नगालैंड में सर्वदलीय चुनाव बहिष्कार में छिपे खतरे

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सुदूर पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में इस बार सत्ता में आने के सपने संजो रही भाजपा के लिए यह खबर एक झटका ही थी। चुनाव आयोग द्वारा नागालैंड में 27 फरवरी को विधानसभा चुनाव के ऐलान के दूसरे ही दिन राज्य की सभी 11 राजनीतिक पार्टियों ने एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी कर कहा कि जब तक बरसों पुरानी नागा समस्या का राजनीतिक हल नहीं हो जाता, तब तक राज्य विधानसभा चुनाव में कोई पार्टी ‍हिस्सा नहीं लेगी। इस घोषणा पत्र में चुनाव आयोग से अनुरोध किया गया ‍िक वह समस्या के समाधान तक राज्य विधानसभा चुनाव टाल दे। इस मांग का समर्थन  राज्य की सिविल सोसाइटी और कई  आदिवासी संगठनों ने किया है। अर्थात पहले उनकी समस्या का समाधान उसके बाद चुनाव। यह फैसला नगालैंड आदिवासी होहो और नागरिक संगठन की कोर कमेटी (सीसीएनटीएचसीओ) द्वारा बुलाई गई बैठक में लिया गया। खास बात यह थी कि घोषणा पत्र पर भाजपा के दो स्थानीय नेताअों ने भी हस्ताक्षर किए थे। इसमें कहा गया है कि ‘‘नगा लोगों की सर्वसम्मत राय है कि राजनीतिक समाधान या नगा शांति समझौता, चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इस वजह से अमन चैन के लिए नगालैंड के विधानसभा चुनाव को टालना जरूरी है। इस घोषणा पत्र से सकते में आई केन्द्र सरकार की अोर से मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा  कि चुनाव प्रक्रिया संवैधानिक बाध्यता है और यह लोकतंत्र के लिए जरूरी है। इसे नगा समस्या के समाधान से जोड़ना ठीक नहीं है। उधर भाजपा खेमे में भी इस घोषणा के बाद हलचल मची और घोषणा पत्र पर दस्तखत करने वाले पार्टी नेताअों को निलंबित कर ‍िदया गया। भाजपा में नागालैंड के प्रभारी राम माधव ने कहा कि हमारे किसी सदस्य ने इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए।

इस असाधारण घटनाक्रम को समझने के लिए नगालैंड की राजनीति और ऐतिहासिक सामाजिक संदर्भ को समझना जरूरी है। क्योंकि घोषणा पत्र जारी होने दो दिन पहले ही नागालैंड के मुख्यमंत्री जेलियांग ने कहा था कि उनकी पार्टी नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) और भाजपा मिलकर विधानसभा चुनाव में उतरेंगे। दोनो का उद्देश्य राज्य में विकास और शांति स्थापित करना है। नगालैंड विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं और पिछले चुनाव में एनपीएफ सबसे ज्यादा सीटें जीतकर सत्ता में आई थी। भाजपा यहां सरकार में जूनियर पार्टनर है। उसके चार सदस्य हैं। हालांकि सत्तारूढ़ एनपीएफ में खुद भारी फूट है। उसके एक वरिेष्ठ तेना नेफ्यू रियो ने पार्टी छोड़कर नई नगालैंड डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी( एनडीपीपी) बना ली है। भाजपा इसी का राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। आश्चर्य नहीं कि वह एनडीपीपी से गठबंधन कर ले। उधर चुनाव घोषणा के 25 दिन पहले केन्द्र सरकार ने नगालैंड को अशांत क्षेत्र घोषित किए जाने की अवधि को छह माह के लिए और बढ़ा दिया है। इसके मुताबिक सशस्त्र बलों को अफ्‍स्पा कानून के तहत राज्य में कहीं भी अभियान चलाने और किसी को भी पूर्व नोटिस के बिना गिरफ्तार करने का अधिकार मिल जाता है। अफ्स्पा कानून नगालैंड में 50 साल से लागू है। हालांकि 2015 में  मोदी सरकार और नगा उग्रवादी संगठन एनएससीएन आईएम के महासचिव टी मुइवा और सरकार के वार्ताकार आर. एन. रवि के बीच 3 अगस्त 2015 को हुए समझौते के बाद भी इसे हटाया नहीं गया है।  

