‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ : जरूरी पहल का हश्र दिग्‍गी की मानव विकास रिपोर्ट जैसा न हो

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मप्र देश का पहला राज्‍य है जो अपने बाशिंदों की खुशी का स्‍तर पता लगाने के लिए ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ तैयार करने जा रहा है। सही-सही स्‍तर पता लगाने के लिए विस्‍तृत और अधिक लोगों से सर्वे की योजना है जबकि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रस्‍तुत होने वाले ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ में पूरे विश्‍व में पांच हजार से कम लोगों से बात कर खुशी का पैमाना बता दिया जाता है। इस तरह हम अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के आधार पर अपनी खुशी का स्‍तर खुद माप पाएंगे। यह इंडेक्‍स हमें अपनी नीतियों की समीक्षा करने का मौका तथा आवश्‍यक कार्यक्रमों के निर्माण के बारे में जानकारी दे सकता है। अकादमी और व्‍यवहारिक रूप से आवश्‍यक होने के बाद भी इस इंडेक्‍स का बहुत अधिक राजनीतिक महत्‍व नहीं है। बल्कि यह राजनीतिक रूप से ‘बूमरेंग’ भी साबित हो सकता है। ऐसे में एक ही भय है कि कहीं इसका हाल भी दिग्विजय शासन काल में शुरू की गई मानव विकास रिपोर्ट प्रस्‍तुत करने की परंपरा की तरह न हो। आपको याद होगा, 1995 में मप्र देश का पहला राज्‍य बन गया था जिसने अंतर्राष्‍ट्रीय मानव विकास सूचकांक की तरह अपनी अलग मानव विकास रिपोर्ट जारी की थी।

अब मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जैसे एक जिद कर ली है कि मप्र योजनाओं के निर्माण व नवाचार में अव्‍वल ही रहेगा। तभी यहां कई ऐसी योजनाएं हैं जो देश में सबसे पहले आरंभ की गई। इनके परिणाम की बात दूसरा पहलू है। मगर, योजनाओं को आरंभ करने में तो हम अव्‍वल है हीं। ऐसा ही एक संकल्‍प लिया गया है मप्र अपना ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ जारी करेगा। खुशी को नापा भी जा सकता है क्‍या और क्‍या संसाधनों से ही खुशी पाई जा सकती है जैसे सवालों के साथ ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ हमेशा संदेह के घेरे में रहा है। संसाधनों को अधिक महत्‍व नहीं देने वाले कबीर और रहीम के देश में खुशी का पैमाना ही अलग है। हम तो संतोषी को सदा सुखी कहते आए हैं। जबकि पश्चिम का मानना है कि पाने की भूख न रहे तो विकास की राह नहीं सुझती।

ऐसे में संसाधनों से मिली संतुष्टि के आधार पर खुशी खोजते पश्चिमी पैमानों से अलग अपनी स्‍थानिकता के आधार पर खुशी का स्‍तर तलाशना महत्‍वपूर्ण कदम है। यह अकादमिक रूप से इसलिए अहम् है कि इस आधार पर प्रदेश अपनी नीतियों की राह तय कर सकेगा। अलग-अलग क्षेत्रों और बसाहटों की आवश्‍यकताओं को जान सकेगा। लेकिन राजनेताओं के हर कार्य में राजनीतिक लाभ की पड़ताल की ही जाती है। सो, ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ के राजनीतिक लाभों के बारे में भी सोचा जा रहा है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंडेक्‍स बनाने का काम ‘साइलेंट वर्कर’ माने जाने वाले अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव इकबाल सिंह बैंस को दिया है। उनकी टीम यह काम करने में पूरी तन्‍मयता से जुटी है। तैयारी है कि 2018 के चुनाव के पहले मप्र का अपना ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ ले आया जाए।

ऐसा हुआ तो चुनाव के पहले ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ की भरपूर चर्चा होगी। यदि इसमें मप्र को अतिरिक्‍त खुश दिखाई दिया तो विपक्ष सरकार को घेरने से चूकेगा नहीं और यदि उम्‍मीद से कम खुशी का स्‍तर पाया गया तो भी 2003 से मप्र में शासन कर रही भाजपा निशाने पर होगी। यानि, ‘हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स’ तैयार करने का निर्णय राजनीतिक जोखिम से भरा है। एंटीइंकम्‍बेंसी के पूर्ण खतरे के समय में भी मुख्‍यमंत्री चौहान इसे पूरा करना चाहते हैं तो इसका कारण इंडेक्‍स का नीतिगत महत्‍व ही है। यह राजनीतिक जोखिम प्रदेश के लिए मुनाफे का सौदा तभी हो सकता है जब यह इंडेक्‍स सही रूप से तैयार हो। इससे मिले तथ्‍यों का शासन-प्रशासन में उपयोग हो और यह भविष्‍य में भी सुनिश्चित समय पर जारी होता रहे। वरना तो ऐतिहासिक कही जाने वाली मानव विकास रिपोर्ट भी 1995, 1998, 2003 और 2007 के बाद कभी जारी ही नहीं हो सकी। अन्‍यथा तो आनंद विभाग और उसकी गतिविधियों तात्‍कालिक आनंद भर साबित होगी और इस पर होने वाला व्‍यय ‘तुगलकी खर्च’ माना जाएगा।

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