भाजपा में कोई तोगडि़या का एनकाउंटर क्यों कराना चाहेगा?

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सोमवार को दिन में कोई दस-बारह घंटे गायब या गुमशुदा रहे विश्व हिन्दू परिषद के फायरब्राण्ड नेता और संगठन के अंतर्राष्ट्री य कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया की गुमशुदगी और प्रगटीकरण के साथ कई सवाल गुंथे हुए हैं। मंगलवार को गुमशुदगी का नकाब हटाने के बाद मीडिया के रूबरू उन्होंने भूमिगत होने के जो कारण बताए, वो रहस्य को गहराने वाले हैं। टीवी स्क्रीन पर प्रथमदृष्ट्या यह महसूस हुआ कि सवाल-जवाबों के दौर में वो अपने भीतर छिपे किसी अज्ञात भय को संभाल और छिपा कर चल रहे थे कि वह मीडिया के सामने कहीं बाहर नहीं आ जाए। लेकिन उनकी भीगी आंखें उनके इस शौर्य-प्रदर्शन की कलई खोल रही थीं।
मीडिया से तोगड़िया की मुलाकात अपने पीछे अनुत्तरित और आधे-अधूरे सवालों का काफिला छोड़ गई है। उनके आरोपों के बाद सबसे सनसनीखेज सवाल यह उभर रहा है कि गिरफ्तारी के बहाने कोई प्रवीण तोगड़िया का एनकाउंटर क्यों करवाना चाहता है ? राजनीतिक हलकों में इसकी पड़ताल लंबे समय तक चलती रहेगी। केन्द्रीय जांच एजेन्सी आयबी पर उनके आरोप मोदी-सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं। आरोप इस बात की बानगी हैं कि भाजपा सहित संघ परिवार के सहयोगी संगठनों में जो कुछ चल रहा है, उसमें कटुता और कलह का इंडेक्स कितनी ऊंची छलांगें लगा रहा है ? राजनीतिक हलकों में ये खबरें पुरानी हो चुकी हैं कि संघ और प्रवीण तोगडि़या के बीच सब कुछ ठीक नहीं हैं। इस मर्तबा उनके विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी प्रमुख बनने के पहले संघ और बीजेपी के एक गुट के नेता यह नहीं चाहते थे कि वो चुनाव लड़ें। लेकिन भुवनेश्वर की मीटिंग में उनके शक्ति-प्रदर्शन के बाद आरएसएस उन्हें तीन साल के लिए कार्यकारी प्रमुख बनाने पर सहमत हो गई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से तोगड़िया की अदावत के किस्से भी छिपे नहीं हैं।
सवाल यह है कि तोगड़िया के प्रति संघ का मोह-भंग या मोदी से उनकी अदावत का स्वरूप क्या इतना विकराल और वीभत्स है कि वो उनकी जान लेने पर आमादा हो जाएं? संघ की यह कार्यशैली नहीं है और मोदी को इसकी जरूरत नहीं है। दोनों में इतना सामर्थ्य है कि बिना कुछ कहे-सुने वो प्रवीण तोगड़िया को सार्वजनिक जीवन के अज्ञात किनारों पर छोड़ सकते हैं। किसी जमाने में संगठन के सबसे ताकतवर नेता संजय जोशी का हश्र सबको पता है। संजय जोशी भाजपा और संघ के गलियारों में आज भी सार्वजनिक जीवन में अपने नए पते-ठिकाने की तलाश में भटक रहे हैं। एनकाउंटर का आरोप लगाकर कहीं तोगड़िया अनावश्यक सनसनी पैदा करके दबाव की राजनीति का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे हैं?
फिलहाल राजस्थान के गंगापुर कोर्ट ने एक दंगे के मामले में तोगड़िया के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। इसी तारतम्य में राजस्थान पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची थी। इसके पहले गुजरात में ही गैर-जमानती वारंट के कारण उन्हें कोर्ट में पेश होना पड़ा था। तोगड़िया का कहना है कि उनके विरुध्द पंद्रह-बीस साल पुराने मुकदमे इसलिए खोले जा रहे हैं कि उन्हें जेल की सलाखों में ढकेल दिया जाए और वो बाहर नहीं आ सकें। तोगडि़या चाहते हैं कि उनके खिलाफ यह मुकदमेबाजी बंद होना चाहिए।
सवाल यह है कि जब उत्तर प्रदेश की योगी-सरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ 22 साल पुराना मुकदमा वापस ले सकती है तो प्रवीण तोगड़िया के खिलाफ दर्ज मुकदमों में भी भाजपा अपनी राज्य-सरकारों को मुकदमे वापस लेने की हिदायत क्यों नहीं दे रही है? उल्लेखनीय है कि उप्र सरकार ने 27 मई 1995 को गोरखपुर के पीपी गंज थाने में दर्ज मुकदमे मे योगी के साथ-साथ मौजूदा केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ल समेत 13 लोगों को छोड़ दिया है। इन लोगों के खिलाफ कोर्ट ने गैर जमानती वारण्ट भी जारी किया था। मुकदमे वापसी का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो रहा है। योगी सरकार ने इसके लिए कानून बना दिया है। इसके तहत उत्तर प्रदेश पुलिस व्दारा दर्ज 20000 राजनीतिक मुकदमे वापस लिए जा रहे हैं। योगी का कहना है कि ये प्रकरण वर्षो से लंबित पड़े हैं, इन्हें वापस लेने में कुछ बुराई नहीं है। उप्र में बीस हजार मुकदमे वापस करने संबंधी योगी की यह पहल भाजपा की नीतियों में विरोधाभास को प्रदर्शित करती है। जब योगी को मुकदमे वापसी का लाभ मिल सकता है तो प्रवीण तोगड़िया के खिलाफ सौतेला रवैया क्यों अपनाया जा रहा है ?

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