मन ना रंगाए, रंगाए ‘योगी’ सरकारी इमारतें…!

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क्या रंग बदलने से वास्तु और सत्ता की तासीर बदली जा सकती है? या फिर यह सियासी शोशेबाजी है? ये सवाल इसलिए, क्योंकि योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में इन दिनो रंगों की राजनीति हो रही है। मुख्यमंत्री की मंशा के मुताबिक तमाम सरकारी इमारतें भगवा रंग में रंगी जा रही हैं,  वो भी जिनकी आस्था गैर भगवा रंगों में है। योगी सरकार मान रही है कि यूपी का चौतरफा भगवाकरण हो रहा है जबकि लोग पूछ रहे हैं कि इस तुगलकी आदेश का क्या मतलब ? इमारते रंगने से सरकार की छवि और तासीर कैसे बदलेगी?

किसी एक रंग में शहर के रंगे जाने का इतिहास जयपुर का रहा है, जिसे ‘पिंक सिटी’ भी कहा जाता है। कारण कि वहां की ज्यादातर इमारतें गुलाबी रंग में रंगी हैं। उसका अपना एक इतिहास और पर्यटन उद्दयोग के तकाजे हैं। इस पर कोई उंगली नहीं उठी, क्योंकि गुलाबी रंग में सिर्फ गुलाबी जज्बा है। वह प्रेम का रंग है। उससे किसी को सियासी ताकत नहीं मिलती और न ही इसे दुत्कारा जा सकता है। इस अपवाद के अलावा किसी और शहर तो क्या पूरे राज्य की सरकारी इमारतों पर भगवा पोतने के जनून का कोई लाॅजिक समझ नहीं सिवाय इसके कि किसी को यह रंग जान से प्यारा है।

यूपी में इस भगवा ( पुताई के रंगों में यह लाल और पीले कलर का मिक्स)  रंगाई पर सवाल तब उठे, तब हज हाउस की इमारत पर भी यह रंग चढ़ने लगा। हालांकि यह पुताई बिल्डिंग की बाउंड्री वाॅल पर ही हुई थी, लेकिन इससे भी योगी सरकार की नीयत पर शक होने लगा। ज्यादा बवाल मचा तो सरकार ने ठेकेदार पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि भगवा नहीं, पीला रंग जरा गाढ़ा हो गया था। इसके बाद दीवार पर पुराना सफेद रंग फिर पोता गया। लेकिन इसकी सियासी गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी। आॅल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता यासूब अब्बास ने गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि ये सब क्या है? भाजपा भगवा रंगेगी, सपा हरा चुनेगी और बसपा नीला। यह रंगों की राजनीति है, जिससे बचा जाना चाहिए। भाकपा नेता अतुल अंजान ने कहा कि योगी सरकार चाहे तो राज्य विधानसभा की इमारत सहित सभी सरकारी इमारतों का रंग भगवा कर दें, लेकिन रोज़-रोज़ इनका रंग बदल कर देश भर में सामाजिक तनाव पैदा करने की कोशिश न करे। अलबत्ता यूपी के अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री मोहसिन रज़ा ने इस कदम को सही ठहराते हुए कहा प्रतिप्रश्न किया कि  क्या भगवा राष्ट्रविरोधी रंग है? भगवा तो उजाले और ऊर्जा का प्रतीक है। सूरज की पहली किरण जब धरती पर पड़ती है तो यह भगवा रोशनी के साथ आती है। भगवा रंग सकारात्मकता का प्रतीक है। यह भगवान का तोहफ़ा है। जो हज समिति के कार्यालय की दीवारों पर भगवा रंग लगाने के ख़िलाफ़ हैं, वे तिरंगे के केसरिया रंग पर भी आपत्ति कर सकते हैं।

