राजनीति के ‘वायरस’ ने सुप्रीम कोर्ट की ‘फायरवॉल’ में सेंध लगाई

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यह सवाल लोगों को परेशान कर रहा है कि अड़सठ साल पुरानी सुप्रीम कोर्ट की परम्परागत और विश्वसनीय ‘फायरवॉल’ में राजनीति के रोगाणु सेंध लगाने में कैसे और क्यों सफल हो सके? ‘फायरवॉल’ कम्प्यूटर की दुनिया में प्रचलित शब्द है। कम्प्यूटर में खतरनाक और दूषित वायरस की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए ‘फायरवॉल’ नेटवर्क सिक्यूरिटी सिस्टम का प्रचलन और उपयोग आम है। कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में भी आग-पानी अथवा भवनों के ढह जाने की दशा में सुरक्षा के लिए ‘फायरवॉल’ होती है। ‘फायरवॉल’ एक सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर है जो निर्धारित नियमों के तहत आने-जाने वाले नेटवर्क के ट्राफिक का नियमन करता है। विश्वसनीय नेटवर्क और अविश्वसनीय नेटवर्क प्रणालियों के बीच ‘फायरवॉल’ बैरियर की तरह होता है। सुरक्षित नेटवर्क और असुरक्षित नेटवर्क के बीच ‘फायरवॉल’ का बैरियर सुनिश्चित करता है कि कोई भी निजी चीज बाहर नहीं जा रही है और कोई भी दुर्भाग्यपूर्ण चीज अंदर नहीं आ रही है।
यह उत्तर मिलना आसान नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट की फायरवॉल को भेद कर देश के शीर्षस्थ न्यायाधीशों और न्यायविदों के बीच अविश्वास का वायरस क्यों सारी न्याय-प्रणाली को ध्वस्त करने पर उतारू है ? संविधान के अनुसार 28 जनवरी 1950 को स्थापित भारत की सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संघीय न्यायालय और भारतीय संविधान के संरक्षक की है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत के प्रमुख न्यायाधीश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के ही चार वरिष्ठ जजों की बगावत को महज न्यायपालिका का मसला कह कर छोड़ देना मुनासिब नहीं होगा। चार शीर्ष न्यायाधीशों व्दारा उठाए गए सवाल सुप्रीम कोर्ट की मजबूत फायरवॉल की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में पहली पायदान पर विराजमान प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के अगले क्रम में दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं पायदान पर खड़े न्यायाधीशों के असंतोष की चिंगारियों को तालमेल और समझौतों की राख में ढंकना मुनासिब नहीं है। देश की सर्वोच्च न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है कि पांच शीर्ष न्यायाधीशों के बीच विवादों के कुहासे को साफ किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट बार-एसोसिएशन ने राजनीतिक दलों को आगाह किया है कि वो न्यायपालिका की देहरी लांघने की कोशिश नहीं करें? यह एक अच्छी पहल है, लेकिन जजों के बीच विवाद के मुद्दों की राजनीतिक-रंगत उनकी इस पहल को आसानी से सफल नहीं होने देगी। इसे न्यायाधीशों के अहम् का टकराव मानना इसका राजनीतिक-सरलीकरण करना होगा।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के विरुध्द खड़े चारों न्यायाधीशों में जस्टिस रंजन गोगोई अक्टूबर 2018 में दीपक मिश्रा के बाद भारत के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। कॅरियर के हिसाब से उनके रोडमैप में कोई गफलत नहीं है। अंतरात्मा की आवाज पर तीन अन्य जजों के साथ जस्टिस गोगोई का खड़ा होना इस बात का संकेत है कि गड़बड़ियां मामूली नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में यह सवाल रहस्य के परदे उघाड़ कर सामने खड़ा है कि सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न मसलों को सुनने के लिए न्यायाधीशों की बैंचों का गठन क्या राजनीति की पसंद को ध्यान में रख कर किया जा रहा है? क्या सुप्रीम कोर्ट की फायरवॉल में राजनीति का वायरस सब कुछ तहस-नहस कर रहा है?
लोकतंत्र के नाम पर लड़े जाने वाले इस न्यायिक-महायुध्द में देश का न्याय-जगत दो हिस्सों में बंट चुका है। जस्टिस पीबी सावंत, जस्टिस एपी शाह, जस्टिस के. चंद्रू और जस्टिस एच. सुरेश ने दीपक मिश्रा के खिलाफ आवाज उठाने वाले चार जजों का समर्थन करते हुए कहा है कि वो जजों व्दारा उठाए गए मुद्दों से सहमत हैं। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी चीफ जस्टिस को यह सुझाव दिया है कि विवाद निपटने तक महत्वपूर्ण मसलों को पहले चार वरिष्ठ जजों की बैंचों की सौंपा जाए। यह न्यायविदों का दूसरा वर्ग जजों की खुली पत्रकार-वार्ता से असहमत है। जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने नाराजी व्यक्त करते हुए कहा है कि इन न्यायाधीशों ने लक्ष्मण-रेखाओं को लांघा है। यदि चीफ जस्टिस से वो असहमत हैं, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।
बहरहाल, जो कुछ हुआ है, वो जता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं हैं। न्यायपालिका पर लोगों का अटूट भरोसा है,लेकिन उसका आभा-मंडल अब खंडित होता प्रतीत हो रहा है। भारतीय गणतंत्र के सामने यह सबसे बड़ा सवाल है कि न्यायिक-अस्त्र भोंथरा होने के बाद लोकतंत्र की नियति क्या होगी? न्यायपालिका के भीतर और बाहर इस पर खुली बहस होना चाहिए।

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