सवाल यह है कि नगा समस्या का स्थायी राजनीतिक हल से आशय क्या है ? क्या कोई सरकार वहां से अफ्सपा कानून हटा सकती है? ध्यान रहे कि नगालैंड भौगोलिक रूप से भले भारत का हिस्सा हो, लेकिन सांस्कृतिक और नृवंशीय दृष्टि से अलग ही रहा है। वहां 16 प्रमुख जनजातियां हैं। इनकी भाषाएं भी अलगअलग हैं। ये जनजातियां आपस में लड़ती रही है। अंग्रेजों ने अपने राज्य  विस्तार और नगा जनजातियों के आपसी संघर्ष को रोकने के उद्देश्य से नगा हिल्स क्षेत्र में घुसपैठ की। नगा क्षेत्र 1879 में ब्रिटिश राज के अधीन आ गया। हालांकि नगालोग अपनी स्वतंत्रता की मांग करते रहे। 1927 में उन्होने ब्रिटिश भारत में आए साइमन कमीशन को ज्ञापन भी दिया।। कई नगा आज भी अपना स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मानते हैं, क्योंकि इसी दिन नगा नेताअों और अंगरेजों में समझौता हुआ था कि नगा लोग भारत के साथ रहेंगे, लेकिन यह स्थिति अगले दस वर्षों के लिए होगी।

आजादी के बाद नगाअों ने फिर अपनी स्वायत्तता की मांग शुरू कर दी। हालांकि पूर्ण स्वायत्तता को लेकर नगाअों में मतभेद रहे हैं। नगाअों के उदारवादी धड़े के साथ हुए समझौते के बाद 1963 में असम के नगा हिल्स जिले को अलग कर नगालैंड राज्य बनाया गया। दूसरी तरफ कुछ नगाअों ने अपनी मांग मनवाने के लिए हथियार उठा लिए। परिणामस्वरूप विद्रोही गतिविधियां वहां चलती रहती हैं। बावजूद इसके कि नगाअों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के प्रयास लगातार जारी हैं।  

खास बात यह है कि नगा केवल नगालैंड में ही नहीं रहते। वे बड़ी संख्या में पड़ोस के असम, मणिपुर, अरूणाचल और म्यानमार में भी रहते हैं। नगाअों की मांग है कि इस राज्यों व देश नगाबस्ती वाले इलाकों को मिलाकर नया महानगालैंड या नगालिम बनाया जाए। ताकि नगा संस्कृति व पहचान को सुरक्षित रखा जा सके। भाजपा ने नगा नेताअों को आश्वस्त किया है कि वह नगा समस्या का हल करेगी। लेकिन यह कैसे होगा, यह कहीं भी साफ नहीं है। नगाअों को शक है कि  यह भी एक राजनीतिक हथकंडा है। क्योंकि दूसरे राज्यों के नगा क्षेत्रों को तोड़कर नगालैंड में मिलाना सांप के पिटारे को खोलने जैसा है। देशहित में इस कैसे अंजाम दिया जाएगा, समझना मुश्किल है।

हालांकि नगा समस्या के स्थायी समाधान की मांग को लेकर चुनाव बहिेष्कार 1997 में हुआ था। तब कांग्रेस इसमें शामिल नहीं हुई थी। परिणामस्वरूप चुनाव में उसे एकतरफा जीत मिली थी। ऐसा फिर न हो, इसलिए इस बार नगा समस्या को सभी राजनीतिक दलों की प्राथमिकता के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है। इसे राजनीतिक ब्लैकमेल भी कह सकते हैं। केन्द्र सरकार इसके दबाव में शायद ही आए। इसमें असली खतरा यह है कि अगर बहिष्कार खत्म नहीं हुआ तथा विवाद और बढ़ गया तो नगा समस्या और गंभीर होगी। अगर दूसरे राज्यों में यही प्रवृत्ति बढ़ने लगी तो हमारे लोकतंत्र पर ही खतरा मंडराने लगेगा। देखना यह है कि मोदी सरकार इससे कैसे निपटती है।