गुजरात में नरेन्द्र मोदी की हार-जीत के राजनीतिक-मायने ?

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गुजरात विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हार-जीत के मायने क्या होंगे? सवाल बड़ा है, लेकिन न तो चुनावी-पंडित इस मसले पर बहस करते दिख रहे हैं, और ना ही राजनीतिक दलों की दिलचस्पी है कि वो इस महत्वपूर्ण सवाल को मुद्दे के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत करें। समीक्षक सवाल को महज 2019 के लोकसभा चुनाव के तराजू पर तौल रहें कि गुजरात के परिणाम उस वक्त क्या असर डालेंगे, लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा कि सवाल के दायरे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणामों की तरह भारतीय राजनीति के बुनियादी चरित्र को भी प्रभावित कर सकते हैं? क्या गुजरात के चुनाव परिणाम भी उप्र की तर्ज पर साम्प्रदायिक और जातीय-संदर्भों में देश के राजनीतिक सोच में परिवर्तन का सबब बन सकेंगे? यह महज संयोग है कि भाजपा की तमाम कोशिशों के बाद भी पाटीदार-आरक्षण के कारण चुनाव की धाराओं में हिन्दुत्व के बजाय जातीय-राजनीति गुजरात की रगों में गहरे पैठ गई है। हार्दिक पटेल मोदी के लिए नासूर बन गए हैं। विपक्ष की अतिरिक्त सतर्कता के कारण चुनाव अब तक हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचे हुए हैं। बड़ा उदाहरण यह है कि गुजरात की राजनीति में हैवी वेट समझे जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल चुनाव में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।
उप्र के परिणामों के ’बैक-ड्रॉप’ में मोदी की हार-जीत के रंगों में भिन्नता है। उप्र में भाजपा की जीत के बाद देश के बुनियादी राजनीतिक-चरित्र में बड़ा बदलाव आया है। उप्र का सबसे बड़ा ’आउट-कम’ यह है कि हिन्दू मुसलमानों के नाम पर वोट-बैंक की राजनीति पर लगभग ताला लग गया है। एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं देने के बावजूद भाजपा को यहां भारी जीत मिली थी। यह जीत तुष्टिकरण के राजनीतिक-ताबूत पर कील की तरह साबित हुई है। इस संदर्भ में राजनीति की भावी दिशाओं को उजला करने वाला पहलू यह है कि अब मुसलमान समझने लगे हैं कि अपनी राजनीतिक-प्रासंगिकता के लिए उन्हें भी देश की ’मेन-स्ट्रीम पॉलिटिक्स’ का हिस्सा होना पड़ेगा।
गैर-भाजपाई दल भी मर्म जान गए हैं कि राजनीतिक हितों के संवर्धन के लिए सभी समुदायों के समान दूरी और समान व्यवहार जरूरी है। उप्र के सबक के कारण ही चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी मंदिरों की चौखट पर नजर आ रहे हैं। उनके रणनीतिकार समझने लगे हैं कि कांग्रेस को भी गांधीवादी राजनीति के दौर में लौटना होगा, जबकि प्रार्थना-सभाओं में बेझिझक ’रघुपति राघव राजाराम’ जैसे भजन गाए जाते थे। सेक्युलर-मतिभ्रम टूटने के बाद सभी दलों में यह परिवर्तन नजर आ रहा है।
अब सवाल यह है कि उप्र में साम्प्रदायिकता की किलेबंदी तोड़ने के बाद क्या भाजपा गुजरात में जातीय-राजनीति के तटबंधों को तोड़ पाएगी? भाजपा गुजरात में भी हिन्दुत्व का कार्ड खेलना चाहती थी, लेकिन पाटीदार-समाज के आरक्षण आंदोलन के कारण यह संभव नहीं हो सका। हार्दिक पटेल के साथ जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकुर की राजनीतिक-सक्रियता ने आंदोलन मेें आग में घी डालने का काम किया है। भाजपा राजनीतिक मजबूरी या बेबसी के कारण इस वक्त आरक्षण आंदोलन के विरोध में खड़ी है।
जातीय या सांप्रदायिक राजनीति के मसलों में भाजपा दूध-धुली पार्टी नही है। उप्र में भाजपा ने माइक्रो-लेवल पर जातीय कूड़ा करकट बटोर कर राजनीति की थी। गुजरात में भी वह इसी राजनीति में लीन है। विपक्ष की जातीय-किलेबंदी में सेंध लगाने और मत-विभाजन की गरज से भाजपा ने जाति के आधार पर सैकड़ों निर्दलीय उम्मीदवारों को पैसा देकर मैदान में उतार दिया है। गुजरात में भाजपा की जीत के यह मायने कतई नही होंगे कि उसने देश को जातीय-राजनीति से छुटकारा दिलाने का काम किया है, या वह आरक्षण जैसी बीमारियों से छुटकारा दिलाने के लिए प्रयासरत है।
गुजरात में नरेन्द्र मोदी को क्यों जीतना चाहिए या कांग्रेस को क्यों नहीं जीतना चाहिए? इस सवाल का हर जवाब अपने आप में एक सवाल बनकर देश की राजनीति को टटोलता महसूस होता है। सवाल उन लोगों को अप्रिय भी लग सकते हैं, और गुदगुदा भी सकते हैं, जो पक्ष-विपक्ष में खड़े हैं। लेकिन सवालों के छांह में उभरते राजनीतिक-रोडमेप की दिशाएं देश और समाज को धुंधलेपन की ओर ढकेल रही हैं। चुनाव चाहे जो जीते-हारे, यह तय है कि वहां जो कुछ हो रहा है, उसके चलते भारत और उसकी लोकतांत्रिक मर्यादाएं हर स्तर पर हारेंगी।

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