अर्चना चिटनीस : बधाई…मगर अपने विभाग को कार्यशाला संस्‍कृति से बाहर निकालिए

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मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ महिला एवं बाल विकास विभाग की मुखिया मंत्री अर्चना चिटनीस और पूरा अमला बधाई का हकदार है कि मप्र में बाल मृत्यु दर में 7 अंकों की भारी गिरावट दर्ज की गई है। 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की बाल मृत्यु दर वर्ष 2015 के 62 थी जो अब 7 अंक गिरकर 55 प्रति हजार जीवित जन्म हो गई है। हालांकि, यह अभी भी देश में सबसे ज्‍यादा है। बाल मृत्‍यु दर में सर्वाधिक गिरावट दर्ज करने वाला राज्य असम है। जहां 10 अंक की कमी आई है। दूसरे नंबर पर मप्र है। इतनी अच्‍छी उपलब्धि के बाद भी कुछ पैमाने हैं जो मुंह चिढ़ा रहे हैं। यदि थोड़ी सख्‍ती से विश्‍लेषण करें तो पाएंगे कि जिस बड़े खर्च और पैमाने पर योजनाएं चल रही है, उसका इतना परिणाम तो आना ही था। यह ठीक
वैसा है जैसे चलते चले जाएंगे तो कभी मंजिल पर भी पहुंच ही जाएंगे। असली, मुद्दों तो भागने और तेजी से लक्ष्‍य प्राप्ति का है।

मप्र की जिस उपलब्धि का जिक्र किया गया है उसे केन्द्र शासन द्वारा जारी सेम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे (एसआरएस-2016) ने रेखांकित किया है। मप्र में बाल मृत्‍यु दर में 7 अंकों की यह गिरावट राज्य शासन द्वारा आरंभ किए गए दस्तक अभियान, विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं और अन्य प्रयासों के कारण प्राप्‍त हुई है।
लेकिन, जब मप्र में नवजात मृत्‍यु दर तथा शिशु मृत्‍यु दर में उल्‍लेखनीय
गिरावट न होने का उल्‍लेख किया जाता है तो तर्क दिया जाता है कि सरकार कार्य कर रही है और किसी भी मामले में परिणाम आने में वक्‍त लगता है। सरकार के ही प्रयासों का ही परिणाम है कि बाल मृत्‍यु दर में सुधार हुआ है। आगे शिशु मृत्‍यु दर भी घटेगी। इस तर्क में हम नवजात तथा शिशु मृत्‍यु दर तेजी से न गिरने के दोष को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
इस बात को गहराई से समझते हैं। जन्‍म के 28 दिनों के अंदर मृत्‍यु को नवजात मृत्‍यु दर कहते हैं। मप्र में यह दर 69.4 है। इसी तरह एक वर्ष से कम उम्र में मृत्‍यु को शिशु मृत्‍यु दर कहते हैं। मप्र में यह दर 47 है। 5 वर्ष से कम उम्र में मृत्‍यु बाल मृत्‍यु दर है। मप्र में यह अब 55 हो गई। यानि प्रति हजार जीवित जन्‍म में से 69.4 बच्‍चे पहले माह में ही दम तोड़ देते हैं।
बच्‍चों की किसी भी उम्र में मृत्‍यु के प्रमुख कारण निमोनिया, डायरिया, गंभीर कुपोषण और गंभीर एनीमिया हैं। दुर्भाग्‍य है कि, अट्ठाइस दिन और फिर एक वर्ष की उम्र तक हम बच्‍चों को इन खतरों से नहीं बचा पा रहे हैं। और बचाने के जो प्रयास हैं उसकी गति उम्‍मीदों की अपेक्षा काफी कम है।

मुश्किल यह है कि, इन चुनौतियों से निपटने की राह महिला एवं बाल विकास विभाग औपचारिक कार्याशालाओं में ही खोज रहा है। जबकि मैदानी मुद्दों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की समस्‍याओं और उनके कौशल विकास पर अधिक ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है। बच्‍चों की मृत्‍यु दर घटाने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में समन्‍वय न होने की बात होती है। देखा गया है कि लक्ष्‍य प्राप्ति के कार्य में मैदानी स्‍तर पर आशा, एनएनएम और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तो तालमेल साध ही लेते हैं, उच्‍च स्‍तर पर ही विभागों में समन्‍वय नहीं होता। सरकारी योजनाओं के क्रियान्‍वयन, राजनीतिक कार्यक्रमों में उपस्थित जैसे कार्यों के अलावा एक ग्रामीण महिला को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में 12 रजिस्‍टरों में जानकारियों भी भरनी होती है। इससे बड़ी विसंगति क्‍या होगी
कि जिस आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पर बच्‍चों, महिलाओं के कुपोषण को खत्‍म करने, मुत्‍यु दर रोकने सहित कई बड़ी जिम्‍मेदारियां हैं उसे अकुशल श्रमिक से भी कम वेतन मिलता है। अकुशल श्रमिक का न्‍यूनतम वेतन 6 हजार 750 है जबकि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का वेतन 3 और 5 हजार के फेर में ही उलझाए हुए हैं। भोपाल में बैठे अधिकारी कार्यशालाओं में मैदानी हकीकत का आभास कर योजनाएं बनाना और सुधारना चाहते हैं जबकि मैदानी कार्यकर्ताओं को कार्य कौशल का प्रशिक्षण भी सही तरीकों से नहीं मिल पाता है। वे अपनी समस्‍याओं और उलझनों को भी खुल कर बता नहीं पाते
हैं। यदि बताते भी हैं तो विभाग समाधान नहीं कर पाता। मंत्री जी, अपने विभाग को कार्यशाला संस्‍कृति से बाहर निकाल कर मैदानी मुद्दों का समाधान करने को बाध्‍य कीजिए। तब ही, हम मोटे खर्च से जारी योजनाओं का असली परिणाम भी पाएंगे।

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