मोदी सुनिश्चित करें कि विदेशी पूंजी गरीबों के लिए भी है ?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दावोस-यात्रा भारत के आर्थिक उन्नय की दृष्टि से महज इसलिए खुशी का लम्हा नहीं हो सकती कि विश्व की इस महत्वपूर्ण आर्थिक-पंचायत वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री विकास के मुद्दों पर दुनिया को संबोधित करेगा। इसकी ऐतिहासिक महत्ता इऩ तथ्यों में निहित है कि हमारे प्रधानमंत्री देश के लिए कौन से आर्थिक-उपहारों के साथ स्वदेश लौटने वाले हैं? इन सौगातों का लोगों को बेसब्री से इंतजार है। वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम दुनिया के गरीबों के लिए फिकरमंद दयावान राष्ट्रों का फोरम नहीं है। यह रूस, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे घाघ राष्ट्रों का जमावड़ा है, जो विकाशशील देशों की तकदीर से अपने भाग्य की लकीरों को सोने से मांडना चाहते हैं।
भारत की उभरती अर्थ-व्यवस्था और विशाल आबादी व्यापरी देशों के लिए बड़े मार्केट के रूप में सबसे ज्यादा ‘ल्युक्रेटिव’ और फायदेमंद है। इसकी बानगी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट में देखने को मिलती है कि 2018 में भारत की विकास दर 7.4 फीसदी रहेगी। और 2019 में यह 7.8 फीसदी हो जाएगी। मुद्रा कोष की नजर में भारत एक उभरती हुई, चीन को पीटती हुई अर्थ व्यवस्था महज इसकी विशाल आबादी के कारण है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष या विश्व बैंक जैसी विदेशी संस्थाओं की लुभावनी रिपोर्टों का अपना एजेण्डा होता है, जो गुदगुदाने वाली गफलतों में गाफिल कर देता है। भारत के आर्थिक सपनों में मस्ती घोल कर विकसित राष्ट्र भारत के मार्केट पर कब्जा करके अपनी इकॉनमी को मजबूत करना चाहते हैं।
घाघ राष्ट्रों से सौदेबाजी के कूटनीतिक-खेल में अपने देश के हितों की रक्षा और बढ़त हासिल करना मोदी की सबसे बड़ी परीक्षा है। उम्मीदें इसलिए बंधती हैं कि मोदी खुद को ‘गुजराती’ कहते हैं और हिन्दुस्तानियों को भरोसा है कि ‘गुजराती’ अच्छे व्यापारी होते हैं। भारतीय जनता मोदी के राजनीतिक-हुनर की कायल है और दावोस में अपने प्रधानमंत्री मोदी की व्यापारिक-मेधा कसौटी पर है।
विदेश-यात्राओं में मोदी पहले भी शीर्ष कम्पनियों के प्रमुखों से बातचीत करते रहे हैं। वर्ल्ड इकॉनामी फोरम में भी मोदी ने इस एजेण्डे को बढ़ाते हुए दुनिया की शीर्ष कम्पनियों के सीईओ को भारत की ओर खींचने का प्रयास किया है। लेकिन इन प्रयासों में मोदी के साथ मुकेश अंबानी, गौतम अडानी, अजीम प्रेमजी, राहुल बजाज, एन. चंद्रशेखरन, चंदा कोचर जैसी कार्पोरेट- हस्तियों की मौजूदगी के मायने भी गौरतलब हैं। यह देखना और समझना होगा कि विदेशों में पूंजी की तलाश में देश की खेती-किसानी और गरीबी कहां पर खड़ी है? अथवा मोदी की यह पड़ताल महज देश के कार्पोरेट घरानों की हैसियत में चार चांद लगाने वाली है? राजनीति में मोदी के खिलाफ यह मुद्दा बन चुका है कि राफेल के सौदे में उन्होंने अनिल अंबानी को हजारों करोड़ रुपयो का काम दिला दिया है।
जबकि प्रधानमंत्री मोदी देश-विदेश की शीर्ष कंपनियो के लिए भारत में खुले दिल से अवसरों के दरवाजे खोल ही रहे हैं, उन्हें गली-कूंचों में खड़ी भारत की गरीबी और गुरबत के अफसानों को नहीं भूलना चाहिए। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्टों में जब भारत की इकॉनामी आसमान में कुलांचे भरती दिखाई जा रही है, इंटरनेशनल राइट्स समूह ऑक्सफेम इंडिया भारत की आर्थिक असमानता की दयनीय तस्वीर लेकर सामने आया है। ऑक्सफेम ने भी रिपोर्ट दावोस-सम्मेलन के पहले लोगों को आगाह करने के हिसाब से ही जारी की है।
ऑक्सफेम के अनुसार भारत में 2017 में कुल संपति के सृजन में 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में आया है। इसमें कहा गया है कि 67 करोड़ भारतीयों की सम्पत्ति में सिर्फ एक फीसदी वृध्दि हुई है। जबकि वर्ष 2017 में 101 अरबपतियों की संपत्ति 4.89 लाख करोड़ से बढ़कर 20.7 लाख करोड़ हो गई है। अरबपतियों की संख्या में 2017 में ऩए बने 17 अरबपति भी शरीक हैं। उल्लेखनीय है कि 4.89 लाख करोड़ का यह आंकड़ा कई राज्यों के शिक्षा और स्वास्थ्य के बजटों की 85 फीसदी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दावोस-सम्मेलन में इस पर अलग से चर्चा होती है।
ऑक्सफेम इंडिया के अनुसार देश में अरबपतियों की बढ़ती जनसंख्या सम्पन्न अर्थ-व्यवस्था का नहीं, बल्कि कमजोर अर्थ-व्यवस्था का लक्षण है, जहां दो जून रोटी जुटाना भी मुश्किल होता है। प्रधानमंत्री को सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की अर्थ व्यवस्था सभी के लिए काम करती है, न कि सिर्फ चंद लोगों के लिए….। दावोस जैसे आर्थिक-मंचों पर होने वाली सैध्दांतिक-परिकल्पनाओं में शाब्दिक-पराक्रम की घुड़दौड़ का मुकाबला करना आसान नहीं है। उनकी रफ्तार भी बेमिसाल होती है। उसका मुकाबला आसान नहीं हैं। अर्थ-तंत्र का यह इंद्र-जाल शब्दों में लुभावने रंग बिखेरता है। दावोस के सम्मेलन की थीम भी काफी लुभावनी है- खंडित विश्व में साझा भविष्य बनाना है…। ऐसे सम्मेलनों की साझेदारी हमेशा सवालिया रही है।

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