न्याय-पालिका के गलियारों में राजनीतिक गरम हवाओं की आहट

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्यकलापों के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट के चारों वरिष्ठ न्यायाधीशों की प्रेस कांन्फ्रेंोस के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सनसनी है। प्रेस कांन्फ्रेंपस में चारों जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ के आरोपो के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से ब्रीफिंग लेने के बाद खामोशी अख्तियार कर बैठ गए हैं और भाजपा के अलावा दूसरे राजनीतिक दल न्याय-पालिका के इस ऐतिहासक घटनाक्रम के दुष्परिणामों का आकलन करने में लगे हैं।
न्याय–पालिका के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता-क्रम में पहली पांच पायदान पर खड़े पांच न्यायाधीश एक दूसरे पर आरोपों की तलवार लेकर टूट पड़े हों। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, इसलिए इस पर गौर भी ऐतिहासिक तरीके से ही किया जाना चाहिए…। चारों न्यायाधीशों की चिंताओं की गहराई को उनके इस ऑब्जर्वेशन से आंकना चाहिए कि ‘यदि न्याय-पालिका को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है।’
न्याय की बात जब लोकतंत्र से शुरू होती है तो सबसे पहले राजनीति आती है और उसके बाद कई सैध्दांतिक और व्यावहारिक कहानी-किस्से सिर उठाकर खड़े हो जाते हैं। केन्द्र सरकार की खामोशी अकारण नहीं है। न्याय-पालिका की पतनशीलता की ओर इशारा करने वाले इस मुद्दे का राजनीतिक-फलक बहुत बड़ा है। राजनीतिक दृष्टि से मोदी-सरकार के लिए यह घटना काफी चुनौतीपूर्ण और संकट पैदा करने वाली है। चारों न्यायमूर्ति का यह वाद-विवाद, न्याय-पालिका की आंतरिक-व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रह सकेगा। मोदी-सरकार के गठन के बाद से ही न्याय-पालिका और केन्द्र के बीच अनमनेपन और टकराव के किस्से सुर्खियों में रहे हैं। इन धारणाओं को भी बल मिलता रहा है कि सरकार प्रतिबध्द न्यायपालिका की ओर कदम बढ़ा रही है। चारों न्यायाधीशों ने मोदी-सरकार को आशंका के धुंध से ढंक दिया है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने घटनाक्रम पर नपी-तुली प्रतिक्रिया देकर और महाराष्ट्र के जस्टिस लोया की मौत की जांच कराने की मांग कर सारे घटनाक्रम में नया दृष्टिकोण जोड़ दिया है। राहुल गांधी ने इस मामले को संवेदनशील और गंभीर निरूपित करते हुए कहा है कि जिन नागरिकों को न्याय-पालिका पर भरोसा है वो गंभीरतापूर्वक यह देख रहे हैं कि सरकार कितनी तत्परता से इस मुद्दे को निपटाती है। जजों ने न्यायामूर्ति लोया की मौत का मामला उठाया है, उसकी उच्च स्तरीय जांच होना चाहिए। राहुल गांधी के इस बयान ने न्यायपालिका के इस मसले को पूरी तरह से राजनीतिक-गिरफ्त में ले लिया है। इसके बाद न्यायपालिका के नाम पर राजनीति के कारोबार को नए आयाम मिल गए हैं।
मोदी-सरकार को देखना होगा कि न्यायपालिका का यह मामला कहीं उसके गले में हड्डी बनकर नहीं अटक जाए। माकपा नेता सीताराम येचुरी के इस सवाल का जवाब भी लोग जानना चाहेंगे कि अदालत की आजादी और अखंडता में कैसे दखल दिया जा रहा है। ममता बैनर्जी ने भी केन्द्र सरकार पर बंदूक तानते हुए कहा है कि मीडिया और अदालतें लोकतंत्र का स्तंभ है, इसमें केन्द्र-सरकार का बहुत ज्यादा दखल लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। यशवंत सिन्हा का यह ट्वीट भी गौरतलब है कि जजों का इशारा साफ है। उम्मीद है कि जस्टिस लोया की मौत का सच सामने आएगा।
न्यायपालिका की देहरी पर कोई भी अभद्र नहीं दिखना चाहता है। इसलिए राजनीति, सिध्दांतो की आड़ में, काफी मुलायम अंदाज में सत्ता के गलियारों में लोकतंत्र को टटोलने की कोशिश कर रही है। लोकतंत्र की किताबों में सिध्दांतों को सर्वोपरि रखा गया है, लेकिन राजनेताओं के व्यवहार और आचरण में सिध्दांत का महज एक उपयोग है कि इसके जरिए लोगों को कैसे और कितना भ्रमित किया जाए। भ्रमित करने का यह सबसे कारगर इंस्ट्रुमेंट है। लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है। सिध्दांतों की छांह में राजनेताओं की बयानबाजी की शीतल बयार के पीछे राजनीति की गरम हवाओं के आतंक की आहट साफ सुनाई पड़ रही है। मोदी-सरकार की विश्वसनीयता के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।

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