‘मोदी’ के ट्वीटर ने ‘मोदी’ से पूछा : पुराना पाप आज पुण्य कैसे…?

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सोशलिस्ट पोलिटिक्स के पक्षधरों या गरीबों के लिए यह खबर बेचैन करने वाली है कि देश के खुदरा कामकाज में भी अब विदेशी कंपनियों का दखल बढ़ जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने रक्षा, फार्मा, नागरिक उड्डयन के साथ ही भारत में बने खाद्य पदार्थों पर विदेशी निवेश की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दी है। सरकार ने इसे आर्थिक सुधारों की दिशा में नवम्बर 2015 के बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम निरूपित किया है। इससे देश में विदेशी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनेगा और रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। तत्काल यह आंकना संभव नहीं है कि सिंगल ब्राण्ड रीटेल याने एकल ब्राण्ड खुदरा कारोबार में विदेशी निवेशकों का शत-प्रतिशत निवेश कितने रोजगार पैदा कर सकेगा?
मोदी-सरकार के इस निर्णय ने जीएसटी और नोटबंदी से परेशान देश के कारोबारियों के सामने नई समस्या खड़ी कर दी है। फैसला इसलिए भी चौंकाता है कि चार साल पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं नरेन्द्र मोदी ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खिलाफ आसमान सिर पर उठा लिया था। यूपीए-2 के कार्यकाल में एफडीआय का विरोध करने वालो में मोदी सबसे आगे थे। मोदी-सरकार के इस फैसले के साथ ही नरेन्द्र मोदी का एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जो उनके और भाजपा के विरोधाभासी राजनीतिक चरित्र को उजागर करता है। ट्वीट की भाषा काफी आक्रामक थी। मोदी के ट्वीट में कहा गया था कि- ‘कांग्रेस सरकार एफडीआय के जरिए विदेशियों को देश दे रही है। ज्यादातर पार्टियों ने एफडीआय का विरोध किया, मगर सीबीआय की धार की वजह से कुछ ने वोट नही दिया और कांग्रेस बैक-डोर से जीत गई।’ मोदी का यह ट्वीट कोई दो हजार बार रिट्वीट हो चुका है। मुख्यमंत्री के नाते मोदी का यही ट्वीट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल कर रहा है कि चार सालों में ऐसा कौन सा परिवर्तन हो गया है कि जो विदेशी पूंजी निवेश चार साल पहले पाप था, वह एकाएक पुण्य हो गया है?
देश अजीबोगरीब आर्थिक परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है। दो दिन पहले उत्तर प्रदेश में आलू की फसल की बर्बादी के किस्से सुर्ख थे। उसके पहले प्याज की कहानी खलिहानों को गमजदा किए थी। किसानों की आत्महत्याएं खत्मह होने का नाम नहीं ले रही हैं और सपनों की सौदागर मोदी-सरकार गरीब आंखों की भीगी कोरों को सपनों के सुरमे से सजाने में मशगूल है। विदेशी पूंजी निवेश के मंगल-गानों से गरीबों की थाली में दिया जलने वाला नहीं है। फोर्ब्स इंडिया की जारी सूची में मुकेश अंबानी के सबसे ज्यादा अमीर बनने की कहानी या उनकी 38 अरब डालर की दौलत से देश की गरीबी और गुरबत का नसीब बदलने वाला नहीं है। विदेशी पूंजी निवेश, पूंजीपतियों की तिजोरी के लिए भले ही फायदेमंद हो, उससे गरीबों का नसीब बदलने वाला नहीं है।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव की एक प्रतिक्रिया को सोशल मीडिया पर हंसी-ठट्टे की आड़ में खारिज करना मुनासिब नहीं होगा। लालू यादव ने इसे गरीब विरोधी कदम बताते हुए ट्वीटर पर लिखा है कि ‘प्रधानमंत्री मोदी शायद भारतीय उत्पादक क्षेत्र में हार स्वीकार कर चुके हैं। तभी उन्होंने रक्षा के क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआय लागू कर दिया है।’ हालांकि कुछ लोगों ने उनके ट्वीट की यह कहकर हंसी उड़ाने की कोशिश की है कि लालू को एफडीआय और चारे में फर्क समझना चाहिए। लेकिन लालू की खिल्ली उड़ाने वाले लोग शायद यह भूल गए कि जब लालू रेलमंत्री थे, तब बड़े-बड़े प्रबंध गुरू, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे विश्व विख्यात आयआयएम में प्रबंधन पर विशेष भाषण देने के लिए उन्हेंर बुलाते थे।
फोर्ब्स इंडिया के बीस अमीरों सूची के साथ इस बात का उल्लेख कहीं नहीं है कि देश के आठ राज्यों की अधिकतम आबादी अफ्रीकी देशों से ज्यादा गरीबी और दरिद्रता की शिकार है। शायद इसीलिए स्वदेशी तरीकों से सोचने वाले अर्थशास्त्री विदेशी पूंजी और उदारीकरण की विकास की तरकीबों को जॉबलेस ग्रोथ निरूपित करते हैं। यह सावधानी रखना होगी कि भारत कहीं विदेशी पूंजी निवेशकों का चारागाह बनकर नहीं रह जाए…।

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