मनीष सिंह : इंदौर की स्‍वच्‍छता आदतों को बदलने वाला मिस्‍टर क्‍लीन मोटिवेटर

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शायर दुष्‍यंत कुमार ने लिखा है- ‘एक आदत सी बन गई है तू, और आदत कभी नहीं जाती।’ आदतों को बदलने के लिए बहुतेरे जतन करने पड़ते हैं। फिर यह आदत यदि समाज, बस्‍ती और पूरे शहर की हो तो टॉस्‍क और भी मुश्किल हो जाता है। पूरे शहर की सफाई की आदतों को बदलने का नामुमकिन सा कार्य करने का सेहरा कुछ माह पहले आईएएस अवार्ड प्राप्‍त अधिकारी मनीष सिंह को जाता है। मनीष सिंह ने इंदौर जैसे बड़े और विविधता वाले शहर की आदत में स्‍वच्‍छता को प्राथमिकता में ला दिया है। यह काम एक दिन में या एक व्‍यक्ति द्वारा नहीं हुआ। पूरी टीम लगी और अभियान को सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक व्‍यक्तियों का पूर्ण समर्थन व सहयोग मिला, मगर इस पूरे अनुष्‍ठान के पीछे जिस एक व्‍यक्ति का उल्‍लेख हो रहा है, वह है नगर निगम इंदौर के आयुक्‍त मनीष सिंह। शहर को सफाई में नंबर वन बनाने की उनकी जिद के कारण ही वे मिस्‍टर क्‍लीन मोटिवेटर के नाम से चर्चित हो चुके हैं।
हर शहर की अपनी सूरत और अपनी आदतें होती हैं। होलकर शासकों की राजधानी रहे इंदौर की भी अपनी आदतें तथा तासीर है। यहां के बाशिंदे जितने कला रसिक और स्‍वाद पारखी हैं, अपनी पसंद को लेकर उतने ही आग्रही भी हैं। अपनी आदतों को लेकर वे जिद की हद तक अडिग कहे जाते हैं। इस शहर में आदतों और व्‍यवहार को लेकर कोई बदलाव लाने के बारे में सोचना स्‍वर्ग से गंगा धरा पर उतार लाने जितना ही दुरूह माना गया है। कई शासकों ने परिवर्तन की बुनियाद तो रखी लेकिन ऐसा कम ही हुआ कि बदलाव पूरी तरह दिखाई दे या आगंतुक को पहली नजर में ही महसूस हो जाए। पर आज ऐसा हो रहा है। इंदौर के आम नागरिक ही नहीं, मेहमान भी इंदौर को बदला-बदला सा देख-पा रहे हैं। पिछले दिनों जो भी इंदौर पहुंचा उसने यह जरूर कहा कि यह शहर तो काफी साफ रहने लगा है। मसलन, इंदौर आए एनडीटीवी के राजनीतिक संपादक अखिलेश शर्मा ने शनिवार को ट्वीट कर सुखद आश्‍चर्य जताया –‘इंदौर स्वच्छता का ताज बरक़रार रखने के लिए बेक़रार है। वाकई इतना साफ-सुथरा इंदौर कभी नहीं देखा।’
इंदौर की इस सफाई पसंदगी पर जब जनता से बात करते हैं तो लोग बताते हैं कि सार्वजनिक स्‍थानों पर बेफिक्री से कचरा उड़ा देना या पान की पीक थूक देने जैसी आदतें गुजरे जमाने की बात हो गई हैं। क्‍या निगम कर्मचारियों का डर है कि वे जुर्माना ठोक देंगे? जवाब मिलता है, नहीं साहब। अब तो कोई डस्‍टबिन के बाहर भी कचरा फेंकता है तो जो देखता है, वह टोक देता है। कोई बुजुर्ग, बच्‍चा, कोई दुकानदार, कोई ऑटो चालक, कोई महरी, कोई तो होगा जो आपको ऐसा करते देख लेगा और प्‍यारी सी झिड़की दे कर सावधान कर देगा। सुन कर यकीन नहीं हुआ। मगर जब आंखों से देखा तो लगा कि देवी अहिल्‍या की यह नगर अब वाकई नई आदत में ढल चुकी है।
अचरज था। कैसे हुआ यह सब? पता चला कि निगम आयुक्‍त मनीष सिंह की जिद ने इस ऐतिहासिक शहर के व्‍यवहार को बदल कर रख दिया है। एक अफसर की जुनून की हद तक जिद में महापौर मालिनी गौड़ का सीधा और अन्‍य जन प्रतिनिधियों का परोक्ष साथ मिला। मनीष सिंह भोपाल नगर निगम में भी आयुक्‍त रहे हैं और उनकी कार्यप्रणाली को देखते हुए उज्‍जैन में आयोजित सिंहस्‍थ 2016 में भी उनकी विशिष्‍ट सेवाएं ली गई थीं।
सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्‍वच्‍छता अभियान में इंदौर को नंबर 1 बनाने की कोशिश की तो आरंभ में गतिरोध भी खूब आए। धन की कमी जैसे मुद्दे भी थे। मगर, यह आयुक्‍त सिंह की कला ही कहिए कि उन्‍होंने हर बाधा का समाधान खोजा और ऐसे ऐसे निर्णय लिए जिन्‍हें लेना बहुमत प्राप्‍त परिषद के लिए मुश्किल होता है। मसलन, निगम के वित्‍त का सबसे बड़ा भाग सफाई व्‍यवस्‍था पर खर्च किया गया। तंत्र को सुधारने के कार्य में किसी की एक न सुनी गई। कोई सिफारिश नहीं, कोई लापरवाही नहीं। रात 2 बजे हो या दोपहर 3 बजे। सफाई व्‍यवस्‍था का औचक निरीक्षण। दबे पांव दबिश। सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने से लेकर कचरा फेंकने की रोकथाम के लिए सख्‍ती। हर संभव कार्य हुए मगर सबसे बड़ा काम हुआ लोगों को जागरूक करना। इतना प्रेरित करना कि वे स्‍वयं सफाई दूत बन जाएं तथा व्‍यवस्‍था को तोड़ने वाले को रोकने लगे। इंदौर में ऐसा हुआ है।
आयुक्‍त मनीष सिंह की कार्यशैली तथा अंदाज की आलोचना हो सकती है। उनके निर्णयों से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इंदौर को बदलने की सफलता को नकारा नहीं जा सकता। बस अब चुनौती यह है कि इंदौर अपनी सफाई की इस आदत को हमेशा बरकरार रखे।

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