राजनीति के आकाश में एंटोनी के साथ रफाल का नया ‘टेक-ऑफ’

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बैंक-घोटालों की गर्दिशों में फंसी मोदी-सरकार के सामने भ्रष्टाचार के मुद्दों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों भाजपा के पुराने सहयोगी, शिवसेना के प्रमुख उध्दव ठाकरे ने आशंका व्यक्त की थी कि पीएनबी में नीरव मोदी के महाघोटाले के शोर में कहीं फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों से जुड़े विवाद ठंडे बस्ते में नहीं दब जाएं…? ठाकरे की आशंका सच साबित होती, उसके पहले ही यूपीए सरकार में रक्षामंत्री रहे एके एंटोनी ने अब राफेल के साथ राजनीति के आकाश में ‘टेक-ऑफ’ ले लिया है। एके एंटोनी के इस ‘टेक-ऑफ’ में रफाल का यह सौदा अपने पीछे सवालों के धुंए की गहरी लकीरें छोड़ रहा है। धुंए की लकीरों के इस ‘क्रॉस-वर्ड’ की कठिन पहेलियां फलक पर टूटते तारों की तरह अंधेरों में गुम होती जा रही हैं। फिलहाल मोदी-सरकार ने राष्ट्रीय-सुरक्षा और गोपनीयता की आड़ में रफाल सौदे पर जवाब देने से इंकार कर दिया है।
रफाल से जुड़े ये सवाल महज इसलिए अंधेरों में गुम नहीं होना चाहिए कि मोदी-सरकार के पास उनका तर्कसम्मत समाधान नहीं है। रक्षा सौदों का ट्रैक रखने वाले विशेषज्ञ समझ रहे हैं कि दाल में काला है, लेकिन केन्द्र-सरकार ने किचन के दरवाजों पर राष्ट्रीय-सुरक्षा और गोपनीयता के पहरेदारों को बिठा दिया है, ताकि यह पड़ताल नहीं हो सके दाल में कितना काला है?
रफाल से जुड़े विवादास्पद सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि एक पूर्व रक्षामंत्री, जिसने सबसे पहले फ्रांस-सरकार से रफाल खरीदने के लिए बातचीत शुरू की थी। वैसे भी राजनीतिक हलकों में एके एंटोनी साफ-सुथरी छवि वाले नेता माने जाते रहे हैं। इकॉनामिक-टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में एंटोनी ने रफाल-डील से जुड़े विभिन्न विवादास्पद पहलुओं का खुलासा किया है। बकौल एंटोनी रफाल लड़ाकू विमान खरीदने के मामले में मोदी-सरकार ने राष्ट्रीय-हितों का बड़ा नुकसान किया है। उन्होंने यह भी पूछा है कि रफाल की कीमतों का देश की सुरक्षा से क्या लेना-देना है?
एंटोनी ने कहा कि पूर्व रक्षामंत्री होने के नाते रक्षा-संबंधी मामलों में मैं टिप्पणी नहीं करता हूं, लेकिन हर मामले में पिछली सरकार पर टिप्पणी करना मोदी-सरकार की आदत में शुमार हो गया है। इसलिए मजबूरी में कुछ तथ्यों को सामने लाना जरूरी है। मोदी-सरकार ने भारत के हितों को नुकसान पहुंचाते हुए रफाल की निर्माता कंपनी दैसॉ को भरपूर फायदा पहुंचाया है। यूपीए सरकार ने दैसॉ के सामने 126 रफाल खरीदने के लिए अपने ‘रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोजल’ में चार शर्तें रखी थीं। पहली शर्त यह थी कि भारत फ्रांस से 18 विमान खरीदेगा। उसके बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बाकी 108 विमान बनाने के लिए लायसेंस मिलेगा। दूसरी शर्त में एयरक्राफ्ट की पूरी टेक्नॉलाजी भारत को दी जानी थी। तीसरी बंदिश यह थी कि फ्रांस ‘ऑफसेट-ऑब्लिगेशंस’ की शर्तों को 30 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी करेगा। चौथी शर्त के अंतर्गत ‘एग्रीमेंट’ में ‘लाइफ-सायकल कॉस्ट-क्लॉज’ रखा गया था।
एंटोनी का आरोप है कि मोदी-सरकार ने 36 विमान खरीदने का निर्णय करते वक्त पहली दो शर्तों को छोड़ दिया है। नतीजतन भारत की सरकारी कंपनी एचएएल के हाथों से टॉप क्लास ग्लोबल फाइटर जेट बनाने की टेक्नोलॉजी प्राप्त करने का अवसर निकल गया है। यदि यह टेक्नोलॉजी भारतीय कंपनी को मिल जाती तो भविष्य में हम विश्व-स्तरीय लड़ाकू विमानों के निर्यातक देश भी बन सकते थे।
उल्लेखनीय है कि मोदी-सरकार ने फ्रांस के साथ 780 करोड़ यूरो याने 60 हजार करोड़ रुपए में 36 राफेल विमान खरीदने के इस सौदे पर अप्रैल 2016 के दूसरे सप्ताह में अंतिम मुहर लगाई थी। इसके पहले जनवरी 2016 में प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने सहमति पत्र पर दस्तखत किए थे। दिलचस्प यह है कि खुद भाजपा में ही रफाल की खरीदी को लेकर आम-सहमति नहीं रही है। भाजपा के राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने उसी वक्त रफाल-सौदे पर नाराजी व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस विमान को कोई देश नहीं खरीद रहा है, उसे इतनी तवज्जो देने की जरूरत क्या है? रफाल के इर्द-गिर्द सवालों का बवण्डर गहरा होने लगा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अक्सर रफाल सौदे में घपलों का आरोप लगाते रहे हैं। केन्द्र-सरकार ने रफाल के मुद्दे पर फिलहाल भले ही चुप्पी ओढ़ रखी हो, लेकिन आगे-पीछे उसे जवाब तो देना ही पड़ेगा।

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