें भी नेहरू की तरह इतिहास से ओझल करने की कोशिशे जारी हैं। इतिहास को ऐसे संजोया जाए कि किसी भी महानायक के साथ अन्याय नहीं हो। नेहरू नेहरू बने रहें और आडवाणी भी गुमनाम नहीं हों…।

 

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