जब जनार्दनजी ने कहा- ‘उपवनों के पारखी तुम, जंगलों की जात मेरी…।’

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अब राज्यसभा में कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता जनार्दन व्दिवेदी और डॉ. कर्णसिंह की बौध्दिक तेजस्विता का आभा-मंडल देखने और सुनने को नहीं मिलेगा। 27 जनवरी, 2018 को ये दोनों सदस्य राज्यसभा से निवृत्ता हो रहे हैं। राज्यसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन जनार्दन व्दिवेदी ने अपने विदाई-भाषण का समापन कविता से किया और डॉ. कर्णसिंह ने शकील बदायूंनी के शेर और श्लोअक से किया। दोनों विदाई-भाषण वर्तमान राजनीति की दशा और दिशाओं के मर्म को अभिव्यक्त करते हैं। डॉ. कर्णसिंह ने फलसफाना अंदाज में भाषण को समाप्त करते हुए शकील बदायूंनी का शेर कहा था- ‘हर चीज नहीं इक मरकज, इक रोज इधर इक रोज उधर। नफरत से न देखो दुश्मन को, शायद व मोहब्बत कर बैठे।’ उपनिषद् की पंक्तियों से उन्होंने यह अंतिम संदेश दिया कि- ‘हम साथ काम करें, साथ ही में फूलें-फलें, साथ ही पाएं और हमारे बीच घृणा के लिए कोई जगह नहीं हो…।’
दो भिन्न-भिन्न सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक परिवेशों में ढले दो चिंतक-राजनेताओं की चेतना के धरातल पर नसीहतों की जुगलबंदी सदन आसानी से भुला नहीं पाएगा। डॉ. कर्णसिंह के भाषण में चिंताओं की व्याख्या का अंदाज फलसफाना और प्रोफेसराना था, जबकि जनार्दन व्दिवेदी की देशज अभिव्यक्ति के क्षितिज में अतीत, वर्तमान और भविष्य की बारहखड़ी रूबरू महसूस होती थी।
बात जनार्दनजी की कविता से शुरू करें तो समय का प्रवाह कदमों की सहज थाप के साथ लयबध्द होकर चहलकदमी करता महसूस होता है। प्रारंभ में उन्होंने जो कहा था, उसकी राजनीतिक-व्याख्याएं कई तरीकों से हो सकती हैं, लेकिन अंत में छंदों के माध्यम से जब वो सामने आए, तो लगा कि कीचड़ के आंधी-तूफानों में भी उनकी बौध्दिकता की लौ अखंड क्यों बनी रही? कविता उनके रचनाधर्मी स्वभाव की निरन्तरता का प्रतीक है। राज्यसभा में प्रस्तुत जनार्दनजी की यह कविता ताजा नहीं है। यह कविता उन्होंने 8 जून 1996 को तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनजर लिखी थी। कविता की भाव-भूमि उनके इस कथन से स्पष्ट हो जाती है कि ‘जब विवेक-तंत्र की जगह स्वर-तंत्र प्रबल हो जाता है तो कोई मर्यादा-मंत्र काम नहीं आता है।’ यह कविता उनकी आत्मा की अनुगूंज है। उनके मुताबिक ‘अपनी आदत है कि रहा नहीं जाता है और जो भीतर का सत्य है, वह बाहर आ ही जाता है।’ बकौल जनार्दनजी- मित्र मेरे, बड़ी बेढब बात मेरी…भला क्या औकात मेरी…। उपवनों के पारखी तुम…जंगलों की जात मेरी…। बन न पाएंगे तुम्हारी कल्पनाओं के मुताबिक चित्र मेरे…मित्र मेरे…। कविता में ‘उपवन’ और ‘जंगल’ की तुलनात्मक भाव-भूमि देश के वर्तमान काल-खंड में पनप रहे समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं की ओर ध्यानाकर्षण है। ‘केक्टस’ में खुशबू ढूंढने वाली राजनीतिक-कल्पनाओं को ये पंक्तियां नकारती हैं। चारण-भाट संस्कृति के मौजूदा समय में यह साफगोई निषिध्द है, लेकिन जनार्दनजी ने अपने भाषण के प्रारंभ में कह दिया था कि ‘जब आप संगठन में होते हैं, तो संगठन की मर्यादाओं का पालन करना होता है, लेकिन मन उससे बड़ी चीज है और आज की समस्या शायद यही है।’ ‘मैनें 57 साल के राजनीतिक जीवन में विचारों से समझौता नहीं किया और जीवन में अंतर्विरोध बना रहा।’ ‘मैं जिस घर में पैदा हुआ, वह ईंट-पत्थर का नहीं, मिट्टी से बना घर था, जिसे गोबर से लीपा-पोता जाता था।’ जनार्दनजी के इस कथन के मर्म और धर्म को समझना होगा कि ‘हमारी सद्भावना बौध्दिक दृष्टि से गरीबों के दुख-दर्द से हो सकती है, लेकिन अगर आपने उस दर्द को नहीं जिया है, भोगा नहीं है, तो न आप संपूर्ण नेता बन सकते हैं और न संपूर्ण रूप से बौध्दिक बन सकते हैं।’ उनकी कविता की अंतिम पंक्तियां काफी कुछ कहती हैं- ‘कुछ लुटेरे, कुछ भिखारी…मिट रही है उर्ध्वगामी वृत्ति की पहचान न्यारी…। प्रश्न उठता हर दिशा से, किसलिए संकल्प ढोएं… सब विकल्पों के पुजारी…। इसलिए यह जानने से, अब न कोई फर्क पड़ता, कौन मित्र, अमित्र मेरे…मित्र मेरे..।’
राज्यसभा में पक्ष-विपक्ष की आसंदियों से अब वो चेहरे ओझल होते जा रहे हैं, जिनकी मौजूदगी सदन की प्रभावशीलता और राजनीतिक-समझदारी को रेखांकित करती थी। वर्तमान राज्यसभा में शरद यादव, सीताराम येचुरी जैसे नेताओं के बाद जनार्दन व्दिवेदी या डॉ. कर्णसिंह की अनुपस्थिति को संसदीय विधा के मर्मज्ञ लंबे समय तक महसूस करते रहेगें। जनार्दनजी और डॉ. कर्णसिंह के संदेशों के राजनीतिक-निहितार्थ गहरे और व्यापक हैं। इन्हें समझना वक्ता का तकाजा है।

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