ब्रह्मगुप्त के गुरूत्वाकर्षण सिद्धांत में छिपी हिंदू आकांक्षाएं…

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अगर यह सिर्फ सनसनी फैलाने के मकसद से दिया गया बयान नहीं है तो उसकी सत्यता पर गंभीर विमर्श और शोध जरूरी है। अपने विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर राजस्थान के मशहूर शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी ने राजस्थान विवि के 72 वें स्थापना दिवस पर यह ‘रहस्योद्धाटन’ कर सभी को चौंका दिया कि दुनिया को गुरूत्वाकर्षण का नियम आइजक न्यूटन से हजार वर्ष पहले भारतीय (हिंदू) गणितज्ञ और खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था। इसे बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने विकसित किया। उन्होने सवाल किया कि अपने स्कूली पाठ्यक्रम में हमे इस तथ्‍य को क्यों न शामिल करना चाहिए ? साथ ही  देवनानी ने एक समझदारी भरी अपील की कि उनके दावे पर प्रतिक्रिया देने से पहले लोग ब्रह्मगुप्त की किताबें जरूर पढ़ें। वैसे देवनानी हमे पहले यह भी बता चुके हैं कि गाय ही ऐसा प्राणी है, जो आॅक्सीजन लेकर आॅक्सीजन ही छोड़ता है।

बहरहाल( ई 598-668) सातवीं सदी के महान गणितज्ञ थे। उन्होने पहली बार शून्य के नियम बताए। कई महत्वपूर्ण बीजगणित और रेखागणित के फार्मूले दिए। ब्रह्मगुप्त को राजस्थान के जालौर जिले के भीनमाल का रहने वाला माना जाता है। बाद में उन्होने उज्जैन में अपनी ज्ञान साधना की। वे उज्जैन की अंतरिक्ष वेधशाला के प्रमुख थे। इस दौरान उन्होने दो प्रमुख ग्रंथों की रचना की। ये हैं- ब्राह्मस्फुटसिद्धांत ( ई.628) और खंड खाद्यक या खंडखाद्य पद्धति (ई.665)। विज्ञान इतिहासकार जाॅर्ज सार्टन ने ब्रह्मगुप्त को अपने समय का महान वैज्ञानिक बताया है। देवनानी के दावे को बल देते हुए राजस्थान विवि के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. के.जी शर्मा ने ब्रह्मगुप्त की किताब ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के  एक श्लोक का जिक्र करते हुए बताया है- ‘कोई चीज धरती की ओर गिरती है, क्योंकि यह धरती की प्रकृति है कि वह चीजों को आकर्षित करती है, जैसे पानी की प्रकृति है बहना।’ इससे ब्रह्मगुप्त की गुरुत्वाकर्षण की समझ के बारे में पता चलता है। बाद में इसी सिद्धांत को भास्कराचार्य ( ई. 1114-1185 ) ने अपनी किताब सूर्य सिद्धांत में विस्तार से बताया है।  भास्कराचार्य के अनुसार’ ‘ पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है। इसी कारण पदार्थ जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं। भास्कराचार्य न्यूटन से पांच सौ साल पहले और ब्रह्मगुप्त के चार सौ वर्ष बाद हुए थे। इतिहासज्ञ शर्मा का कहना है कि खलीफा अल मंसूर ने ब्रह्मगुप्त की किताबों का अनुवाद अरबी में किया था। राजस्थान विवि के ही संग्रहालय और पुरात्तव विभाग के सुपरिंटेंडेंट जफरुल्लाह खान के मुताबिक कई हस्तलिपियों से भी यह पता चलता है कि ब्रह्मगुप्त ने गुरूत्वाकर्षण के क्षेत्र में शोध किया था। माना जाता है कि इसके पहले महान खगोल शास्त्री वराह मिहिर ने भी गुरूत्वार्षण बल के बारे में हमे बताया था। वराह मिहिर ने कहा था कि ‘किसी प्रकार की शक्ति ही वस्तुओं को पृथ्वी पर चिपकाए रखती है।‘ वराह मिहिर का काल ब्रह्मगुप्त से भी पहले का है। ऐसे में यह विवाद भी हो सकता है कि भारत में गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत पहले ब्रह्मगुप्त ने दिया था या फिर वराह मिहिर ने।

