चुनाव में पाकिस्तानी-साजिश : देश मोदी पर विश्वास करे या नहीं…?

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गुजरात विधानसभा के दूसरे चरण के चुनाव अभियान की पूर्णाहुति 12 दिसम्बर की शाम को होने वाली है, लेकिन अर्ध्द-सत्य पर आधारित राजनीति की प्रेत-कथाओं से भयभीत लोग आशंकित हैं कि पता नहीं अगले चौबीस घंटों में कौन सा बेताल बाहर निकल कर लोकतंत्र की समूची मर्यादाओं का चीर-हरण करने लगे? हर हाल में गुजरात जीतने की ललक में राजनीतिक के फलक पर बिखरती स्याही को देख कर लगने लगा है कि राष्ट्र-हित में गुजरात का चुनाव अभियान जितनी जल्दी हो सके, थम जाना चाहिए…अन्यथा, यह स्याही काले टेटू की मानिन्द आजीवन लोकतंत्र के माथे पर स्थायी कलंक बनकर दमकती रहेगी।
सहसा विश्वास नहीं होता है कि पाकिस्तानी सेना के जनरल अरशद रफीक की इच्छाओं को अमलीजामा देने के लिए दिल्ली के लुटियंस-इलाके में कांग्रेस साजिश रच सकती है। ऱफीक की कथित इच्छा अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की है। लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री यह खुलासा करते हुए सवाल करते नजर आते हैं, तो सच-झूठ के बीच अथाह प्रश्नों की श्रृंखला रूह में घुलने लगती है- क्या ऐसा भी हो सकता है? आरोप उस वक्त ज्यादा हैरतअंगेज हो जाता है, जब पता चलता है कि साजिश में शरीक नामचीन हस्तियों में दस साल तक देश की बागडोर संभालने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी है, जिनके हाथों में परमाणु-हथियारों की चाबी भी रही है।
मोदी ने रविवार को साणंद में आयोजित चुनावी-रैली में आरोप लगाया है कि कांग्रेस के निलम्बित नेता मणिशंकर अय्यर के निवास पर कांग्रेसी-नेताओं की यह बैठक हुई थी। पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी एवं पूर्व विदेशमंत्री नटवरसिंह इसमें शरीक हुए थे। पुराने राजनयिक होने के नाते मणिशंकर अय्यर भारत-पाक संबंधों पर नियमित ट्रेक रखते रहे हैं। इसी तारतम्य में 6 दिसम्बर की यह बैठक पूर्व नियोजित थी। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी भी इसमें भाग लेने वाले थे। कसूरी और अय्यर की मित्रता जग-जाहिर है। डिनर में भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर के अलावा सलमान हैदर, टीसीए राघवन, शरत सबरवाल, के. सतिन्दर लांबा, शंकर वाजपेयी और चिन्मय गरेखान जैसे जाने-माने राजनयिकों के साथ पाक-मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार प्रेम शंकर झा और राहुल खुशवंतसिंह भी शरीक हुए थे।
मोदी के खुलासे को सबसे पहले जनरल दीपक कपूर और उसके बाद प्रतिष्ठित राजनयिक चिन्मय गरेखान ने भी नकार दिया है। उनके अनुसार डिनर का एजेण्डा सिर्फ भारत-पाक रिश्तों तक ही सीमित था। इसका भारत की घरेलू राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं था। इसमें वो सभी डिप्लोमेट्स शरीक हुए थे, जिन्हें कसूरी व्यक्तिगत रूप से जानते थे। अब देश के सामने यह दुविधा भी है कि वो अपने पूर्व सेनाध्यक्ष की बात पर विश्वास करे या नहीं करे?
बहरहाल, जब राजनीतिक दृष्टि से देश के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साजिश के तथ्यों और निष्कर्षो के साथ सामने आते हैं, तो इस पर गौर करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प देश के सामने नहीं बचता है। सवाल यह है कि मोदी के खुलासों पर कैसे और क्यों गौर करना चाहिए? देश के प्रधानमंत्री की हैसियत से यदि मोदी कोई बात कहेंगे, तो देश उसे शिरोधार्य करेगा, लेकिन वो यदि भाजपा, महज भाजपा के ‘नेता-प्रधानमंत्री’ के रूप में प्रसंग सामने रखेंगे, तो यह विचारणीय होगा कि लोगों को उस पर विश्वास करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। साणंद की सभा में मोदी देश के प्रधानमंत्री कम, भाजपा के शीर्षस्थ नेता ज्यादा थे। यह मोदी का अपना असेसमेंट है कि उनके लिए गुजरात का चुनाव जीतना कितना और क्यों जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बडी संख्या में सक्रिय लोगों का मत यह भी है कि इतना नीचे उतरकर मोदी के लिए चुनाव जीतना कतई जरूरी नहीं है। गुजरात देश के उन तीस राज्यों में एक है, जिनके वो प्रधानमंत्री हैं। मोदी पिछले तीस सालों में अपने बल-बूते पर बहुमत लाने वाले एकमात्र नेता हैं। देश के जनमत के विजेता होने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि लोकतंत्र के साथ व्यभिचार नहीं हो। लोकतंत्र की जीत में ही भारत की जीत अंतर्निहित है। उन्हें सोचना होगा कि ‘गुजरात’ जीत कर कहीं वह ‘देश’ ही नहीं हार जाएं, जिसके वो प्रधानमंत्री हैं।
मोदी के आरोपों ने कूटनीतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में जबरदस्त कसैलापन पैदा किया है। राजनीतिक क्षेत्रों ने कांग्रेस के षडयंत्रकारी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है,ताकि सारी स्थितियां साफ हो सकें। पाकिस्तान-कनेक्शन पर आरोपों को एकदम खारिज करते हुए मनमोहन सिंह ने मांग की है कि पीएम को पद की गरिमा की खातिर देश से माफी मांगना चाहिए।

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