मोदीजी, देश में और भी विकसित राज्य हैं गुजरात के अलावा…!

0
22

 

पिछले चार महीने में अहमदाबाद की सड़कों पर दूसरे बड़े विदेशी राजनेता इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रोड-शो ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात-प्रेम को फिर चर्चाओं में ला दिया है। इसके पहले मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ रोड-शो किया था। 13 सितम्बर 2017 को शिंजो आबे मोदी के साथ बुलेट ट्रेन योजना का शुभारंभ करने अहमदाबाद पहुंचे थे। नेतन्याहू का रोड-शो भी शिंजो आबे की तरह विमानतल से शुरू होकर साबरमती आश्रम पर समाप्त हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश-नीति के पुराने तौर-तरीके बदलते हुए विदेशी-प्रमुखों के स्वागत-सत्कार की अपनी एक नई कूटनीतिक-शैली ईजाद की है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू निर्गुट राष्ट्र के नेताओं के साथ तटस्थता के आकाश में शांति के कपोत उड़ाते थे, तो नरेन्द्र मोदी कारोबार की दुनिया में विदेशी राज-प्रमुखों के साथ साबरमती के किनारों पर पतंग उड़ाते दिखते हैं। विदेश-नीति के विशेषज्ञ विदेशी राज-प्रमुखों के साथ रिश्तों में अनौपचारिकता के इस शगल से बहुत अभिभूत नहीं हैं। कूटनीतिक रिश्ते आपसी हितों और स्वार्थों की बुनियाद पर खड़े होते हैं। उनकी मजबूती या कमजोरी निजी रिश्तों से प्रभावित नहीं होती है।
सितम्बर 2014 में मोदी ने गुजरात में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जबरदस्त मेजबानी की थी। शी जिनपिंग का मोदी ने साबरमती रिवर फ्रंट पर शाही-स्वागत किया था। गुजरात में लोकप्रिय झूले पर हिंडोले भरते मोदी और शी जिनपिंग की तस्वीरें खूब सुर्खियों में आई थीं। समीक्षक भारत-चीन के कूटनीतिक रिश्तों की चर्चा के दौरान मोदी और शी जिनपिंग के ’हिंडोला-चिट-चेट’ को जरूर याद करते हैं। भारत-चीन के रिश्तों के बीच खटास में झूलों की तस्वीरों को कटाक्ष के रूप में याद किया जाता है।
देश-विदेश से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के दौरान मोदी का गुजरात-प्रेम हमेशा छलकता रहता है। मोदी ने अहमदाबाद में आयोजित आईक्रिएट-इवेंट में बताया कि वो सितम्बर 2017 में इजराइल प्रवास के वक्त ही बेंजामिन नेतन्याहू को गुजरात का न्यौता दे आए थे। अहमदाबाद में उनकी कोशिश यही थी कि मोदी और नेतन्याहू के मध्य रिश्तों में अपनेपन की कूटनीतिक-फुहारें उड़ती रहें। साबरमती आश्रम के ओटले पर बैठकर मोदी और नेतन्याहू के बीच होने वाली गुफ्तगू का मतलब ही कूटनीति के कैनवास में अनौपचारिकता के रंग भरना था, वहीं साबरमती के घाट पर पतंगबाजी के ठुमकों में भी निजता की खनक सुनाई पड़ती है।
विदेशी-प्रमुखों के साथ मोदी के इस कूटनीतिक-अंदाज में भविष्य का रेखांकन सरल नहीं है। उनकी कोशिशें ईमानदार हो सकती हैं, लेकिन जरूरी नहीं है कि उनके सामने मौजूद राजनयिक भी वैसे ही सोचें और व्यवहार करें। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की धोखाधड़ी देश देख चुका है और शी जिनपिंग के साथ झूले पर प्रेमालाप भी चीन से रिश्तों में काम नहीं आ रहा है। लोग भूल नहीं पाए हैं कि प्रेमालाप की गर्मी ठंडी होने के पहले ही चीनी-सैनिक अरुणाचल में घुस आए थे।
मोदी-सरकार के प्रारम्भिक-दौर में विदेशी अतिथियों के साथ मोदी की सेल्फी-डिप्लोमैसी काफी चर्चित हुई थी। विदेशी-नेताओं से गले लगने-लगाने को भी प्रोटोकॉल के किताबों में खूब खंगाला गया था। जाहिर है कि मोदी का कूटनीतिक-अंदाज हमेशा चर्चाओं के केन्द्र में रहा है। नेतन्याहू के अहमदाबाद प्रवास के बाद ताजा सवाल है कि मोदी विदेशी-प्रमुखों को सिर्फ अहमदाबाद याने गुजरात ही क्यों ले जाते हैं? एक राष्ट्र के प्रधानमंत्री के नाते अहमदाबाद से मोदी के लगाव का यह ’फेवीकोल’ देश के अन्य उन्नत राज्यों की ओर सौतेलेपना का इशारा करता है। राष्ट्रीय नेता के नाते ’एफिनीटी’ गैर-जरूरी और अनपेक्षित है। वैसे भी मोदी की भाषण-शैली और राजनीतिक-शैली को लेकर लोगों के मन में यह सवाल हमेशा कौंधता रहता है कि वो भारत के कम, भाजपा के प्रधानमंत्री ज्यादा हैं। उनका गुजराती-रुझान उन्हें पक्षपात के कठघरे में खड़ा करता है। गुजरात के चुनाव में उनका खुद को गुजरात का पर्याय निरूपित करना लोगों ने इसलिए हजम कर लिया कि वो एक राजनीतिक लड़ाई जीतना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में विदेशी हस्तियों के सामने सिर्फ गुजरात का बखान उनकी हस्ती को शर्मिंदा करता है।
उनके द्वारा सिर्फ गुजरात की बात करना उन राज्यों के साथ अन्याय करना है, जो जीडीपी ग्रोथ में उससे आगे हैं। ताजा सर्वे के मुताबिक जीडीपी ग्रोथ में महाराष्ट्र, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल गुजरात से ऊपर हैं। दुनिया के तेज विकसित होते शहरों में अहमदाबाद 105 वें स्थान पर है। उसके पहले, कोलकाता 42 वें, दिल्ली 37 वें और मुंबई 29 वें स्थान पर है। चेन्नई, हैदराबाद, बैंगलुरू भी उससे ऊपर आते हैं। मोदी को इन तथ्यों का क्या जवाब देगे?

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY