खुरदुरी जमीन पर खड़े मीडिया को ‘राहत का सर्टिफिकेट’

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इसे हांडी का कच्चा चावल मानें या मीडिया अपने कंटीले मुकुट में मोरपंखी स्पर्श माने कि एक अमेरिकी सर्वे एजेंसी ने कई मामलों में भारतीय मीडिया को अमेरिकी मीडिया के मुकाबले ज्यादा विश्वसनीय माना है। वह भी तब कि जब टीवी चैनलों में हनीप्रीत टाइप रिपोर्टिंग और बेसिर पैर की खबरों से टीआरपी छीनने की होड़ हो, तंत्र मंत्र से लेकर फेक न्यूज का व्यापार हो रहा हो, मीडिया हाउसों को एक अदृश्य सरकारी पंजा सतत डरा रहा हो और दर्शकों पाठकों की बदलती रूचियों के बावजूद भारतीय मीडिया अभी भी एक भरोसे की चौपाल बना हुआ है तो बात अपने आप में महत्वपूर्ण है। प्यू रिसर्च सर्वे हमे बताता है कि फर्जी खबरों के हो- हल्ले के बीच भारतीयों को देसी मीडिया की खबरें ज्यादा भरोसेमंद लगती हैं। इस मामले में भारतीय मीडिया अमेरिका से ज्यादा विश्वस्त है।

यूं ऐसे सर्वे को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती। क्योंकि उनका एक सीमित उद्देश्य होता है। हालांकि प्यू रिसर्च सेंटर खुद को एक अपक्षपाती और अलाभकारी संस्था और रिसर्च तथा एनालिसिस करने वाला थिंक टैंक बताता है। इसकी स्थापना 2004 में हुई और इसका मुख्यालय वाशिंगटन डीसी में है। यह सामाजिक मुददों, जनमत और जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों का सर्वे और विश्लेषण कर रिपोर्ट जारी करती है। हाल में इसने भारतीय मीडिया के बारे में जनमत संग्रह किया। इस जनमत संग्रह का महत्व ज्यादा इसलिए है, क्योंकि बीते तीन वर्षों में भारतीय मीडिया की दशा, दिशा, निष्ठा  और मजबूरियों को लेकर कई सवाल उठे हैं। परोक्ष संदेश भी गया है कि सत्ता देश में प्रतिबद्ध मीडिया चाहती है। कमोबेश यही आलम लोकतंत्र के मायके अमेरिका में भी है। वहां भी सत्ता मीडिया को कुलक्षणी बहू की निगाह से देख रही है। राष्ट्रपति ट्रंप तो मीडिया को ‘झूठों का सरदार’ ही बता चुके हैं। उनका मानना है कि मीडिया गलत व पक्षपाती रिपोर्टिंग ही करता है। यही नहीं वे तो अपने यहां के मुख्य धारा के मीडिया को ‘फेक ( फर्जी)  न्यूज अवाॅर्ड’ भी देने वाले हैं। यह बात अलग है कि अमेरिका का मुख्यधारा का मीडिया ट्रंप के आगे शीश नवाने को तैयार नहीं है। उसकी रीढ़ भारतीय मीडिया के मुकाबले ज्यादा मजबूत है।

