गुप्ता या मोदी’? अरविंद केजरीवाल की गजब चुनौती !

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गजब चुनौती है भई ! देने वाले हैं अपने अरविंद केजरीवाल और निशाना है उन्हें रोज निशाना बनाने वाली बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। दरअसल ऐसी चुनौती पेश करने के लिए भी वणिक बुद्धि और चौड़ा सीना चाहिए। बीते कुछ महिनों से मौन व्रत साधे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 11 हजार 8 सौ करोड़ के पंजाब नेशनल बैंक महाघोटाले पर अपनी जुबान खोली। दिल्ली में कार्यक्रम के दौरान केजरीवाल ने कहा कि अब बीजेपी के पास दो मोदी हैं और हमारे पास दो गुप्ता हैं। यानी जोड़ बराबरी का है। अब देश ही तय करे कि कौन ईमानदार है? मोदी या गुप्ता? वैसे यह सवाल उतना ही पेचीदा है जितना कि पहले अंडा या मुर्गी ? दूसरे शब्दों में पहले घोटाला या घोटाले को प्रश्रय देने वाली सरकार ?
रविवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित वैश्य अग्रवाल आभार समारोह में बोलते हुए केजरीवाल े यह सिक्का उछाला। केजरीवाल ने दावा किया कि राज्यसभा के लिए ‘आप’ ने ‘सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को काबिलियत के आधार पर टिकट दिया था। तब इसे भाजपा और कांग्रेस ने ‘आप’ का ‘2G घोटाला’ करार दिया था। लेकिन केजरी पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उन्होने बेझिझक प्रजातंत्र की पहरेदारी दो धन्नासेठों के हाथ में थमा दी।
केजरीवाल का यह कदम इस बात की पुष्टि थी ‍कि इस देश में पैसे के दम पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है, फिर वह बैंक का लेटर आॅफ अंडरस्टैंडिंग ही क्यों न हो। नीरव मोदी और गुप्ताअों में समानता यह है कि दोनो ने धनबल पर एलअोसी और रास टिकट प्राप्त‍ किए। पैसे से दुनिया को चलाना हम भारतीयों को खूब आता है। अब तो भ्रम यह भी होने लगा है कि सारी दु‍िनया मोदियों, माल्याअों और गुप्ताअों के भरोसे ही चल रही है। एक गुप्ताजी तो दक्षिण अफ्रीका की सरकार ही चला रहे थे। उनकी हरकतों के बाद वहां के राष्ट्रपति जेकब जूमा को अंतत: इस्तीफा देना पड़ा। उसी तरह यूके में विजय माल्या के खिलाफ भारत सरकार भले ही खम ठोकती हो, विदेश में उसका बाल बांका नहीं हो रहा। वह मजे में वहां बैठकर भारत सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी गतकेबाजी को देख रहा है।
देश का दुर्भाग्य यह है कि हर सरकार देश को ‘ठीक’ करने के वादे के साथ सत्ता में आती है और कुछ समय वह खुद उसी तंत्र को पोसने लगती है, जो देश को चला रहा होता है। पीएनबी महाघोटाले ने शुचिता का दावा करने वाली मोदी सरकार को इसी धर्मसंकट में फंसा दिया है। इस पूरे प्रकरण में बाल-बाल बचने की गुंजाइश इतनी थी ‍कि महाघोटाले का आगाज कांग्रेसनीत यूपीए 2 सरकार के समय हुआ। लेकिन वह सबको ठीक करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में चार साल तक यह महाघोटाला क्यों बेखौफ चलने‍ दिया गया, इस सवाल पर मोदी सरकार के सभी मंत्री बगले झांक रहे