बिटविन द लाइन्स: भागवत ने सेना से नहीं, समाज से कुछ कहा है

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आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत व्दारा सेना और संघ के स्वयंसेवकों की तुलना के बाद उठे राजनीतिक सवालों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सूत्रधारों को असहज कर दिया है। मोटे तौर पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को अनसुना करने वाले इस संगठन की बेचैनी यूं समझ में आती है कि संघ-प्रमुख के बयान के बाद आरएसएस के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने स्पष्टीकरण जारी कर मोहन भागवत के मंतव्य को स्पष्ट करने की कोशिश की है। संघ के इस छुईमुई अंदाज का एकमात्र कारण यह है कि राजीतिक दलों ने संघ-प्रमुख की टिप्पणी को सेना के मान-अपमान की ओर मोड़ दिया है। संघ को किसी भी कीमत पर यह कबूल नहीं है कि आम लोगों में यह धारणा बने कि संघ सेना को कमतर आंकता है।
संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को मुजफ्फरपुर की एक सभा कहा था कि ‘संघ तीन दिन में सेना तैयार कर सकता है और यही काम करने में सेना को छह-सात महीने लगेंगे। यह हमारी क्षमता है। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए और संविधान की इजाजत होने पर स्वयंसेवक देश के लिए आगे आकर लड़ने के लिए तैयार होंगे।’ संघ-प्रमुख कहना था कि ‘आरएसएस कोई सैन्य संगठन नहीं है, लेकिन हमारे पास सेना जैसा अनुशासन है। अगर देश को जरूरत होगी तो और संविधान इजाजत देगा तो संघ दुश्मनों के खिलाफ सीमा पर लड़ने को तैयार है।’
भारतीय राजनीति में यह शब्दों की हेरा-फेरी का दौर है। हर राजनीतिक दल बयानों को अपने हिसाब से ‘बिटविन द लाइन्स’ पढ़ता है और उसके भावार्थ को सामने रख कर अपनी राजनीति गढ़ता है। देश में अभी तक सेना को राजनीति से दूर रखने की परम्परा का सख्ती से पालन होता रहा है, लेकिन मोदी-सरकार के गठन के बाद यह परम्परा कमजोर हुई है। सितम्बर 2016 में पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक के तत्काल बाद राहुल गांधी ने कहा था कि ‘जब प्रधानमंत्री जी, प्रधानमंत्री जैसा काम करते हैं, तो मैं उनका समर्थन करता हूं।’ लेकिन जब उप्र चुनाव में सर्जिकल-स्ट्राइक वोट हासिल करने का औजार बनने लगी तो राहुल के तेवर भी बदल गए। राहुल के इस बयान को लेकर बवाल मचा था कि ‘हमारे जिन जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक में जम्मू-कश्मीर में अपनी जान गंवाई है, आप (मोदीजी) उनके खून की दलाली कर रहे है।’ यहां भी राहुल का मंतव्य मोदी को खून का दलाल बताना नहीं था, लेकिन भाजपा ने कामयाबी के साथ उनके बयान को अपने अनुकूल मोड़ दे दिया था। बाद में राहुल को भी सफाई देना पड़ी थी कि ‘वो सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन करते हैं, लेकिन राजनीतिक पोस्टर में सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।’ राजनीति में शब्दों की हेराफेरी में भाजपा महारथी है। प्रधानमंत्री मोदी के शाब्दिक-चातुर्य से राजनेता घबराते हैं। गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर के बयान को भुनाने का उदाहरण राजनीतिज्ञ आसानी से भूलने वाले नहीं हैं। अनुवाद की गलती के वशीभूत अय्यर ने निम्न स्तर की पोलिटिक्स की जगह ‘नीच पोलिटिक्स’ कह दिया था, जिसे मुद्दा बनाकर मोदी ले उड़े थे।
शोर मचाकर शब्दों का व्यापार करने की राजनीति इन दिनों परवान पर है। सभी मानते और जानते हैं कि मोहन भागवत सेना के अपमान या अवमूल्यन की कोई बात कभी नहीं करेंगे, लेकिन आलोचनाओं के वो सारे हथियार कांग्रेस इस्तेमाल कर रही है, जो भाजपा विपक्षी दल के नाते इस्तेमाल करती थी। उसका खमियाजा संघ को भी भुगतना पड़ रहा है। भाजपा ने विपक्ष की राजनीति का जो पैटर्न तय किया था, कांग्रेस उसका अनुसरण कर रही है। इसीलिए राहुल ने संघ-प्रमुख के बयान की आलोचना करते हुए कहा है कि ‘यह उन लोगों का अपमान है, जो देश के लिए अपनी कुर्बानी दे रहे हैं। यह हमारे तिरंगे का अपमान है, जिसे हमारे सैनिक सैल्युट करते हैं। सेना और शहीदों का अपमान करने के लिए यह कृत्य शर्मनाक है।’ राहुल से असहमति व्यक्त करते हुए संघ के प्रवक्ता मोहन वैद्य ने स्प ष्टस किया है कि ‘संघ प्रमुख ने सेना और संघ के कार्यकर्ताओं की तुलना नहीं की है। यह आम समाज और स्वयंसेवकों के बीच तुलना है। दोनों को ही केवल भारतीय सेना प्रशिक्षित कर सकती है।’
लेकिन सेना की तैयारी के इस कथन को विपक्षी राजनीति अलग रूप में पढ़ रही है। समाजवादी और लेफ्ट पार्टियों के साथ क्षेत्रीय दलों ने मोहन भागवत के इस कथन को देश के दूरगामी भविष्यन से जोड़ते हुए कहा है कि इस बहाने संघ प्रमुख यह संदेश देना चाहते हैं कि देश और समाज संघ के अदृश्य अनुशासित सिपाहियों से डरे। संघ परिवार सैन्य संगठन नहीं है, लेकिन वह तीन दिन में सैन्य संगठन में बदल सकता है। इसके राजनीतिक निहितार्थ को समझने वाले समझ सकते हैं कि हिन्दुत्व का प्रवाह शक्ति की उन धाराओं में परिवर्तित हो रहा है, जिसकी ताकत को सेना के समकक्ष माना जाना चाहिए।

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