विजेता महिला बाॅक्सरों का सरकारी गायों से हार मान लेना..!

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राष्ट्रीय बाॅक्सिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली हरियाणा की महिला बाॅक्सरों ने गायों से हार मान ली है। ये गायें हरियाणा सरकार ने उन्हें बतौर विजेता भेंट की थीं। इन छह में से तीन महिला बाॅक्सरों ने तौबा करते हुए ये गायें राज्य सरकार को लौटा दी हैं।  कहकर कि ये गायें दूध देने के बजाए घरवालों पर हमला करती हैं। चूंकि ये महिला बाॅक्सर इंसानी बाॅक्सिंग में ही माहिर हैं, इसलिए उन्होने गायों को लौटाना ही बेहतर समझा। एक बाॅक्सर ज्योति ने तो यह भी कहा कि हम तो अपनी भैंसों के साथ ही खुश थे। इसका अर्थ यह है कि हरियाणा की भैंसे गायों की तुलना में ज्यादा अनुशासित और उपयोगी हैं। यह प्रसंग इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि जब इन विजेता बाॅक्सरों को बतौर इनाम गायें भी दी गई थीं तो कई सवाल उठे थे। अमूमन विजेताअो को इनाम के बतौर मेडल अथवा नकद राशि देने का चलन तो है, लेकिन किसी ‘उपजाऊ’ दिमाग से मेडल के साथ बाॅक्सरों को गायें भेट करने का नवाचार निकला। यह खयाल अपने आप में रोमांटिक भी था कि एक तरफ बाॅक्सिंग के रियाज में पसीना बहाती बेटियां और उनकी थकान मिटाने और ज्यादा ताकत दिलाने के लिए जरूरी दूध मुहैया कराने घर के आंगन में बंधी सरकारी गैंया।। जिस ढंग से यह विचार जन्मा और अमल में लाया गया, उससे छहों बाॅक्सरों का अोलंपिक मेडल भी पक्का माना जाना चाहिए था। लेकिन गायों के दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका।

बहरहाल हरियाणा सरकार खेलों और गायों को कितना महत्व देती है, यह बात इसी पहल से साफ हुई कि उसने  खिलाडि़यों की तंदुरूस्ती के लिए आवश्यक दूध के लिए सीधे गाय ही मुहैया करा दी। यह वैसा ही था कि गहनो में हीरा जड़वाने कोई डायमंड खदान ही अलाॅट करा ले। इसमें सरकार की नेक नीयती यह थी कि जब घर में ही गाय होगी तो खिलाडि़यों को दूध बाहर से नहीं खरीदना पड़ेगा। साथ ही सरकार की गोरक्षा प्रतिबद्धता का संदेश खेल के मैदानों तक भी जाएगा। इसीलिए पिछले साल गुवाहाटी में हुई नेशनल बाॅक्सिंग चैम्पियनशिप में राज्य  की 6 बाॅक्सरों ने जब मेडल जीता तो हरियाणा सरकार ने इसे गायों से जोड़कर देखा। ये सभी खिलाड़ी जब अपने राज्य लौटीं तो वहां की खट्टर सरकार ने नवोन्मेषी कदम उठाते हुए रोहतक के राजीव गांधी स्पोर्ट्स स्टेडियम ( इसका नाम अभी तक बदला नहीं गया है) में राज्य की प्रतिभाशाली बाॅक्सर बेटियों का सम्मान कार्यक्रम रखा। इसमें बधाई के साथ सबको एक- एक गाय भी भेंट की गई। इस मौके पर राज्य के कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ ने कहा था कि गाय का दूध पीकर खिलाड़ी सुंदर और स्मार्ट बनेंगी।

लगता है गायों को इस बात का बिल्कुल अहसास नहीं था ‍िक सरकार द्वारा उन्हें किनको और क्यों भेंट किया जा रहा है। वैसे गाय को बुद्धिमान और संवेदनशील प्राणी माना जाता है। लेकिन सरकारी गायों के साथ भी ऐसा ही हो, जरूरी नहीं है। लिहाजा विजेता बाॅक्सरों में से भिवानी की नीतू घंघास और साक्षी कुमार तथा रोहतक की ज्योति गुलिया ने अपनी अपनी गाय यह कहते हुए लौटा दीं कि वो दूध तो नहीं ही देतीं, उल्टे परिवार वालों पर हमले करती हैं। ज्योति ने बताया ‍िक , ‘मेरी मां ने गाय को पांच दिन तक अच्छा खाना दिया लेकिन गाय ने दूध देना तो दूर उल्टा उन्हें तीन बार मारकर घायल कर दिया। इसके बाद मैंने तुरंत गाय वापस कर दी। ज्योति ने यह भी कहा कि हम तो अपनी भैंसो के साथ ही खुश थे। यही नहीं ज्योति के कोच विजय हुडा ने तो साफ कह दिया कि कि अगर गायें दूध नहीं देंगी तो वे खिलाड़ियों के काम की नहीं हैं। तकरीबन यही बात बाॅक्सर नीतू के चाचा और साक्षी के पिता ने भी कही। उन्होने कहा कि कृषि मंत्री ने गाय भेजी, उसने दूध तो नहीं ही दिया, उल्टे वह परिवार के सदस्यों को सींग भी मारती थी। परेशान होकर गाय लौटानी पड़ी। इस बवाल के बाद हरियाणा के कृषि मंत्री ने रक्षात्मक भाव से कहा कि  ‘हम गायों को बेहतर दूध देने वाली गायों से बदलने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें गाय की देखभाल करनी होगी और प्रेम से पालना होगा।

मानना कठिन है कि खिलाडि़यों ने गाय को प्रेम से नहीं पाला होगा, क्योंकि वे गोपालन का पुण्य भला क्यों हाथ से जाने देतीं। चूंकि गायें सरकारी थीं, इसलिए उनसे जज्बाती और जिम्मेदार होने की अपेक्षा ही गलत थी। वे कहीं से लाई गईं और खिलाडि़यों को टिका दी गईं। सरकारी तंत्र केवल आदेश पर अमल में भरोसा करता है। उससे अपेक्षित नतीजे भी आएं, इस दकियानूसी सोच में उसका भरोसा नहीं रहता। सो गायें दी गईं बिना यह देखें भाले कि वह दूध देती भी हैं या नहीं, खिलाड़ी उनका पालन कर भी सकेंगी या नहीं, अगर सरकार को गाय के दूध की चिंता होती तो वह गायें देने के बजाए खिलाडि़यों के दूध का बजट बढ़ाकर नकद पैसे दे देती। लेकिन इससे गौ प्रेम का सार्वजनिक इजहार नहीं होता। उधर खिलाडि़यों के सामने समस्या यह है कि वे बाॅक्सिंग की प्रेक्टिस करें या तोहफे में मिली सरकारी गायों को लाइन पर लाने में वक्त जाया करें। उनके लिए गायों से खुद की रक्षा के बजाए बाॅक्सिंग में डिफेंस के गुर सीखना ज्यादा जरूरी था। इतना करने के बाद भी वो गायें दूध दे देतीं तो भी ठीक था। इससे गायों की उपयोगिता, गाय के दूध की भैंस के दूध से श्रेष्ठता साबित हो जाती और गोपालन के पुण्य की एफडी भी हो जाती। लेकिन गायों को इन सब बातों से कोई मतलब न था। उनका बर्ताव फ्री फंड की गायों जैसा ही था। सरकारी होने के नाते दूध देना  शायद उनके एजेंडे में था ही नहीं। और यह बात हरियाणा की सरकार अभी भी मानने को तैयार नहीं है।

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