पहाड़ के संकरे रास्तों के बीच ‘ऊंट’ के गर्व-भंजन की कहानी

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यह भाजपा के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के दस सवालों का जवाब है अथवा भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का दबाव कि पंजाब नैशनल बैंक में नीरव मोदी के भारी-भरकम आर्थिक घोटाले में अन्तत: वित्त मंत्री अरुण जेटली को अपना मुंह खोलना पड़ा। चार-पांच दिन तक समूची परिस्थितियों का आकलन करने के बाद वित्त मंत्री ने खुलासा किया कि 11300 करोड़ का यह घोटाला ऑडिटर्स और मैनेजमेंट की नाकामी का नतीजा है। वित्तमंत्री की यह नरमी और मासूम से खुलासे को सुनकर मीडिया को पहली बार यह लगा और शायद अरुण जेटली को भी पहली बार लगा होगा कि ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’। राजनीति में पहाड़ के नीचे ऊंट आने के अपने मायने होते हैं।
राजनीतिक-गर्वोक्तियां, सत्ता की मदांधता, प्रतिशोधी राजनीति अथवा स्वयंभू होने के दंभ पालने वाले नेताओं के लिए यह मुहावरा सबक भी है और चेतावनी भी है। मुहावरे की कहानी दिलचस्प है, जिसका ‘मॉरल’ यह है कि सत्ता के मद से बचना चाहिए, जमीनी-हकीकत को भूलना नहीं चाहिए और बड़बोलेपन से बचना चाहिए। कहानी कुछ यूं है कि ऊंची गरदन से रेतीले समतल मैदानों को देखते-देखते ऊंट को यह भ्रम हो गया था कि मेरे से ऊंचा संसार में कोई नहीं है। ऊंचे पेड़ों की फुनगियों को खा लेने के सामर्थ्य को वो अपने सर्वशक्तिमान होने का उदाहरण मानता था। इसी घमंड में वो अपनी जीभ निकालकर बलबल की तेज आवाजें निकालता रहता था। ऊंट का बलबलाना उसके असामान्य व्यवहार का परिचायक है। परिस्थितिवश उसे एक मर्तबा पहाडों के बीच बसे गांव में लकडियां उठाने के लिए आना-जाना पड़ा। संकरे पहाड़ी रास्तों पर चलने की अपनी परेशानियां थी। संकरेपन के कारण उसे गरदन घुमाने में भी तकलीफ होती थी। गरदन सीधी करके आकाश को निहारने की कसरत भी कष्टदायी थी। यह काम भी वह बमुश्किल कर पाता था। पहाड़ों की ऊंचाइयों पर लगे पेड़ों की टहनियों पर मुंह मारना तो दूर की बात, उन्हें सूंघ पाना या देख पाना भी असंभव था। सीधे रास्तों पर चलने के लिए मजबूर ऊंट यह बात शिद्दत से महसूस करने लगा था कि यह दुनिया उसकी समझ से कई गुना ज्यादा ऊंची और पेचीदा है।
पहाड़ के संकरे रास्तों के बीच ऊंट के गर्व-भंजन की इस कहानी के ‘मॉरल’ वर्तमान राजनीति के परिदृश्योंर को भी एड्रेस करते हैं। भाजपा के राजनीतिक धुरन्धर इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक हमलों से ज्यादा टीवी या सोशल मीडिया पर चलने वाले उन पुराने क्लिपिंग्स से परेशान हैं, जिनमें वो यूपीए सरकार की फजीहत करते नजर आते हैं। इन क्लिपिंग्स में कभी सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी एलपीजी गैस के खाली सिलेण्डर के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर गरजती नजर आती हैं, तो कहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आतंकवादी हमलों के संदर्भ में ‘एक के बदले दस’ पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटने के लिए दहाड़ लगाती नजर आती हैं। पुराने राजनीतिक आख्यानों के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो हर मौके पर गुजरात के चीफ मिनिस्टर के रूप में यूपीए-सरकार से महंगाई, बेरोजगारी, मुद्रास्फीटति, विकास-दर से जुड़े वो सभी सवाल पूछते नजर आते हैं। ये सवाल वही हैं, प्रधानमंत्री के नाते जो लोग आज उनसे पूछ रहे हैं अथवा जिनके जवाब में वो मनमोहन सिंह जैसे मौनी-बाबा बन जाते हैं।
नीरव मोदी की 11300 करोड़ की हेराफेरी पर वित्त मंत्री अरुण जेटली की सधी हुई तकनीकी प्रतिक्रिया इशारा करती है कि पहाडों के संकरे रास्तों के बीच ऊंट का गर्वीलापन तड़कने लगा है। वित्त मंत्री अपने बयान को तकनीकी मुद्दों तक सीमित रख कर जिस राजनीति-भोलेपन का मुजाहिरा करना चाहते हैं, वह असामान्य है। वित्त मंत्री के इस मासूम सवाल का जवाब उनकी विपक्षी पार्टियां तो देने से रहीं कि 6 साल के ऑडिट में यह घपला क्यों नही पकड़ा गया? इस सवाल में यह सवाल भी अन्तर्निहित है कि मोदी-सरकार के चार सालों में इस अनदेखी के लिए किसको दोषी माना जाएगा ? सवाल यह है कि पीएनबी के 11300 करोड़ के इस घोटाले के लिए यदि बैंक-प्रबंधन और ऑडिटर्स जिम्मेदार हैं, तो विजय माल्या के बैंक-स्कैम सहित पिछले पांच वर्षों में बैंकों की 367765 करोड़ की रकम डूबत खातों में डालने के मामलों में कौन जिम्मेदार होगा? नीरव मोदी की फरारी के बाद मोदी-सरकार के राजनीतिक-तेवर ढीले पड़ते दिखाई दे रहे हैं। बैंकों में वित्तीय हेराफेरी के लिए यूपीए के नेताओं को घेरने के पहले मोदी-सरकार को अपना दामन भी साफ करना होगा।

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