ट्रिपल तलाक के जरिए मुस्लिम कट्टरता की दीवारों में भाजपा की सेंध

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गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव-परिणामों के बाद, जबकि विपक्षी दल खुद को सहेजन-संभालने में व्यस्त हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुस्लिम समाज में विवादित ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाकर राजनीति के अगले लक्ष्यों की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। हिन्दुस्तान में शरीयत के नाम पर मुस्लिम-महिलाओं पर लगी अमानवीय पाबंदियों के दरवाजे खोलने के लिए मोदी-सरकार ने गुरुवार को लोकसभा में मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक पेश किया था।
भारत में लगभग नौ करोड़ मुस्लिम-महिलाओं के हकों को महफूज रखने की गरज से पेश विधेयक के राजनीतिक-मायने बहुआयामी हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं की आबादी करीब 9 करोड़ है। मुस्लिम समाज में एक तलाकशुदा मर्द के मुकाबले तलाकशुदा औरतों की संख्या चार है। भारतीय कानून के मुताबिक बाल-विवाह के अपराधों में शुमार 15 साल की उम्र के पहले मुस्लिम समाज की 13.5 फीसदी लड़कियों की शादी हो जाती है। 49 प्रतिशत मुस्लिम लड़कियों की शादी 14 से 29 साल की उम्र में होती है। ट्रिपल तलाक की कहानियों में ज्यादतियों के किस्से छिपे नहीं हैं। ट्रिपल तलाक के खिलाफ मुस्लिम समाज की महिलाओं में ही जबरदस्त आक्रोश रहा है। 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रिपल तलाक कानून को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिया था। उसके बाद मोदी सरकार के मंत्रियों के समूह ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में इस विधेयक का मसौदा तैयार किया था। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मसौदे को नकारते हुए आपत्ति ली थी कि इसे तैयार करते समय बोर्ड अथवा मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से राय-मशविरा नहीं किया गया है।
मोदी ने विधेयक के जरिए एक तीर से कई निशाने साधे हैं। केन्द्र-सरकार इस बिल के बारे में जायज-नाजायज आपत्तियों से भलीभांति वाकिफ है। कांग्रेस समेत विपक्ष की राय थी कि सदन में उठाई गईं आपत्तियों के निराकरण के लिए बिल सिलेक्ट-कमेटी के पास भेजा जाए। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का कहना था कि बिल संविधान की अवहेलना करता है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना था कि बिल में सुप्रीम कोर्ट की मंशाओं को ध्यान में रखा गया है। प्रतिपक्ष की चिंताएं बिल के आपराधिक स्वरूप को लेकर भी थीं। विपक्षी सांसदों की राय में बिल महिलाओं की मदद के बजाय उनकी परेशानियां बढ़ाने वाला है।
बहरहाल, विधेयक की कमजोरियों और ताकत से केन्द्र सरकार भलीभांति वाकिफ है। ट्रिपल तलाक का कानून बनाकर भाजपा ने अपनी राजनीतिक ताकत में इजाफा किया है। उसे पता है कि देश का मौजूदा राजनीतिक-परिदृश्य कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को यह इजाजत नहीं देता है कि वो इस विधेयक का ज्यादा विरोध करें। उनके पास थोडी-बहुत राजनीतिक ना-नुकुर के अलावा विधेयक को नकारने के लिए न तो ठोस तर्क हैं और ना ही वह बहुमत है जिसके सहारे वो इसे रोक सकें। उत्तर प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद देश में मुस्लिम-तुष्टिकरण की राजनीति हाशिए पर सरक चुकी है। हर वर्ग, तबके, जाति-समुदाय और धर्मों के लोग सामाजिक, राजनीतिक और सामाजिक सुधारों के लिए बेचैन हैं। भाजपा ट्रिपल तलाक कानून के जरिए मुस्लिम-समाज की कट्टर दीवारों में राजनीतिक सेंध लगाने में कामयाब हुई है। ट्रिपल तलाक कानून से उठने वाली लहरों के पीछे-पीछे कॉमन सिविल कोड का मसला भी दबे पांव राजनीतिक-ज्वार-भाटे में आकार लेता नजर आ रहा है। नरेन्द्र मोदी का नजरिया साफ है। उन्हें पता है कि उनके लिए क्याै फायदेमंद और क्या नुकसानदेह हो सकता है? ट्रिपल तलाक मोदी को राजनीतिक बढ़त देने वाला इंस्ट्रुमेंट है। इससे मुस्लिम महिलाओं में भाजपा की पैठ बढ़ेगी। हिन्दुत्व का ध्रुवीकरण मजबूत होगा। मोदी की राजनीतिक-चतुराई का अंदाज इसी से लगता है कि सरकार ने शीतकालीन सत्र में पेश होने वाले फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट विधेयक-2017 को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। आम आदमी के डिपॉजिट्स की ग्यारंटी पर सवाल खड़ा करने वाला बिल चुनाव के लिहाज से खतरनाक माना जा रहा था। खुद मोदी इसको लेकर सफाई देते नजर आए थे कि बैंकों में जमा रकम हर हाल में महफूज रहेगी।

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