ऐसी ‘नाखुशी’सिर्फ राहुल द्रविड ही जता सकते हैं…

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पचास लाख की इनामी राशि पाकर कोई भी खुश होता। मानकर कि मेहनत का सही मुआवजा मिला। लेकिन अपने जेंटलमैन क्रिकेटर’राहुल द्रविड दुखी हो गए। कारण  न्यूजीलैंड में अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रचने वाली टीम इंडिया परभारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इनामों की जो बौछार की, उसमें ‘भेदभाव’हुआ। भेदभाव इस मायने में कि अगर बतौर कोच खुद राहुल को 50 लाख देने का ऐलान हुआ तो विजेता खिलाडि़यों को 30-30 लाख और सपोर्ट स्टाफ को 20-20 लाख रूपए । इनाम का ऐलान सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त बीसीसीआई के प्रशासन समिति ने किया और उस रिवायत के तहत किया कि बड़ी हस्ती को बड़ा इनाम और छोटी को छोटा। बीसीसीआई ने इनाम के ऐलान में भी देर नहीं लगाई। जैसे ही भारत के युवा टाइगरों ने न्यूजीलैंड में चौथी बार अंडर- 19 की वर्ल्ड कप ट्राॅफी अपने नाम की, बीसीसीआई के इनामों की रकम टीवी स्क्रीन के स्क्रोल में झलकने लगी। यह जीत थी भी शानदार इनाम के काबिल। क्योंकि भारतीय लड़कों ने जीत के जज्बे के साथ फाइनल में आॅस्ट्रेलिया को हराया था और पूरे टूर्नामेंट में टीम इंडिया अजेय रही थी। और जैसा कि होना था पाॅलिटिक्स, पकौड़े और आपसी मारकाट में डूबा इंडिया कुछ देर के लिए ही सही, अपने लाडलो की नायाब सफलता पर फिर झूमता नजर आया।

लेकिन राहुल द्रविड उस तरह से झूम नहीं रहे थे। वे ‘इसे जीत की शुरूआत’ मान कर अागे की सोच रहे थे। सफलताअों और विफलताअों से वे पहले भी विचलित नहीं होते थे और अब तो सवाल ही नहीं है। राहुल की इस ‘नाखुशी’ ने इस बात को गहरे से रेखांकित किया कि भारतीय क्रिकेट टीम के  इस ‘मिस्टर भरोसेमंद’ ने सक्रिय क्रिकेट से हटने के बाद भी अपनी सिंसीयारिटी और ह्यूमेनिटी को बरकरार रखा है। इनाम की राशि से गदगद होने की जगह राहुल ने मीडिया से कहा कि इनाम की रकम में इतना अंतर कतई ठीक नहीं है। क्यों‍िक इस जीत में सबकी बराबरी की हिस्सेदारी है। यानी मैं भले कोच था, लेकिन लड़कों ने मैदान में और बाहर से सपोर्ट स्टाफ ने जिस जीत के जज्बे के साथ अपने फन का प्रदर्शन किया, उसी ने इस युवा टीम की जीत की नींव रखी। ऐसे में बीसीसीआई केवल मुझे सीनियर कोच होने के नाते ज्यादा पैसा दे रही है तो यह नैतिक रूप से भी ठीक नहीं है। हालांकि खुद बीसीसीआई अपने कदम को इस आधार पर सही ठहरा रही है कि ‘भारत में गुरू शिष्य परंपरा है और गुरू का दर्जा शिष्य से ऊपर है।  लिहाजा राहुल का ज्यादा राशि का हक बनता है। एक तर्क यह भी दिया गया कि जब डेव व्हाटमोर(2008 में भारत के अंडर-19 कोच) और भरत अरुण (2012 में भारत

के अंडर 19 टीम के कोच) की कोचिंग में  युवा टीम इंडिया ने  यह खिताब अपने नाम किया था, तो तब उन दोनो कोचों को भी तत्कालीन टीम कप्तान विराट कोहली और उन्मुक्त  चंद से ज्यादा इनामी रकम मिली थी। उस वक्त किसी ने इस पर एतराज नहीं किया था और कोच का तो सवाल ही नहीं है।
लेकिन राहुल ने एतराज किया तो इसलिए कि वे महज एक शानदार क्रिकेटर ही नहीं, एक जानदार इंसान भी हैं। एक वो भी जमाना था, जब राहुल को भारतीय क्रिकेट टीम की चट्टान ( द वाॅल) कहा जाता था। राहुल टीम को हार से बचाने जी जान लगा देते थे। अगर सचिन और गांगुली भी आउट हो जाएं तो लोग निश्चिंत रहते थे कि अभी राहुल क्रीज पर है न! राहुल द्रविड विश्व में चौथे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित राहुल की खासियत है, हमेशा संयत, शालीन  और मेंटर की भूमिका में रहना। उन्हें शिकायत भी रही है तो अपने आप से। उन्होने कभी क्रेडिट बटोरने की कोशिश नहीं की। बतौर टीम इंडिया के कप्तान भी जब जीत हिस्से में आती थी तो राहुल उसके श्रेय में सबकी हिस्सेदारी मानते थे।

इस बार भी चाहते तो राहुल द्रविड अंडर-19 टीम की जीत का सेहरा अपने सिर बांध सकते थे, क्योंकि उन्हीं के प्रशिक्षण में टीम ने यह मुकाम हासिल किया। लेकिन राहुल जैसे लोग ऐसा भूल कर भी नहीं करते। वास्तव में राहुल द्रविड होना एक चारित्रिक ऊंचाई है, जो जीवन में नैतिकता और स्वयं को अकिंचन मानने का प्रतिमान रच‍ती है। राहुल यह सब सायास नहीं करते। यह उनके व्यक्तित्व और संस्कारों का हिस्सा है और इसे दिखावे के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। यह भीतर ही जन्म लेता और भीतर से ही आता है। यह भाव राहुल से पूछे गए एक सवाल में उनके उत्तर से स्पष्ट हो जाता है। राहुल ने कहा कि मैं कमेंटेटर वगैरह बनने से ज्यादा कोच बनना पसंद करता हूं। क्योंकि इसमें कुछ देने को मिलता है। यह वो मानस है जो आत्ममुग्धता और स्वयंश्रेष्ठता के पाखंड से कोसो दूर किसी गिरी-कंदरा में निष्काम भाव से समाज कल्याण के लिए साधना कर रहा होता है। यह अपने आप में खेल और प्रतिस्पर्द्धा में भी समाजवाद की पैरवी है कि क्रेडिट में सबकी समान भागीदारी हो। यह प्रकृति की तरह सब कुछ रचकर भी खुद मूक दर्शक बन जाने का उदात्त भाव है। बेशक सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के भगवान हैं, लेकिन उस भगवान का भगवद भाव राहुल द्रविड को मानना गलत नहीं होगा। वो खुद को  बड़ा खिलाड़ी कहलाने से ज्यादा खिलाडि़यों को गढ़ने वाला  ‘कुम्हार’कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। अंडर 19 टीम इंडिया के कप्तान पृथ्वी शाॅ ने कोच राहुल द्रविड की तारीफ इन शब्दों में की- ‘हमें बतौर मेंटर राहुल सर का मार्गदर्शन मिलना बिल्कुल ऐसा है, जैसे किसी केक को तैयार करने के लिए आइसिंग जरूरी हो। ‘दिग्गज हैं वह।’ इसमें किसी को क्या शक है?

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