अपंग कांग्रेस को राहुल गांधी ‘प्यार की थैरेपी’ से खड़ा करेंगे…

0
61

 

गुजरात के औपचारिक चुनाव परिणामों के दो दिन पहले, जब राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं, देश की राजनीति कटुता, कठोरता और कर्कशता के कढ़ाव में खौल रही है। शनिवार,16 दिसम्बर, 2017 के दिन राहुल को औपचारिक रूप से अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष होने का प्रमाण-पत्र मिल जाएगा। राहुल अध्यक्ष पद संभालने वाले कांग्रेस के 60 वें राजनेता और गांधी-नेहरू परिवार के छठे सदस्य होंगे। राहुल का कहना है कि घृणा की राजनीति मोदीजी के हवाले करके वो कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए प्यार की राजनीति को बढ़ावा देंगे। वो राजनीतिक-संस्कृति बदलने का काम करेंगे, क्योंकि देश की राजनीति का चेहरा बहुत ही डरावना और बदसूरत हो चुका है।
सत्तारूढ़ भाजपा के हिंसक इरादों में लोकतांत्रिक-पध्दति की मर्यादाएं, संस्थाएं, प्रतिपक्ष और प्रति-विचार के लिए सम्मान की कोई झलक नहीं मिल रही है। भाजपा की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर कांग्रेस-मुक्त भारत है। पक्ष-विपक्ष में राजनीतिक घृणा की यह भाव-भूमि प्रजातंत्र के पालन-पोषण के कतई मुआफिक नहीं है। राजनीतिक लोकतंत्र में सत्ता-परिवर्तन अनहोनी घटना नहीं है। प्रजातंत्र में हारने वाले राजनीतिक-दलों के प्रति सत्तारूढ़ दलों में इस स्तर पर घृणा का भाव नहीं होता है, जितना कि इस वक्त कांग्रेस के प्रति जाहिर किया जा रहा है। आपात-काल के बाद जनता पार्टी में कांग्रेस के प्रति वैमनस्य जरूर देखने को मिला था, लेकिन इसकी जड़ में आपातकाल की ज्यादतियां थीं। मोटे तौर पर भारत में सत्ता-परिवर्तन हमेशा ही गौरवपूर्ण तरीके से हुआ है। यहां प्रधानमंत्री मोदी का कांग्रेस-मुक्त भारत का अभियान आश्चर्य पैदा करता है कि आखिरकार यह भाजपा के लिए क्यों जरूरी है?
बहरहाल, राहुल के अध्यक्ष बनते समय मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत अभियान चरम पर है। गुजरात और हिमाचल के नतीजे एक्जिट-पोल के मुताबिक रहे तो देश के तीस राज्यों में से बीस राज्यों में भाजपा की सरकारें होंगी। कांग्रेस फिलवक्त पंजाब और कर्नाटक में ही काबिज है। नेहरू-गांधी परिवार में भी राहुल सबसे खराब परिस्थितियों में कांग्रेस का काम संभाल रहे हैं। 1951 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के वक्त देश के 90 प्रतितशत हिस्से में कांग्रेस का राज था, तब लोकसभा में कांग्रेस के पास कुल 75 प्रतिशत सीटें थीं, जबकि वर्तमान में 543 में से 46 याने 8 प्रतिशत सांसदों के साथ वो मान्यता प्राप्त विरोधी-दल भी नहीं है। इंदिरा-सरकार में भी कांग्रेस के पास 75 प्रतिशत से ज्यादा याने 494 में से 371 सीटें थीं। 1985 में राजीव गांधी की सल्तनत में संसद में 542 में 415 सदस्य कांग्रेसी थे। 1998 में सोनिया गांधी के पदारोहण के समय देश के 19 प्रतिशत इलाकों में कांग्रेस का राज था और लोकसभा में 543 में से 141 सीटों पर कांग्रेसी-सांसद थे।
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राज्य-सरकारों के गठन में सोनिया गांधी का ट्रैक-रिकॉर्ड भी चमकदार नहीं है। लेकिन यूपीए सरकार और उसका दस साल का कार्यकाल सोनिया की उपलब्धियों को सुर्ख बनाता है। राहुल के हिस्से में कांग्रेस के सवा सौ साल के इतिहास में सबसे कमजोर संगठन आया है। उसका राजनीतिक-पुनर्निर्माण हिमालय लांघने जैसा है। यह राजनीतिक-विडम्बना है कि देश में या किसी भी राज्य में कांग्रेस में आज अपने बलबूते पर राजनीतिक-लक्ष्य हासिल करने का सामर्थ्य नहीं है। सही अर्थों में राहुल को विरासत में गौरवशाली अतीत के साथ अपाहिज या पंगु कांग्रेस मिली है, जो बैसाखियों के सहारे आगे बढ़ रही है। गुजरात चुनाव में कांग्रेस की सफलताओं का दारोमदार हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर पर टिका है। उप्र में कांग्रेस ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का सहारा लिया था, जबकि बिहार में उसकी डोर नीतीश कुमार और लालू यादव ने थामी थी।
राहुल को बैसाखियों के सहारे चलने वाली कांग्रेस की राजनीतिक-फिजियोथैरेपी के लिए जबरदस्त राजनीतिक-टीम तैयार करना है, जो भाजपा जैसे सशक्त संगठन का मुकाबला कर सके। भाजपा राजनीतिक-फाउल करने में माहिर दल है। घृणा के राजनीतिक माहौल में कांग्रेस को अपने पैरों पर चलाने के लिए जबरदस्त राजनीतिक-कौशल की जरूरत होगी। राहुल के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। गुजरात में वो नए राजनीतिक-अवतार में नजर आए हैं, जिसके कारण कई मर्तबा मोदी जैसे महारथी को पसीने का एहसास होने लगा था। गुजरात में राहुल का नया राजनीतिक-अवतार ही कांग्रेसियों में भरोसा पैदा कर रहा है कि वो सही कैप्टन सिध्द होंगे…।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY