धर्म और अस्मिता की कोख में कुलबुलाता गुजरात का चुनाव

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गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 9 दिसम्बर को सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात की 89 विधानसभा सीटों पर मतदान होने वाला है। पटेल-समुदाय के युवा नेता हार्दिक पटेल ने दावा किया है कि इन इलाकों में यदि भाजपा दस से अधिक सीटों पर जीत हासिल करती है, तो वे अपना आरक्षण आंदोलन वापस ले लेंगे। हार्दिक पटेल का यह दावा चौंकाने वाला है, क्योंकि मतदान के पहले पांच बड़े मीडिया-संस्थानों के चुनाव-सर्वेक्षणों में भाजपा को आसानी से जीतते हुए बताया गया है। सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में भाजपा की इतनी बड़ी हार के दावे सर्वेक्षणों पर सवाल लगाते दिखते हैं। बकौल हार्दिक पटेल इन इलाकों में 75 से ज्यादा सीटें हारने के बाद 92 के बहुमत का आंकड़ा पाने के लिए भाजपा को 14 दिसम्बर को होने वाले मध्य और उत्तरी गुजरात की बाकी 93 विधानसभा सीटों में से 83 सीटें हर हाल में जीतना होंगी। किसी भी इलाके में इकतरफा जीत के दावे अतिरंजित हैं।
राजनीतिक पंडितों और सर्वेक्षणों के मुताबिक 22 साल बाद गुजरात में लगातार छठी बार भी भाजपा की सरकार बनने की संभावनाएं उज्व्र भल हैं, फिर भी जीत को दोगुना पुख्ता करने की जिद में भाजपा ने सत्ता-सामर्थ्य का जो निरंकुश प्रदर्शन किया है, वो लोकतांत्रिक-समाज को आश्वस्त करने वाला नहीं है। शायद भाजपा और मोदी राजनीति की इस अवधारणा से आशंकित या भयभीत हैं कि गुजरात के चुनाव परिणाम 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर असर डालेंगे। आशंकाओं की इस रौ ने चुनाव में राजनीति के स्तर को काफी नीचे ढकेल दिया है। दावे और प्रति-दावों के बीच गुजरात के आगे बढ़ते चुनाव-अभियान की धूल राजनीति के फलक पर कुछ स्याह सवालों की काली इबारत लिखते हुए आगे बढ़ रही हैं। गुजरात के चुनाव में जो कुछ भी चल या घट रहा है, उसमें सबसे बड़ा सवाल यह उभर रहा है कि यह चुनाव किसी एक सूबे का है अथवा इसमें पूरे देश की सियासत और सत्ता दांव पर लगी है। चुनाव-अभियान के दौरान राजनीति का जो चेहरा सामने आया है, वह काफी डरावना और निराशाजनक है। चुनावी मुद्दों में विकास के रोल-मॉडल के रूप में गुजरात की चर्चाओं का पीछे छूट जाना भाजपा की हताशा का प्रतीक है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय-राजनीति के लिए मुनासिब नहीं है।
विकास के मुद्दों से मोदी अथवा भाजपा का विचलन देश में विकास की राजनीति को भयानक धक्का पहुंचाने वाला है। गुजरात की विकसित छवि में बिखराव मोदी की उन प्रतिबध्दताओं के बिखराव का सबब बन सकता है, जिसके सहारे देश ने अपने विकास को ‘कंसॉलिडेट’ याने सुगठित करने के सपने देखे थे। यह महज एक संयोग नहीं है कि ‘डेवलपमेंट’ के नाम पर मैदान में उतरी भाजपा ने विकास की पगडंडी पर बढ़ने से पहले ही अपने पैर इसलिए पीछे खींच लिए कि ‘विकास पगला गया था’। विकास के आकस्मिक गर्भपात के बाद अंतिम दौर में चुनाव गुजरात की अस्मिता और धर्मिकता की कोख में कुलबुलाने लगा है।
रणनीतिक दृष्टि से कांग्रेस ने कई नए कदम उठाए हैं। पिछले तेरह विधान-सभा चुनावों की लीक से अलग अपनी अल्पसंख्यक छवि को तोड़ते हुए कांग्रेस सॉफ्ट-हिन्दुत्व की ओर मुड़ गई है। इस रणनीति के खिलाफ विकास को ताक में रख कर भाजपा ने राम-मंदिर और तीन तलाक के ब्रम्हास्त्र जैसे मुद्दे अपने तरकश में सजा लिए। हार्दिक पटेल की सभाओं से उपजी जातीय-समीकरणों की पेचीदगियों से निपटने के लिए गुजराती अस्मिता का सहारा लेना मुनासिब समझा गया है। कांग्रेस के सामने पहली बार भाजपा रक्षात्मक मुद्रा में है। वैसे भी भाजपा ने जितने भी मुद्दे उछालने की कोशिशें कीं, वो सब ‘रि-बाउन्स’ हुए हैं। हार्दिक पटेल के विरुध्द अश्लील सीडी जारी करने के नतीजे अनुकूल नहीं रहे हैं। इससे भाजपा के खिलाफ युवाओं में आक्रोश को हवा मिली है।
क्या यह कम दिलचस्प है कि हार्दिक पटेल या राहुल के कटाक्ष करने के बाद भाजपा को सुध आई कि उसे चुनाव का संकल्प पत्र भी जारी करना है? मतदान के एक दिन पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संकल्प-पत्र की औपचारिकताओं को पूरा किया। राजनीतिक प्रतिकूलताओ के बीच बड़ी बात यह है कि कांग्रेस या हार्दिक पटेल की तुलना में भाजपा एक सशक्त संगठन है, जिसके पास हुनरमंद राजनीतिक कार्यकर्ताओं की फौज और सरकारी मशीन है, जो ऐन वक्त पर नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक भाजपा हार नहीं रही है, लेकिन जिस तरीके से जीत रही है, उसमें मिठास के बजाय कसैलापन ज्यादा है।

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