मोदी-थीसिस: ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के राजनीतिक-निहितार्थ

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लोकसभा में बजट-सत्र के पहले दिन अभिभाषण में राष्ट्रपति की दलीलों के बाद देश की सियासत में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की पुरानी थीसिस पुराने तथ्यों और नए तर्कों के साथ नई जिल्द में देश के सामने है। राष्ट्रपति की दलीलों पर राजनीतिक शास्त्रार्थ शुरू हो चुका है और पार्टियों के वकीलों ने उनकी दलीलों को खंगालना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई दिनों से लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की वकालत कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस विचार-प्रक्रिया में उत्प्रेरक (केटेलिटिक-एजेंट) की भूमिका में यूं ही सक्रिय नहीं है। संघ बखूबी वाकिफ है कि इस पहल का अंक-गणित भाजपा की गणनाओं को सुर्ख बनाने वाला है। भाजपा से इतर राजनीतिक दल इस बात को समझ रहे हैं कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की मोदी-थीसिस के राजनीतिक-निहितार्थ लोकतंत्र में लोकहित के लोक-रंगों की पावन रंगोली मात्र नही हैं। इस रंगोली में केशिरया रंगों की साजिशों को अनदेखा करना उनके लिए संभव नहीं है।
देश में तीस साल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबसे ताकतवर राजनेता के रूप में उभरे हैं। उनका अपना सख्त और बेमुरव्वत राजनीतिक-एजेण्डाू है। लोकतंत्र के नाम पर वो लोकतंत्र के लिए जरूरी विपक्ष के लिए कोई स्पेस, नहीं छोड़ना चाहते हैं। उनके आसपास विरोधियों के लिए कोई नरमी या रियायत देखने को नहीं मिलती है। ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की पहल भी उनकी निष्ठुर-आकांक्षाओं की उड़ान है। यह लोकतंत्र के उन सभी परिन्दों को पस्त करने का राजनीतिक उपक्रम है, जिनकी राजनीतिक-दुनिया छोटे-छोटे घोसलों में सिमटी है।
फिलवक्त देश में एक भी दल ऐसा नहीं है, जो भाजपा के संगठन और सत्ता के सामने टिक सके। मोदी संगठन की ताकत से हार को जीत में बदलना जानते हैं। गुजरात में वो यह दिखा चुके हैं। संगठन-शक्ति के मामले में कांग्रेस समेत अन्य पार्टियां भाजपा के सामने बेहद कमजोर हैं। जाहिर है इस पृष्ठभूमि में लोकसभा और विधानसभा के एकजाई इलेक्शन में भाजपा से निपटना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा। फिर मोदी-सरकार ने सुनियोजित तरीके से विपक्षी पार्टियों के संसाधनों को कुतरना भी शुरू कर दिया है। चुनाव-सुधार के नाम पर इलेक्शन-बॉण्ड का जो खेल शुरू हुआ है, उससें सिर्फ सत्तारूढ़ भाजपा का ही पेट भरने वाला है। किसी भी कार्पोरेट में इतना साहस नहीं है कि वो सत्तारूढ़ दल की आंखों का इशारा नहीं समझे। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की सदारत में भाजपा के कारिन्दे कार्पोरेट घरानों को घेरने में माहिर हैं।
भाजपा के दबदबे की बानगी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ताजा रिपोर्ट में मिलती है। इसके अनुसार पिछले चार सालों में इलेक्टोरल-ट्रस्ट के माध्यम से विभिन्न दलों को मिले 637.54 करोड़ रुपयों में से 488.94 करोड़ रुपए भाजपा के खातो में जमा हुए हैं। कांग्रेस को 86.65 करोड़ रुपयों का चंदा मिला है। सत्ता का सुरूर बढ़ने के बाद 2016-17 में तो हालात लगभग एकतरफा ही रहे हैं। इस दौरान भाजपा को कुल राशि का 89.22 फीसदी यानी 290.22 करोड़ रुपए चंदा मिला। शेष दलों को कुल 35.05 करोड़ मिले, जिसमें कांग्रेस की खुराक मात्र 16.5 करोड़ है। मोदी ने ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं कि संसाधनों के मामले में सभी दल भाजपा के सामने बौने हैं। यदि देश ‘एक राष्ट्र,एक चुनाव’ की थीम पर आगे बढ़ा तो संसाधनों की मार से अधमरा विपक्ष पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएगा।
चुनाव की यह थीम राजनीतिक दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी के सबसे ज्यादा अनुकूल है। सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ यह होगा कि चुनाव सुधार के नाम पर इस खेल में मोदी को अपने प्रधानमंत्रित्व की उपलब्धियों की ऑडिट-रिपोर्ट जनता के सामने पेश नहीं करना पड़ेगी। किसी भी सत्ता पार्टी के लिए इससे सुखद क्या हो सकता है कि बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, खेती-किसानी हाशिए पर सरक जाएं और चुनाव-सुधार, सांप्रदायिकता या छद्म-राष्ट्रवाद के अमूर्त मुद्दे लोगों के जहन पर हावी हो जाएं।
वैसे एक साथ चुनाव का रोडमैप तैयार करना आसान नहीं है। नीति-आयोग ने कहा है कि एकीकृत चुनाव की दिशा में 2024 से व्यवस्थित काम शुरू हो सकता है। ऐसे चुनाव पहले भी होते रहे हैं। 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एकसाथ होते थे। 1971 के बाद यह क्रम बिगड़ा है। मोदी का तर्क है कि लगातार चुनाव के कारण विकास कार्यों में बाधा आती है। एक साथ चुनाव से कई हजार करोड़ रुपयों की बचत होगी। मोदी के पहले भी कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के कई नेता इस मुद्दे पर बहस करते रहे हैं। यह काम बगैर आम-सहमति के संभव नहीं है। फिर पांच साल के लिए केन्द्र और राज्यों में किसी एक पार्टी के नाम सत्ता का पट्टा लिख देने के दुष्परिणामों का आकलन भी जरूरी है। यह प्रक्रिया लोकतंत्र में निरंकुशता का सबब भी हो सकती है। चुनाव लोकतंत्र को लचीला और संवेदनशील बनाते हैं। लोगों का कहना है कि यदि गुजरात के चुनाव नहीं होते तो क्या जीएसटी को व्या वहारिक और लचीला बनाने की पहल मोदी-सरकार करती? ज्यादातर का मानना है कि ऐसा नही होता…!

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