हैं। लगता है कि जिस ‘ईज आॅफ डूइंग बिजनेस’ में भारत ने वैश्विक सूचकांक में ऊंची छलांग मारी थी, उसे हकीकत में ‘ईज आॅफ फ्लाइंग फ्राड्यूलैंट्स’ ( धोखेबाजों के भागने में आसानी) की तरह पढ़ा जाना चाहिए। यानी जीभर के लूटो और बेधड़क‍ निकल भागो। बोफोर्स, माल्या और अब नीरव मोदी प्रकरण तक आते-आते सब कुछ बेहद ‘ईजी’ हो गया है। पहले धोखाधड़ी सामने अाने के बाद धोखेबाज अमीर देश छोड़कर भागते थे, अब तो उनके भाग जाने के बाद ही घोटाला उजागर होता है। यानी करप्शन की फाइल तभी खुलती है जब यूजर अपनी सुविधा से पासवर्ड बदल ले। बाद में राजनेता एक दूसरे पर कीचड़ उछाल कर अपनी राजनीतिक होली खेलते रहते हैं। लाचार आम आदमी अपने पसीने का पैसा बैंको में डूबते देखता रहता है।
अब सवाल यह है कि सारी हकीकत जानते हुए भी अरविंद केजरीवाल ने देसी अखाड़े की तरह चुनौती का यह लंगोट क्यों घुमाया? खासकर तब कि जब भाजपा खुद दिल्ली में केजरीवाल को भ्रष्टाचार को आश्रय देने का आरोप लगाती रही है। वो केजरीवाल जो, केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर बाद में पलट चुके हैं। वो, केजरीवाल जिन पर राज्यसभा का टिकट बेचने का आरोप लग चुका है, वही केजरीवाल आज मोदी को ईमानदारी के दंगल में दो-दो हाथ करने की चुनौती देने का साहस दिखा रहे हैं तो क्यों?
कारण साफ है कि पहली बार मोदी सरकार संदेह के घेरे में है। तरक्की का ‘गुजरात माॅडल’ भी शक के घेरे में है। पहली दफा कोई महाघोटाला मोदी सरकार के लिए गले की हड्डी बन रहा है और घोटालों की सरदार कही जाने वाली कांग्रेस निर्वासित टीले पर बैठ कर ठहाका लगा रही है। इधर मोदी सरकार के पास सफाई के रूप में केवल प्रत्यारोप हैं। सबसे हैरानी की बात है कि अब वित्तीय घोटालों में भी सरकार की रक्षा के लिए देश की रक्षा मंत्री को आगे आना पड़ रहा है और वित्त मंत्री केवल बजट पास करवाने में व्यस्त हैं। हालांकि केजरीवाल के ‘दो मोदियों में’ अगर एक प्रधानमंत्री हैं तो यह तुलना सही नहीं है। नरेन्द्र के जुमलों और नीरव की बैंक धोखाधड़ी को एक पलडे में तौलना सही नहीं है। लेकिन शक की सुई है कि किसी रिमोट से कंट्रोल नहीं होती। वह घूमती ही रहती है। इस सवाल का जवाब किसी संकल्प पत्र में नहीं मिल रहा है कि न खाने दूंगा की दहाड़ में भी नीरव किस के अभयदान से बैंकों को लूटता रहा। ‍सबसे चिंता की बात यह है कि अाने वाले समय में एक मतदाता और एक जिम्मेदारी नागरिक होने के नाते क्या मुझे लोकतंत्र के पहरूअोंके रूप में किसी ‘मोदी’ या ‘गुप्ता’ का ही चुनाव करना होगा? अफसोस इस बात का है कि विकल्प घटते जा रहे हैं। क्योंकि हीरे बेचने के लिए बैंकों का पैसा है और धंधे से कमाए पैसे के लिए राज्य सभा का टिकट है। उधर दावे ‘माणिक’ को हटा कर ‘हीरे’ को लाने के हैं। इसे क्या समझा जाए? क्या इस लोकतंत्र में अब रेत में बिखरे शंख सीपियों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी? इसका जवाब खुद केजरीवाल के सवाल में ही छिपा है।

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