अक्षम्य त्रासदी: राजनीति में डमरू की तरह इस्तेमाल होते गांधी ?

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मंगलवार, 30 जनवरी 2018 को महात्मा गांधी की 70 वीं पुण्यतिथि पर जब गांधीवादी राजघाट पर राम-धुन के साथ उनका स्मरण करेंगे, तब उन्हें इन खतरों पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीगीरी को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी ‘स्पेस’ अब तेजी से सिकुड़ रहा है। कासगंज की ताजा सांप्रदायिक हिंसा और करणी-सेना की दबंगई के पीछे राज्याश्रय की कहानी स्पष्ट करती है कि सत्तारूढ़ प्रवृत्तियां गांधीवाद के महीन, संवेदनशील और उदार तकाजों को नेस्तनाबूद करने पर उतारू हैं। जन्म-मरण से जुड़े हर गांधी-प्रसंग पर जहन में यही सवाल कुलबुलाने लगता है कि गांधी को हम कैसे याद करें? राजनेता और राजनीतिक दल इस गंभीर सवाल के मामले में आपराधिक रूप से अगंभीर हैं। राजनीतिक-कर्मकांड में गांधी-दर्शन के मंत्रोच्चार को समझना जरूरी है।
कांग्रेस की तकली-चरखे की कहानी से आगे अब गांधी-दर्शन के उपकरण भाजपा की प्रयोगशाला का औपचारिक हिस्सा बन चुके हैं। इस सवाल का उत्तर ढूंढना भी जरूरी है कि दो प्रमुख राजनीतिक दलों का प्रमुख एजेण्डा होने के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक जिंदगी में क्या गांधी-दर्शन का प्रभाव ढलने लगा है? 2 अक्टूबर (जयंती) या 30 जनवरी (पुण्यतिथि) पर महात्मा गांधी को याद करने का औपचारिक-प्रोटोकॉल 70 सालों से एक जैसा है, लेकिन ‘एप्लाइड-पोलिटिक्स’ में गांधी-दर्शन के दिखावटी और सिर्फ वोटों को खींचने वाले ‘एप्लीकेशन्स’ गांधीवाद की ईमानदार कोशिशों को जबरदस्त चोट पहुंचा रहे हैं। गांधी के प्रति नेताओं की नीयत में खोट ने गांधीवाद की संरचनाओं को दूषित किया है। विचार जरूरी है कि गांधी का इस्तेमाल हम कैसे और क्यों करना चाहते हैं? गांधी हमारे लिए महज राजनीतिक कौतुक जगाने वाला डमरू नहीं हैं, या राजनेताओं की महफिलों में बजने वाले झांझ-मंजीरे, ढपली या हारमोनियम नहीं हैं, जो राजनीतिक तराने सुनाने के लिए इस्तेमाल किये जाएं। गांधी भारत की राजनीतिक आध्यामिकता की गंभीर और सार्वजनिक प्रस्तुति हैं, जो समग्रता से लोकतंत्र के रंगमंच की विविधताओं को एकाकार और सूत्रबध्द करती है।
पिछले सत्तर सालों से भारत के राजनीतिक परिदृश्य् में गांधी की ब्राण्ड-वेल्यू कभी कम नहीं हुई है। कांग्रेस ने इसका भरपूर इस्तेमाल किया है और प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक आकांक्षाएं गांधीवाद पर सवारी कर रही हैं। पिछले साल खादी ग्रामोद्योग के कैलेण्डर पर महात्मा गांधी की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भव्य चित्रांकन के बाद यह विवाद उठा था कि गांधी को लेकर मोदी कितने गंभीर हैं? उस वक्त भी सवाल उठा था कि मोदी क्या हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत की खाइयों को पाटने के लिए अपने संगी-साथियों से आव्हान करेंगे? गांधी के एजेण्डे में सांप्रदायिक सद्भाव सर्वोपरि मुद्दा था, जो भाजपा की मौजूदा केन्द्र सरकार और बीस राज्य-सरकारों के एजेण्डे में नदारद सा है। गांधी होने और गांधी जैसा होने में जमीन आसमान का फर्क है। सिर्फ मुहावरों के रूप में गांधी का शब्दोच्चार असर पैदा नहीं कर पाएगा। सांप्रदायिक वैमनस्य की ताजा घटनाएं सिध्द कर रही हैं कि खादी कमीशन के कैलेण्डर में मोदी भले ही गांधी मुद्रा में मौजूद दिखें, लेकिन सांप्रदायिक उपद्रवों की आग में गांधी जैसे प्रतिरोध से वो कोसों दूर हैं। देश में लंबे समय से छद्म गांधीवाद के नाम पर राजनीति का कारोबार चल रहा है। गांधी का ताबीज सभी बेच रहे हैं, लेकिन गुजराती मूल के प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि गुजराती होने के नाते वो गांधी के मामले में ज्यादा गंभीर और सचेत हैं।
सत्ता के साकेतों में सामाजिक और सांप्रदायिकता कुरूपता का आचमन गांधी भाव को दूषित कर रहा है। गांधी के साथ राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों की इबारत पथरीली हो चुकी है। गांधी की राजनीतिक अनिवार्यता और स्वीकार्यता को लेकर देश कभी एकमत नहीं रहा है। गांधी-दर्शन के मामले में मतभेदों की सुई 360 डिग्री गोलाकार घूमती है। गांधी के प्रति राजनीतिक-बिरादरी का दोहरा चरित्र मतलबपरस्ती का खुलासा करता है। यह व्यवहार और आचरण बताता है कि सवा सौ करोड़ भारतीय गांधी के प्रति ईमानदार नहीं हैं।
पिछले सत्तर सालों से महात्मा गांधी भारत के राजनीतिक-वजूद का स्थायी भाव हैं। उसकी धड़कनों का हिस्सा हैं। राजनीति के आर्काइव में गांधी की जिंदा मौजूदगी को राजनीति ने राष्ट्रपिता की मूर्ति में ढालकर पूजा के लिए शो-केस में रख दिया है। महात्मा गांधी के साथ यह राजनीतिक-ट्रीटमेंट हतप्रभ करता है।

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