बहरहाल प्यू का सर्वे जिन भारतीयों के बीच किया गया, उनमें से 80 फीसदी ने भारतीय मीडिया को ज्यादा सटीक और सही खबर देने वाला माना। केवल 7 फीसदी को अपने मीडिया पर भरोसा नहीं था। जबकि 43 प्रतिशत अमेरिकी अपने यहां की खबरों को सही नहीं मानते। हालांकि 56 प्रतिशत अमेरिकी लोगों को अपने मेनस्ट्रीम मीडिया पर भरोसा कायम है। प्यू सर्वे यह भी बताता है कि लगभग 72 फीसदी भारतीय सरकारी कामकाज से जुड़ी रिपोर्टिंग को सही मानते हैं। अमेरिका में यही आंकड़ा 58 प्रतिशत है। भारत में 10 और अमेरिका में 41 प्रतिशत लोग सरकार की रिपोर्टिंग से नाखुश हैं। यद्यपि अमेरिका के 58 फीसद लोगों को इस रिपोर्टिंग पर भरोसा है। बात अगर राजनीतिक रिपोर्टिंग की बात करें तो भारत के 65 प्रतिशत लोग अपने मीडिया घरानों से खुश और 16 फीसद नाखुश हैं। अमेरिका में इस पसंद और नापसंद का आंकड़ा क्रमशः 47 और 52 प्रतिशत का है। सर्वे एक और दिलचस्प बात बताता है कि भारतीय स्थानीय खबरों को चाव से देखना और पढ़ना पसंद करते हैं। अमेरिका में यही आंकड़ा 41 फीसदी का है। वैसे दुनिया में भारत और इंडो‍नेशिया दो देश ऐसे हैं, जहां राष्ट्रीय खबरों से ज्यादा लोकल खबरों को तरजीह दी जाती है। इसका कारण इन देशों की सांस्कृतिक विविधता भी हो सकती है।

इसी के साथ भारत में 53 फीसद लोग ऐसे हैं, जिनकी‍ दिलचस्पी अंतरराष्ट्रीय खबरों में  है। 16 फीसदी ऐसे हैं, जिनकी रूचि अमेरिकी खबरों में रहती है। दोनो देशों में सोशल मीडिया पर खबरें देखने का चलन बढ़ रहा है। प्यू सर्वे के मुताबिक 35 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया  पर खबरें देखते हैं, जबकि 13 फीसद लोग ऐसे हैं जो दिन में एकाध बार ही खबरों के लिए सोशल मीडिया का रुख करते हैं। 52 प्रतिशत लोग अभी भी खबरों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करते। जबकि भारत में डेली न्यूज के लिए 15 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं।

अगर मीडिया हाउसों की प्रोफेशनल प्रामाणिकता की बात करें तो अमेरिका में जहां 62 प्रतिशत लोगों का मानना है कि उनके न्यूज ऑर्गनाइजेशंस सही ढंग से रिपोर्टिंग कर रहे हैं, वहीं 80 प्रतिशत भारतीयों को लगता है कि उनके समाचार संगठनों द्वारा दिखाई जा रही खबरें ठीक होती हैं। इतना ही नहीं सिर्फ 7 प्रतिशत भारतीयों को ही लगता है कि उनकी मीडिया खबरों को तथ्यात्मक रूप से पेश नहीं करती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 43 प्रतिशत है। सर्वे के अनुसार 72 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि उनका मीडिया सरकार के बारे में निष्पक्ष रिपोर्टिंग कर रहा है। सिर्फ 10 फीसद इस बात से असहमत हैं। अमेरिका में असहमति का आंकड़ा 41 प्रतिशत है।

हालांकि यह सर्वे भारतीय मीडिया के लिए फूल कर  कुप्पा होने का कारण नहीं है। लेकिन जब टीवी चैनलों की प्रोफेशनल समझ पर सवालिया निशान लगें, सोशल मीडिया का अराजक संसार हो, प्रिंट मीडिया पर बढ़ते प्रत्यक्ष और परोक्ष दबाव हों, मीडिया का खुद एक धंधा बन जाए, संपादक संस्था खुद वेंटीलेटर पर हो, कई पत्रकारों और दलालों के बीच सीमा रेखा का धुंधला गई हो विदेश यात्रा के दौरान कुछ संपादकों द्वारा होटल के चम्मच चुराने जैसी निहायत घटिया हरकत अंजाम देने  के बावजूद अगर भारतीय मीडिया के प्रति पाठकों और दर्शकों के मन में विश्वसनीयता की कलई बाकी है तो यह राहत की बात जरूर है। इसलिए भी कि इस देश में सवा सौ करोड़ लोगों को न्याय देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी अपने ‘मन की बात’ कहने के लिए यही प्लेटफार्म सबसे ज्यादा भरोसेमंद लगा।

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