राहुल गांधी और स्मृति का राजनीतिक ‘अमेठी अचार’ ….

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क्या अचार भी राजनीतिक हथियार बन सक्ता है? क्या इसके माध्यम से चुनावी जीत दर्ज की जा सकती है? यह सवाल अगर केन्द्रीय खाद्य प्रस्ंस्करण मंत्री स्मृति ईरानी से पूछा जाए तो जवाब होगा-हां। शायद इसीलिए हाल में स्मृ‍ति ने कांग्रेस अध्यक्ष और यूपी के अमेठी से सांसद राहुल गांधी को चुनावी पटखनी देने के इरादे से ‘अमेठी अचार’ लांच करवाया। यह बात दूसरी है कि यह ‘अचारी नवाचार’ भी बैंक महाघोटाले हो हल्ले में दब गया। मंत्री स्मृति ईरानी के मुताबिक वे अचार के जरिए अमेठी की पहचान बदलना चाहती हैं। पिछले कई सालों से अमेठी का नाम गांधी परिवार से जुड़ा है। इस परिवार का कोई न कोई सदस्य यहां से चुनाव जीतता रहा है। क्षेत्र में इस परिवार की गहरी पैठ है, एक आत्मीय लगाव भी है। इसे कैसे ब्रेक किया जाए,इस पर भाजपा सालों से मंथन करती आ रही है, जिसका रामबाण उपाय उसे शायद अचार में ही मिला है।
राजनीतिक दृष्टि से ‘वीआईपी कांस्टीट्यूएंसी’ होने के अलावा अमेठी को आम और आंवले के भरपूर उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। स्मृति का आरोप है कि अमेठी में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की पर्याप्त संभावनाएं होते हुए भी गांधी परिवार ने क्षेत्र के विकास के लिए कुछ नहीं किया। गौरतलब है कि स्मृति ईरानी पिछले चुनाव में राहुल को अच्छी टक्कर देने के बावजूद हार गई थीं। अब गांधी परिवार की राजनीतिक जमीन को तोड़ने के ‍लिए उन्हें अचार का नया तोड़ सूझा है।
यूं भी अचार भारतीय पाकशास्त्र की एक अहम विधा है। यह फल, कंद और वनस्पति के साथ-साथ मछली और मेंढक तक से बनता है। जिस चीज का अचार बनता है , उसका और उसमें डलने वाले मसाले मिलकर जायके की ऐसी दुनिया रचते हैं कि खाने वाला उंगलियां चाटता रहता है। अचार मूलत: खाद्य वस्तुअों को संरक्षित करने का प्राचीन तरीका है, जिसमें संरक्षण के साथ सुस्वादुता और जायके की विभिन्नता का महत्व है। भारतीय खाने तो अचार के बगैर अधूरे हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी अचार काफी पसंद किया जाता है। फिर भी भारतीय उपमहाद्वीप में बनने वाले अचारों की बात ही कुछ और है। इनमें भी आम के अचार की हैसियत ‘राजा’ सी है। अचार बनाना या डालना भी अपने आप में एक कला है। इसे नेट पर देखकर या रेसिपी की किताब पढ़कर दोहराया तो जा सकता है, लेकिन उससे चटखारे लेने वाला स्वाद पैदा नहीं किया जा सकता। उसके लिए तो अनुभव और अच्छा मन ही चाहिए। आजकल डिब्बाबंद अचार का भी खूब चलन है। क्योंकि सुस्वादु अचार डालने वाली दादियों-नानियों की संख्या घटती जा रही है। दूसरी तरफ अचार का बाजार दिनो दिन बढ़ता जा रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक 2020 तक दु‍िनया में अचार का बाजार 12.74 अरब डाॅलर का होगा, जिसमें भारत की अहम हिस्सेदारी होगी।
लेकिन ‘अमेठी अचार’ केवल भोजन की थाली का स्वाद बढ़ाने के लिए एक व्यंजन मात्र नहीं है। वह वास्तव में ‘राजनीतिक अचार’ है, जिसका लक्ष्य स्थानीय लोगों को रोजगार देने के साथ-साथ कांग्रेस की बरसों पुरानी पंगत को उठाना भी है। जिस ढंग और नीयत से इसका प्रचार प्रसार किया जा रहा है, उसके पीछे प्रोसेस्ड फूड की मार्के‍टिंग के बजाए पाॅलिटिकल फूड मार्केटिंग ज्यादा है। मसलन हमे यह बताया गया कि अमेठी अचार क्षेत्र की ग्रामीण महिलाअों ने तैयार किया है। यह महिलाएं ही अघोषित रूप से मोदी सरकार की ब्रांड एम्बेसेडर भी हैं। स्मृति ने अपने ट्विटर अकाउंट पर इस अचार की तस्वीर शेयर करते हुए कहा ट्वीट करते हुए ईरानी ने लिखा, ‘अमेठी अचार – एक ब्रांड जन्मा, विकसित हुआ और बढ़ रहा है, अमेठी की महिलाओं के द्वारा, ये सब अप्रैल 2017 में खुले प्रधानमंत्री कौशल केंद्र (पीएमकेके) में हो रहा है।’ जाहिर है कि इस अचार का असली मकसद राहुल गांधी की घेराबंदी करना है और उनकी राजनीतिक थाली का स्वाद खराब करना है। राहुल की फूड हैबिट्स क्या हैं, इसकी लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन जन नेता बनने की पुरजोर कोशिश के तहत वो आजकल ठेले पर चाय पकौड़े भी खाने लगे हैं। अलबत्ता अचार के बारे में उनकी क्या राय है, क्या पसंद है, यह अभी अमेठी वालों को भी ठीक से पता है नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन वे अमेठी में अपनी खानदानी विरासत को किसी अचार भर से इतनी आसानी से विस्थापित नहीं होने देंगे। जबकि स्मृति प्रेरित ‘अमेठी अचार’ का मकसद यही संदेश देना है कि राहुल गांधी क्षेत्र से इतने साल सांसद रहने के बावजूद एक ढंग का अचार तक नहीं बनवा सके, जो स्मृति ने चुनाव हारने के बाद भी बनवा दिया। इसमें एक खतरा यह अर्थ निकाले जाने का भी सकता है कि चुनाव हारने के बाद व्यक्ति के पास अचार डलवाने के अलावा बचता ही क्या है? इसे नजर अंदाज करें तो स्मृति की उद्यमिता दूरगामी है। सोच यह है कि जब स्थानीय आम-आंवले से वहीं अचार बनने लगेगा तो किसानों को फायदा होगा, नौजवानों महिलाअोंको रोजगार मिलेगा। यह अचार बाहर बिकेगा तो सभी को आर्थिक लाभ होगा।
वास्तव में सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य से अचार बनाने या उसे डालने को ही राजनीतिक शब्दावली में ‘विकास’ कहते हैं। अब राहुल गांधी के समक्ष चुनौती यह है कि वे इस अचार पाॅलिटिक्स का जवाब किस तरह से दें? क्या वे पापड़- बड़ी उद्दयोग से इसका काउंटर करें या फिर चुनाव क्षेत्र ही बदल डालें ? यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस अचार उद्योग को अमेठी के मतदाता किस रूप में लेंगे ? उधर स्मृति के सामने बड़ी दिक्कत यह हो सकती है कि पुराना अचार नए अचार की तुलना में कई गुना स्वादिष्ट होता है।

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