उधर हजहाउस के बाद खबर आई कि लखनऊ के 80 साल पुराने केसरबाग पुलिस थाने को भी भगवा रंग से दिया गया है। यह थाना अब तक लाल- पीले रंग से रंगा था। फिर चर्चा चली कि हापुड़ की कृषि उपज मंडी की इमारत भी भगवा रंग में रंगी जा रही है। सवाल उठे तो तर्क दिया गया कि भगवा ( या केसरिया) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पसंद है। उनका दफ्‍तर पिछले साल ही इस रंग में रंगा गया। वे खुद भी सन्यासी होने के कारण भगवा वस्त्र धारी हैं। चाहते हैं कि चहुंअोर यही रंग दिखे। इसीलिए उन्होंने राज्य की भगवा रंग की पचास सरकारी बसों को हरी झंडी ( इसका रंग बदलना संभव नहीं है) देकर रवाना किया। योगी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर जो बुकलेट छपी वह भी भगवा थी और राज्य सरकार के मंत्रियों और अफसरों की टेलिफोन डायरेक्टरी भी भगवा बनी।

यहां दो बातें हैं। विपक्ष जिसे भगवा रंग बताता है योगी सरकार उसे केसरिया मानती है। केसरिया रंग हिंदू और उससे निकले लगभग सभी धर्मों में बलिदान और शौर्य का प्रतीक है। अगर ऐसा भी है तो राज्य सरकार सारी सरकारी इमारतों को इसी रंग में रंगकर क्या संदेश देना चाहती है? हर किसी इमारत को उसका वास्तु सौंदर्य दरकिनार कर एक ही रंग में पोतने की क्या तुक है? दूसरे, अगर हज हाउस को भी ‘एक रंग’ का हिस्सा बनाना था तो फिर पोता गया भगवा हटाया क्यों गया? समाजवादी पार्टी ने तो आरोप लगा दिया कि राज्य की भाजपा सरकार विकास कार्यों में उसकी नाकामी से जनता का ध्यान हटाने के लिए इमारतों के भगवाकरण में लगी है। इसके जवाब में योगी सरकार के मंत्री दिनेश शर्मा ने कहा कि विपक्ष के पास कोई और मुददा नहीं है।

रंग के तौर पर भगवा और केसरिया कोई खास फर्क न हो, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से जमीन-आसमान का फर्क है। सियासी दृष्टि से भगवा ज्यादा फायदेमंद और दबंगई लिए हुए है ज‍बकि केसरिया में निश्छल समर्पण और भक्ति का भाव है। केसरिया हिंदू धर्म का तो भगवा ‘हिंदुत्व’ का प्रतीक है। भगवा पहले सन्यासियों की पसंद था, लेकिन चूंकि अब सन्यासी भी खुलकर राजनीति करने लगे हैं, इसलिए भगवा की निर्मलता पर भी सत्ताकांक्षा के दाग लग गए हैं। उसमें सत्ताधीश होने का फ्लेवर आ गया है और वह अब सत्ता की दीवारों पर ही सजने लगा है। जबकि केसरिया की हदें अभी भी धर्मस्थलों के दायरों और समर्पित भक्ति भाव में सिमटी हैं। हो सकता है कि सारे शासकीय भवनों को भगवा रंग कर योगी सभी को हिंदू बताना चाहते हों, लेकिन हर सरकारी बिल्डिंग भगवा का जयघोष करे, यह तो दुराग्रह है। इससे किसका और क्या फायदा होना है? भगवा को सर्वमान्य  बनाने  के और भी तरीके हैं। अगर योगी सत्ता में सन्यास का फ्लेवर दिखाना चाहते हैं तो भी यह फालतू की मशक्कत है। वे राज्य में जनकल्याण  और ‘सबका साथ’ के सिद्धांत पर ईमानदारी से काम करें तो राज्य में हर बात में भगवा झलकने लगेगा। कबीर ने कहा है- ‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा।‘ योगी भी सुशासन में मन को रंगाएं तो ज्यादा राजनीतिक फायदा होगा बजाए इमारतों का रंग बदलने के।

 

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