अनुपम राजन : पुरातत्व और पर्यावरण की ‘ढलती काया’ को संजीवनी देने का जतन

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दो अलग-अलग विभाग और उनकी अलग-अलग प्रकृति लेकिन क्षरण में दोनों की समानता। जितना व्‍यापक और गहरा क्षरण, उनके संरक्षण की चुनौती उतनी ही जटिल। मसलन, बहुत आम तथ्य है कि हमारा समाज अपनी पुरातात्विक धरोहरों के प्रति अज्ञानी होता जा रहा है। उसका लगाव केवल सेल्फी लेने तक ही सिमटा है। इन स्‍थलों तथा यहां से जुड़े तथ्यों के बारे में सजगता नाममात्र की ही बची है। जैसे, किसी युवा से पूछ लिया जाए कि शालभंजिका क्या है तो वह गूगल करने लगेगा। इसी तरह पर्यावरण के प्रति हमारी चिंता तभी तक होती है जब किसी रिपोर्ट के आंकड़े अखबार में छपते हैं। हम खबर पढ़ केवल दो मिनट मौन साधते हैं (कुछ लोग ही) फिर लंबी उदासी से भर जाते हैं। कभी सोचा ही नहीं कि अपनी गाड़ी का धुंआ, सड़क पर फेंका गया कचरा, कचरे में लगाई गई आग और पॉलीथीन का अंधाधुंध प्रयोग पर्यावरण को बिगाड़ रहा है। ऐसे में हमारी सांसें भी फूल रही हैं और पुरातात्विक महत्व के स्थल भी अस्तित्व खो रहे हैं। इन परिस्थितियों में बदलाव की आस इन विभागों के प्रमुख सचिव/आयुक्त अनुपम राजन के क्रियाकलापों में दिखाई दे रही है। वे कुछ ऐसे कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और कुछ की नींव रख रहे हैं जो राज्य की जर्जर हो रही पुरातात्विक और पर्यावरणीय ‘काया’ को संजीवनी दे सकते हैं।
शालभंजिका मप्र के विदिशा जिले के ग्यारसपुर क्षेत्र से प्राप्त वह खंडित प्रतिमा है जिसका काल 10वीं और 11वीं शताब्दी माना गया है। इसे गूजरी महल ग्वालियर में रखा गया है। अपने अनूठे शिल्प के कारण यह मप्र की शिल्प कला का अद्भुत नमूना कही जाती है। इसके महत्व को सामयिक और लोकप्रिय बनाने के लिए इसकी प्रतिकृति समारोह में अतिथियों को स्मृतिचिह्न के रूप में भेंट की जाती रही है। हालांकि यह चलन अब बंद सा हो चला है। पुरातत्व एवं संग्रहालय आयुक्त-सह-संचालक के रूप में राजन ने यह पहल की है कि शालभंजिका सहित अन्‍य पुरातात्विक महत्व की प्रतिमाओं और चिह्नों की प्रतिकृतियां और म्यूरल (दीवार पर सजावट के दृश्य) निर्मित किए जाएं तथा बहुत कम दाम में बाजार में उपलब्ध हों। इसके पीछे सोच विभाग की आय बढ़ाना नहीं बल्कि धरोहर को घर-घर तक पहुंचा देना है। लोग जब इन्हें देखेंगे तो इनके बारे में पड़ताल करेंगे और इस तरह अपने पुरासंपदा को जान-समझ सकेंगे। ऐसी 55 कृतियों को विभिन्न माध्यमों से जनता के करीब ले जाया गया है। इसी तरह, प्रदेश के 500 स्मारकों के रखरखाव तथा यहां की पाण्डुलिपियों के संरक्षण के लिए कदम उठाए गए हैं। दस्तावेजों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है ताकि उन तक पहुंच आसान हो और वे संरक्षित रह सकें।
पर्यावरण सजगता के लिए तैयारी है कि सभी 51 जिलों का रियल टाइम वायु व जल प्रदूषण डाटा सामने रखा जा सके। प्रदूषण नियंत्रण मंडल (एमपीपीसीबी) ने पांच शहरों देवास, उज्जैन, पीथमपुर, मंडीदीप और सिंगरौली के वायु प्रदूषण का वास्तविक समय डाटा ऑनलाइन कर दिया है। जल्दी ही इंदौर, भोपाल की भी रियल टाइम निगरानी हो सकेगी। इसी तरह, बड़े तालाब के बाद नर्मदा सहित सभी नदियों में जल प्रदूषण की वास्तविक समय पर निगरानी के यंत्र लगाए जा रहे हैं।
ये वे प्रयास हैं जो हमें चेतावनी देंगे कि संभलिए, अन्यथा मारे जाएंगे। यही हमें जागरूक होने पर मजबूर भी करेंगे। प्रमुख सचिव राजन के समक्ष चुनौतियां नीतिगत मामलों पर अन्य विभागों से कार्रवाई करवाने की भी है। मसलन, सख्ती हटते ही विधानसभा द्वारा पारित मप्र में पॉलीथीन उपयोग प्रतिबंध कानून कागजी बन कर रह गया। इस कानून का क्रियान्वयन नगरीय निकायों के साथ किया जाना है। इसी तरह, 15 वर्ष से अधिक पुराने वाहनों द्वारा किया जाने वाला वायु प्रदूषण चिंता का बड़ा कारण है। शिकायतें हैं कि परिवहन विभाग द्वारा गठित किए गए, वाहनों को प्रदूषण संबंधी प्रमाण पत्र देने वाले केंद्र, उदासीनता से अमानक वाहनों को भी प्रमाण पत्र दे रहे हैं। ऐसे हाल रहे तो तंत्र कैसे सुधरेगा? राजन के लिए पर्यावरण विभाग में पदस्थ रहे एसके शर्मा, एमएन बुच, एएन वर्मा, नरेश नारद, आरसी जैन जैसे पूर्ववर्ती अधिकारी प्रेरणास्रोत हैं जिन्होंने पर्यावरण सुधार का कार्य केवल भोपाल के बड़ा तालाब और लिंक रोड नंबर 1 तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि जिनके पर्यावरणीय सुधार कार्यों की ‘धमक’ और ‘चमक’ दिल्ली़ तक पहुंची थी। राजन ने इस ओर कदम बढ़ा दिए हैं, सफर की कामयाबी में हम सभी की सांसें अटकी हैं।

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