मुरैना कलेक्‍टर का थप्‍पड़ और चुनावी वर्ष में आईएएस की मुश्किल डगर

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मुरैना कलेक्‍टर, 2010 बैच के आईएएस भास्‍कर लक्षकार चर्चा में हैं। उन पर आरोप है कि अतिक्रमण हटाने की मुहिम के दौरान उन्‍होंने एक फौजी को थप्‍पड़ मार दिया। फौजी सादे कपड़ों में था। बाद में उसने गलती मानी कि आवेश में वह कलेक्‍टर को अधिक भला-बुरा कह गया था और कलेक्‍टर ने भी समझाया कि फौजी हैं तो उन्‍हें भी अवैधानिक कार्यों का बचाव नहीं करना चाहिए। बातचीत से मामला रफादफा हो गया मगर कलेक्‍टर का थप्‍पड़ कांड प्रशासनिक गलियारों में चर्चा में है। इसी तरह, रविवार को कांग्रेस के तेज तर्रार विधायक डॉ. गोविंद सिंह का भिंड जिले के कलेक्‍टर को निष्‍पक्ष बने रहने के लिए लिखा गया पत्र भी चर्चा में है। साफ है, आने वाला वक्‍त मैदान में तैनात अफसरों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण है कि कैसे वे अपने काम को भी करें और राजनीतिक रूप से निष्‍पक्ष भी बने रहें।

सरकारों को प्रमोटी आईएएस ही मैदानी पोस्टिंग के लिए अधिक सुहाते हैं क्‍योंकि वे अधिक समन्‍वयकारी होने के साथ ‘यस मैन’ होते हैं। माना जाता है कि लंबे प्रशासनिक अनुभव के कारण उन्‍हें परिस्थितियों को ‘हेण्‍डल’ करना तथा विवादास्‍पद मौकों पर गलियां निकालना आता है। जबकि, सीधी भर्ती के आईएएस को तुलनात्‍मक रूप से अधिक रूखा, स्‍पष्‍ट तथा कम लचीला माना जाता है। जब जून माह में प्रदेश में बड़ी प्रशासनिक सर्जरी की गई तब कलेक्‍टर पद पर पोस्टिंग में प्रमोटी आईएएस अफसरों की जगह सीधी भर्ती के अधिकारियों पर अधिक भरोसा जताया गया तो सभी चौंक गए। माना गया कि सरकार ने चुनावी गणित के बदले सख्‍त सुशासन को अधिक महत्‍व दिया है। इसी सूची में भास्‍कर लक्षकार को मुरैना कलेक्‍टर बना कर भेजा गया था। मुरैना केन्‍द्रीय मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर और भाजपा के ही ब्राह्मण नेता पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा के प्रभाव वाला क्षेत्र है। कलेक्‍टर लक्षकार अपने परिचितों में प्रगतिशील विचारों वाले व्‍यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उनके फेसबुक पोस्‍ट पढ़ कर भी ऐसा ही महसूस होता है। संगीतप्रेमी तथा प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई के प्रशंसक लक्षकार अपनी एक पोस्‍ट में लिखते हैं – ‘लगता है कि प्रतिगामी आम जनता के बीच अधिक स्वीकृति पाता है…और तर्क, बहस और विवेक से अधिक अपील करता लगता है… प्रगति हमेशा बकवास रही है।

महसूस होता है कि अपने प्रगतिशील‍ विचारों व प्रशासनिक सख्‍ती के कारण उन्‍होंने राजनीतिक दुश्‍मन अधिक खड़े किए। तभी तो क्षणिक आवेश के जवाब में मारे गए थप्‍पड़ कांड को ठंडा नहीं पड़ने दिया जा रहा है। इन विपरीत परिस्थितियों में पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा का मुख्‍यमंत्री को लिखा पत्र भी चर्चा में आ गया है, जो उन्‍होंने मुरैना कलेक्टर और एसपी को हटाने की मांग को लेकर लिखा था। मिश्रा का आरोप था कि कलेक्टर और एसपी ने उनके साथ जाकर लोगों की समस्या सुनने से इनकार कर दिया था। दोनों अधिकारी क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने में असफल हैं। ऐसे में इनका मुरैना जिले में रहना क्षेत्र के लोगों के लिए सही नहीं है।

ऐसा ही एक पत्र रविवार को कांग्रेस विधायक डॉ. गोविंद सिंह ने अपने जिले भिंड (चंबल संभाग का एक और प्रमुख जिला) के कलेक्‍टर इलैया राजा टी को लिखा। सिंह ने लिखा कि दो वर्ष के कार्यकाल में कलेक्‍टर ने ईमानदार अफसर की छवि बना कर काम किया इसलिए उन्‍होंने कलेक्‍टर के काम में हस्‍तक्षेप नहीं किया लेकिन अब जिले में रेत माफिया ने 100 से अधिक हत्‍याएं कर दी हैं अत: कलेक्‍टर को निष्‍पक्ष डीएम की भूमिका में आना चाहिए।

दोनों ही प्रसंग मैदानी अफसरों के लिए सबक की तरह हैं। 2018 चुनावी वर्ष है और राजनीतिक हितों के आड़े आने वाले, सख्‍त छवि बना चुके अफसरों को नेता अपने क्षेत्र में अधिक रहने नहीं देना चाहते। वहीं, सरकार का पक्ष लेने की आशंका भी अफसरों के लिए सिर दर्द बन सकती है। हितों के संघर्ष में ऐसे मामले लगातार बढ़ेंगे। अफसरों से भी उम्‍मीद होगी कि वे ‘नेता’ न बन कुशल प्रशासक बने रहें। नहीं तो राजनीति तो अपना काम कर ही लेगी जैसा मुरैना कलेक्‍टर लक्षकार ने फेसबुक पर अपनी पोस्‍ट में लिखा है– ‘थोड़े-बहुत अनुभव से कह सकता हूँ कि लोगों को मुद्दे सुलझाने में नहीं गरमाने में मज़ा आता है ताकि तंदूर जलता रहे, धंधा चलता रहे…।’

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