जो भी हो, जो सिद्धांत दिया गया, वह न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण सिद्धांत जैसा ही है। न्यूटन ने इस प्राकृतिक सत्य को एक सेब के जमीन पर गिरने के दौरान पकड़ा था। न्यूटन का गुरूत्वाकर्षण नियम कहता है कि गुरूत्वाकर्षण (ग्रेविटेशन) पदार्थ के कणों में एक दूसरे की अोर आकृष्ट होने की प्रवृत्ति है। उन्होने  इसका गणितीय सूत्र भी दिया। न्यूटन का यह सिद्धांत सर्वमान्य है। इस सिद्धांत पर आगे कई वैज्ञानिकों ने काम किया। आज भी हो रहा है। इसी सिद्धांत पर आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान की नींव पड़ी। लेकिन हमारा ज्ञान 12 वीं शताब्दी के बाद धर्म के आडबंरवाद में गुम हो गया।

वैसे भी महत्वपूर्ण यह नहीं है कि गुरूत्वाकर्षण का मूलभूत सिद्धांत पहले किसने दिया, महत्वपूर्ण यह है कि  वह सिद्धांत क्या है, उसका ज्ञान और मानव सभ्यता को आगे बढ़ाने में कितना योगदान है, इस ज्ञान की समाज के लिए कितनी अहमियत है और हम ज्ञान आधारित समाज को पोषित करना चाहते हैं या नहीं ? अगर देवनानी के बयान का उद्देश्य महज यह स्थापित करना है कि गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत सबसे पहले एक हिंदू ने दिया था तो यह सतही सोच और संकुचित आग्रह है। क्योंकि ब्रह्मगुप्त का काल भारतीय (हिंदू) संस्कृति की ज्ञान साधना और वैज्ञानिक सोच-समझ का काल था, इसलिए महत्वपूर्ण वह दृष्टि और चिंतन है, जिसने इस संस्कृति को विश्व में शिखर पर पहुंचाया। यह धारा आस्था की फाइल को भी तर्क के पासवर्ड से खोलने वाली धारा है।  हमने मान लिया इसलिए ऐसा है, इस निर्बुद्धता को नकारने वाली धारा है। यह पाखंड, आडंबर और बुद्धिहीनता को हतोत्साहित करने वाली धारा है। वह प्राचीनता की आरती उतारते रहने के बजाए वर्तमान और भविष्य से दो चार होने वाली दृष्टि की धारा है। वह सत्य को तर्क के  आधार पर स्वीकारने की धारा है। वह हिंदुत्व को पोंगापंथ से दूर रखने वाली धारा है। वह प्रश्न करने वाली और विचार मंथन से उसका समाधान खोजने वाली धारा है। वह ‘बाबा वाक्यम प्रमाणम’ की मनोवृत्ति को अमान्य करने  और केवल प्रतीकवाद में संस्कृति का चेहरा देखने की सोच को रिजेक्ट करने वाली धारा है। देवनानी ने हमारा ज्ञान बढ़ाया, अच्छा किया। लेकिन बेहतर  यह होगा कि प्राचीन ज्ञान ( वो जैसा भी है)  आधुनिक भारतीय भाषाअों में अनूदित होकर लोगों तक पहुंचे। दुर्भाग्य से इस दिशा में कोई ठोस काम न तो हो रहा है और न ही संस्कृति के आराधकों की इसमें कोई रूचि है।  हमारे पास ज्ञान पहले से है, यह भजने भर से क्या होगा? दुनिया थोड़े ही मानेगी। उसे उसके सही रूप में सामने लाना भी हमारा ही कर्तव्य है। प्राचीन ज्ञान को वर्तमान की कसौटी पर परखना ही वास्तविक ज्ञान साधना है और यही सच्चा हिंदुत्व भी है। कहना मुश्किल है कि देवनानी के ज्ञानकोष में इसकी गुंजाइश है या नहीं?

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