पीएनबी घोटाला: ‘विटनेस-बॉक्स’ में मोदी की खामोशी पर सवाल

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लुगदी साहित्य की जासूसी-कथाओ में ‘सन्नाटे की खामोशी को चीरती प्रेत-आत्माओं की रहस्यमय आवाजों’ की सनसनी से वाकिफ लोगों के जहन में जमा इस जाने-माने मुहावरे का उलट प्रयोग अटपटा लगेगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खामोशी पंजाब नेशनल बैंक में 11400 करोड़ के घोटाले के शोर पर सन्नाटे की तरह पसर गई है। पीएनबी घोटाले की सुर्खियों का काला रंग अब प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी की ओर मुड़ने लगा है। हर दिन छोटी-मोटी बातों पर दस-बीस ट्वीट करने वाले मोदी की खामोशी पर सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया के स्क्रीनों पर यूपीए-सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके पुराने धुंआधार भाषणों की क्लिपिंग्स चर्चा का विषय है। हर क्लिपिंग के साथ यह सवाल जड़ा होता है कि सदी के राजनीतिक महानायक पीएनबी घोटाले पर खामोश क्यों हैं?
लोग अब उतावले होने लगे हैं कि पंजाब नेशनल बैंक के ‘द ग्रेट इंडियन बैंकिंग घोटाला शो’ के इस महाएपीसोड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एंट्री का क्लाइमेक्स क्या होगा… उनका ग्रेट-एपीरियंस कैसा होगा…वो कौन से हथियारों से लैस होंगे… उनका पहला शिकार कौन होगा… गांधी-परिवार को कैसे वो अपनी चपेट में लेंगे…सत्तर साल की काली करतूतों को वो कैसे हलाल करेंगे… बैंकों के राष्ट्रीयकरण की व्याख्या कैसे करेंगे…? फिलवक्त लोगों के सामने सवालिया-धुंध है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह खामोशी रणनीतिक मगरूरी है अथवा राजनीतिक मजबूरी कि फिलहाल उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ नही हैं?
मोदी-सरकार आश्वस्त नहीं है कि पीएनबी घोटाला कितना बड़ा है और क्या शक्ल अख्तियार करेगा? बैंकों के डूबत-खातों (एनपीए) की परेशानी से जूझती मोदी सरकार के गले में यह घोटाला हड्डी की तरह फंस गया है। भारत के बैंकिंग सिस्टम पर आम जनता का गहरा विश्वास रहा है। लोगों को लगता था कि डूबत खातों की बीमारी से बैंकें उबर आएंगी, लेकिन पीएनबी के घोटाले ने लोगों के विश्वास की नींव हिला दी है। मोदी-सरकार के लिए बड़ा झटका है। समूची बैंकिंग-इंडस्ट्री में धोखाधड़ी की यह इबारत किसी बड़ी आर्थिक-अनहोनी की ओर इशारा कर रही है। यह मामला एक उद्योगपति की कर्ज-वापसी के मसले तक सीमित नहीं है। आम-आदमी की जिंदगी में बैंकिग उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। आदमी अपनी जिंदगी की कमाई और सारी धरोहरें बैंकों की कस्टडी में रख कर आराम से सोता था। अब वह पहले की तरह शायद ही चैन की नींद सो सकेगा। पहले दिन कहा गया था पीएनबी घोटाला 11000 करोड तक सीमित है। अब इसका आकार 21,000 करोड़ के पास तक पहुंच गया है। मार्केट में खलबली इसलिए है कि सरकारी बैंकों के शेयर-होल्डरों के 10000 करोड़ डूब चुके हैं। नुकसान का यह आकलन 60000 करोड़ से ऊपर पहुंच रहा है। क्या बैंकों की इकॉनामी घाटे के इस समुन्दर को लांघ पाएगी ?
बारह महीनों, तीसों दिन, चौबीसों घंटे इलेक्शन-मोड में रहने वाली मोदी-सरकार की सबसे बड़ी परेशानी ही यह है कि वो हर मसले को कांग्रेस के एरिना में फेंकना चाहती है। इस मर्तबा भी भाजपा की कोशिशें थीं कि घोटाले की तोपों के मुहाने किसी भी तरह कांग्रेस की ओर मोड़ दिए जाएं। मोदी-सरकार की रणनीति ने ‘बैक-फायर’ किया है। इसके बाद मोदी-सरकार की रणनीति बदलती प्रतीत हो रही है। वह डिफेंसिव-मोड में है। राजनीतिक-परेशानियों से बचने के लिए सरकार के नुमाइंदे बैंक-घोटाले के स्क्रीन-प्ले को आर्थिक-अपराध की सनसनीखेज घटनाओं में तब्दील करने की कोशिश में लगे हैं। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने कोशिश जरूर की थी राजनीतिक-अदालत के ‘विटनेस-बॉक्स’ में सिर्फ कांग्रेस को ही खड़ा किया जाए। कांग्रेस को अकेले ‘विटनेस-बॉक्स’ में खड़ा करने का राजनीतिक-उपक्रम सफल नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आक्रामकता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। राहुल ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि ‘अलग-अलग मंत्री आकर सफाई दे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री, जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, इस बारे में कुछ क्यों नही कह रहे हैं?’ इस मसले पर भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का बयान राहुल की मांग को नैतिक-बल प्रदान कर रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि- घोटाले पर वित्त मंत्रालय ने कोई बयान नहीं दिया है। इस अहम् मसले पर उन्हें आगे आना चाहिए। यह बहुत बड़ा वित्तीय-फ्रॉड है। सिर्फ पार्टी-प्रवक्ताओं की सफाई से काम नहीं चलेगा। वित्त मंत्रालय के बयान के बाद प्रधानमंत्री सुनिश्चित करें कि दोषियों को सजा मिले।

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