जीवन ही नहीं पद भी क्षण भंगुर है… नंदकुमार जी, कुछ कीजिए… 

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अपने विवादित बयानों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहने वाले मप्र भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान शनिवार को फिर चर्चाओं में रहे। मीडियाकर्मियों सहित राजनीति में रुचि रखने वाला हर व्यक्ति सोशल मीडिया पर तेजी से चली इस सूचना की सच्चाई जानने में जुटा था कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीाफा मांग लिया गया है और राष्ट्रीय अध्यक्ष ने नए अध्यक्ष का नाम तय कर दिया है। एक-दो घंटे में स्थिति स्पष्ट हो जाएगी जैसे वाक्य के साथ प्रसारित हुए इस संदेश की सत्यता अब तक साबित नहीं हुई, लेकिन यह मैसेज एक बात भी याद दिला गया कि पद भी क्षणभंगुर है, जीवन की तरह। नंदकुमार सिंह चौहान सत्ताधारी पार्टी के मुखिया हैं। उनके पास कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शक्तियां हैं। अनुभव बता रहे हैं कि इनका उपयोग करने में वे उतने सफल नहीं हुए जितने उनके पूर्ववर्ती अध्यक्ष हुए हैं। न वे अपने कार्यों से इतनी गाढ़ी रेखा खींच पाए हैं कि उनके दो कार्यकालों को किन्हीं खास बातों के कारण याद किया जा सके।
मप्र में भाजपा 2003 से शासन कर रही है और 2018 में उसे एक बार फिर वोट मांगने जनता के पास जाना है। ऐसे में कई लोगों को एंटीइंकम्बेंसी का भय सता रहा है। स्वयं मुख्यंमंत्री विधायकों के साथ बैठकों में कुछ रिपोर्ट का हवाला दे कर उनके कार्यकाल की खामियां गिना चुके हैं। मैदानी स्तर पर नेताओं को गाहे-बगाहे जनता की नाराजी देखने को मिलती है। जैसा कि धार जिले के धामनोद में हुआ। यहां 17 जनवरी को नगरीय निकाय चुनाव होना है और वोट मांगने निकले अध्यक्ष पद के भाजपा उम्मीदवार दिनेश शर्मा को एक बुजुर्ग ने जूतों की माला पहना दी। यह विरोध पार्टी के लिए एक चेतावनी की तरह है। जनता और कार्यकर्ता में नाराजगी के तथ्य से मुख्य्मंत्री के साथ मैदानी कार्यकर्ता भी परेशान हैं मगर उन्हें अपने अध्यक्ष से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
सबसे बड़ा मसला तो पदाधिकारियों और कार्यकारिणियों का है। अपने दूसरे कार्यकाल में चौहान ने अपनी कार्यकारिणी की घोषणा तो जल्द कर दी, मगर जिला अध्यक्षों तथा उनकी कार्यकारिणी की नियुक्तियों को अटका दिया। आलम यह है कि कई जिलों में अध्यक्ष ही हैं, उनकी कार्यकारिणी का पता नहीं है। जिलाध्‍यक्षों की नियुक्ति अप्रैल 2017 में कर दी गई थी। चौहान ने आठ माह बाद भी उनकी कार्यकारिणियों पर स्वीकृति की मोहर नहीं लगाई है, जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अगस्त 2017 में मप्र प्रवास के दौरान कहा था कि बेवजह कार्यकारिणियों को न रोका जाए। नोटरी की नियुक्ति पर संगठन की राय हो या अन्य पदों पर राजनीतिक नियुक्ति का मामला, इच्छुक व्यक्ति भोपाल के चक्कर लगा रहे हैं और अध्यक्ष ने सारे मामले ठंडे बस्ते में रख दिए हैं। ऐसे में दलाल किस्म के कई व्यक्ति सक्रिय हो गए हैं जो अपनी पहुंच का दम भरते हुए उम्मीदवारों से पैसे भी ऐंठ रहे हैं और सिफारिश करवाने के रास्ते भी बता रहे हैं।
पार्टी के लिए यह असमंजस शुभ संकेत नहीं है। चौहान के बोल बेबाक हो सकते हैं, मगर कई बार उनके बयान बिना विचारे कहे गए प्रतीत होते हैं जो सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष पद की गरिमा को घटाते हैं। चर्चाएं तो यह भी हैं कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चौहान और संगठन महामंत्री सुहास भगत की आपस में पटरी नहीं बैठ रही। बताया जाता है दोनों साथ एक राह पर नहीं जाते, न एक कक्ष में रहना पंसद करते हैं। भाजपा के कार्यकर्ताओं में ही यह चर्चा है मगर दोनों पक्षों में से किसी ने व्यावहारिक रूप से इस चर्चा का खंडन नहीं किया है। इस मनमुटाव को आधार बना कर जब अध्यक्ष चौहान को हटाने की सूचनाओं ने जोर पकड़ा तो साफ दिखाई दिया कि थोकबंद पदाधिकारी होने के बाद भी अध्यक्ष के पक्ष में बोलने तथा ऐसी सूचनाओं का खंडन करने वाले लोग कम पड़ गए। साफ है, अंदर ही अंदर नंदकुमार चौहान का समर्थक वर्ग कमजोर हुआ है। अध्यक्ष के लिए अभी भी मौका है कि वे इन संकेतों को समझें तथा पद की क्षणभंगुरता को जान उपयुक्त कदम उठाएं। अन्यथा वर्तमान को इतिहास तो होना ही है।

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