कहीं रावत के बयान सेना में राजनीति के ‘रोगाणु’ पैदा नहीं कर दें?

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सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष न्यायाधीशों के ताजा घटनाक्रम के बाद भारत में संवैधानिक संस्थाओं की संप्रभुता, सर्वोच्चता और तटस्थता पर सवाल उठाने वाली घटनाओं की छाया अब भारतीय सेना पर भी मंडराने लगी है। जम्मू-कश्मीर के शिक्षामंत्री अल्ताफ बुखारी सेनाध्यक्ष बिपिन रावत के उस बयान के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं, जिसमें उन्होंने जम्मू कश्मीर में मदरसों और शिक्षा व्यवस्था पर नियंत्रण का सुझाव दिया था।
जनरल रावत की आपत्ति यह थी कि जम्मू कश्मीर के स्कूलों, मदरसों और मस्जिदों में भारत के नक्शे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का नक्शा अलग से पढ़ाया जाता है। इससे छात्र अलगाववाद की ओर प्रोत्साहित होते हैं। जनरल रावत ने कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्ट निरूपित करते हुए सेना-दिवस पर संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि जम्मू-कश्मीर में सोशल मीडिया और सरकारी स्कूल कश्मीरी-युवाओं में कट्टरता बढ़ा रहे हैं। दुष्प्रचार रोकने के लिए कुछ हद तक मदरसों पर नियंत्रण के साथ कश्मीर में शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है।
कश्मीर के शिक्षामंत्री अल्ताफ बुखारी का कहना है कि जनरल रावत महज एक महती जिम्मेदारी निभाने वाले सम्मानित अधिकारी हैं। वो शिक्षाविद ्नहीं हैं कि मशविरा दे सकें कि शिक्षा व्यवस्था कैसी होना चाहिए? हमें पता है कि हमें क्या करना है? कश्मीर में दो तरह का संविधान है, और दो झंडे हैं। सभी स्कूलों में भारत के नक्शे के साथ कश्मीर का नक्शा पढ़ाने के लिए कहा गया है।
बिपिन रावत 1 जनवरी 2017 को आर्मी चीफ दलबीर सिंह सुहाग के बाद भारत के सेना प्रमुख बने थे। रावत इसके पहले भी बयानों के लिए विवादों के घेरे में आते रहे हैं। शिक्षा प्रणाली राजनीतिक मसला है। इसलिए उनका ताजा बयान गैरजरूरी था। अन्य राजनीतिक दलों ने भी इसे अनावश्यक माना है। कश्मीर की सरकार में पीडीपी के साथ भागीदार भाजपा यदि यह मसला उठाती तो वाजिब हो सकता था। वैसे भी ’पोलिटिकल-एरिना’ सेना की गतिविधियों के लिए निषिद्ध क्षेत्र माना जाता है। रावत के ये ’ऑब्जर्वेशन्स’ राजनीतिक ज्यादा हैं। किसी सैन्य-अधिकारी के लिए राजनीति के चश्मों के हरा-नीला-पीला करने के अवसर पैदा करने वाले अपने ऐरे ’ऑब्जर्वेशन्स’ को सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करना गैरजरूरी है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत ही यह है कि उसकी सभी आधारभूत संस्थाएं राजनीति और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रही हैं। इनमें भी भारतीय सेना का अराजनैतिक होना दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा और प्रभावशीलता का सबसे बड़ा कारक रहा है। लेकिन बिपिन रावत के सेनाध्यक्ष बनने के बाद राजनीतिक-शैली की बयानबाजी से सुनियोजित दूरी रखने की सैन्य-परम्पराएं पिघलनें लगी हैं। कहना मुश्किल है कि अपने बयानों से गरमी पैदा करना बिपिन रावत का स्वभाव है अथवा भविष्य की आयोजनाओं की रणनीति है, लेकिन फिलवक्त उनके कई बयान राजनीतिक, कूटनीतिक और प्रशासनिक हलकों में गरमी पैदा करते रहते हैं। इसके पहले भी रावत उस वक्त सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने कहा था कि भारतीय सेना ढाई मोर्चों पर एक साथ निपटने के लिए तैयार है। उनके उपरोक्त बयान में इस बात के संकेत दिए थे कि सेना पाकिस्तान और चीन के दो अलग-अलग मोर्चों के साथ-साथ भारत की आंतरिक-सुरक्षा से जुड़े मसलों पर मोर्चा संभालने के लिए तैयार है। देश की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे को रावत ने जंग का आधा मोर्चा निरूपित किया था।
उनके इस बयान की राजनीतिक-ध्वनि यह थी कि सरकार आंतरिक मोर्चे पर सेना का सहयोग चाहेगी तो सेना तैयार है। ’आधे मोर्चे’ पर सेना की तैयारियों के इस बड़बोले बयान के साथ यह सवाल जुड़ गया था कि क्या भारतीय सेना अपने ही नागरिकों के खिलाफ लड़ाई की तैयारी के लिए तैयार है? सेनाध्यक्ष के संवादों में शब्दों की अभिव्यंजना और अतिरेक उनके भीतर उमड़-घुमड़ रही राजनीतिक-आतुरता को रेखांकित करता है।
सैन्य-परम्पराओं में दखल और खलल पैदा करने वाले बिपिन रावत के बयान पर गहरे प्रश्नचिन्ह यूं ही नहीं लग रहे हैं। मोदी-सरकार सेना के शौर्य और बलिदान को राष्ट्रवाद के सर्वोच्च प्रतीक रूप में रेखांकित करते हुए हमेशा विरोधी दलों को निशाने पर लेने में कोताही नहीं बरतती है। सरकार ने दो वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की अनदेखी करके रावत को जनरल बनाया है। रावत ने ठेठ हिन्दुवादी नेता की तर्ज में कहा है कि कश्मीर में मदरसों में आतंकवादी पैदा हो रहे हैं। यह शैली चिंता पैदा करती है कि राजनीति की कीटाणु कहीं सेना को भी दूषित तो नहीं कर देंगे? जनरल वीके सिंह को पहले सांसद और फिर मंत्री बनाकर भाजपा राजनीतिक-मिसाल कायम कर चुकी है। मिसाल रिटायर सेनानायकों के जहन में राजनीति का बीजारोपण करने वाली है। लेकिन यह ट्रेण्ड खतरनाक है कि वो सेवा-काल में ही राजनीतिक तेवर अख्तियार करने लगें…।

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