अमेरिका में स्कूल टीचरों को हथियार देने के क्या मायने ?

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अपने ही देश में घटते जनसमर्थन और आए दिन हो रही स्कूल शूटिंग की निर्मम घटनाअो के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि अब चुनिंदा टीचरों को स्कूल में हथियार लेकर आने छूट दी जाएगी। इसके पहले उन्हें बंदूक चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। अमेरिका के स्कूलों में मासूम बच्चों की अविवेकी हत्याअों पर नियंत्रण का यह शेखचिल्ली सुझाव है। ट्रंप ऐसा करके अमेरिकी समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं, समझना मुश्किल है। क्योंकि विश्व के विकसित देशों का सिरमौर कहाने वाला अमेरिका आज स्वयं अपनी खोदी हुई खाइयों में गिरा जा रहा है। बीते हफ्ते फ्लोरिडा राज्य के  मयामी में मारजोरी स्टोनमैन डगलस हाई स्कूल में हुई अंधाधुंध गोलीबारी में 17 लोगों की जानें चलीं गईं। इनमें कई मासूम बच्चे थे। हत्या के आरोपी सिरफिरे किशोर निकोलस क्रूज को पुलिस ने गिरफ्‍तार किया। क्रूज ने ऐसा क्यों किया, इसका ठीक-ठीक खुलासा अभी नहीं हुआ है। लेकिन बताया जाता है कि निकोलस की महत्वाकांक्षा एक ‘नामी स्कूल शूटर’ बनने की थी।

वैसे विद्या और संस्कारों के मंदिर स्कूलों में इस तरह की शूटिंग अमेरिका में नई बात नहीं है। अमेरिकी इतिहास में इस तरह की पहली घटना 1764 में हुई थी, जब पेनसिल्वानिया के एक स्कूल में घुसकर हमलावरों ने 10 छात्रों को मार डााला था। उसके बाद ऐसे कई हादसे वहां होते रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 2013 के बाद से अमेरिका में औसतन हर हफ्ते स्कूल शूटिंग की एक घटना हुई है। हैरानी की बात है कि इस तरह निर्दोष लोगों को मारने की प्रवृत्ति को अमेरिका आतंकी घटना बताता है, लेकिन खुद अमेरिका के स्कूलों में जब ऐसा नरसंहार होता है तो उसे ‘स्कूल शूटिंग’ कहा जाता है। गोया कोई शूटिंग चैम्पियनशिप हो। स्कूल शूटिंग में बाहरी लोग ही ऐसे कृत्य को अंजाम देते हों, जरूरी नहीं है। इसी साल जनवरी में हुई एक घटना में एक छात्र ने ही बंदूक से दूसरे की जान ले ली थी। स्कूलों होने वाले इस तरह के नरसंहारों से अमेरिकी समाज चिंतित तो है, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा है। इसके कई कारण हैं। पहला प्रमुख कारण अमेरिका में आग्नेयास्त्रों और खासकर बंदूकों का खुला बाजार है। बंदूकें वहां खिलौनों की तरह मिलती हैं। यूं इसके भी  कुछ नियम हैं और वो भी हर राज्य में अलग-अलग हैं। लेकिन ये नियम-कायदे इतने लचर हैं कि उसके होने न होने से खास फर्क नहीं पड़ता।

कोई भी हथियार जहां आत्म सुरक्षा का अहसास कराता है, उससे भी ज्यादा वह इंसान को हिंसक और आक्रामक बनाता है। अमेरिका में यही हो रहा है। सीएनएन के पिछले दिनों कुछ आंकड़े जारी किए थे, जिसके मुताबिक अमेरिका की आबादी विश्व की कुल जनसंख्‍या का 5 फीसदी है, लेकिन वहां जितने लोगों के पास बंदूकें हैं, वह आंकड़ा 31 फीसदी बैठता है। 2007 के आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका में हर 100 में से 88.8 व्यक्तियों के पास बंदूक है, जो विश्व में सर्वाधिक है।

कहते हैं मप्र के चंबल अंचल में लोगों की हथियारों के प्रति दीवानगी है, लेकिन अमेरिकियों का हथियार प्रेम तो उससे भी कहीं ज्यादा है। सवाल यह है कि अमेरिका में लोग इतने हथियार प्रेमी क्यों हैं? इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिकी संविधान में नागरिकों को हथियार रखने का अधिकार दिया गया है। लोग इसे कम करना नहीं चाहते। दूसरा बड़ा कारण अमेरिका की नेशनल राइफल एसोसिएशन है। यह ऐसी संस्था है, जो 1871 में इस बिना पर वजूद में आई कि लोगों को वैज्ञानिक ढंग से हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाए। इस संस्था के सदस्यों की संख्या लाखों में है, जिनमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति भी शामिल हैं। यह संस्था देश की उस ताकतवर हथियार लाॅबी को सपोर्ट करती है, जिसका काम हथियार निर्माण और सप्लाई का है। यह लाॅबी अमेरिका में ऐसा कोई कानून नहीं बनने देती, जिससे हथियारों का बाजार नियंत्रित हो या उनका धंधा मंदा हो।

हाल में फ्लोरिडा स्कूल नरसंहार के बाद यह बहस अमेरिका में फिर तेज हो गई है कि क्यों न हथियार रखने पर कड़ा नियं‍त्रण लागू किया जाए ? लेकिन कोई निष्कर्ष इसलिए नहीं निकल पाया क्योंकि अमेरिका में इस मुद्दे पर दो धाराएं हैं। पहली का तर्क है कि ‘ज्यादा बंदूकें यानी ज्यादा सुरक्षा।‘ यह लाॅबी दावा करती है कि चूंकि अमेरिका में औसतन हर दूसरे व्यक्ति के पास बंदूक है, इसलिए वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। इसे कम करना खतरनाक होगा। दूसरी लाॅबी का तर्क है कि ‘ज्यादा बंदूकें यानी ज्यादा असुरक्षा।‘ क्योंकि कोई भी हथियार किसी भी सिरफिरे के पास जा सकता है और नतीजा वही होता है, जो फ्लोरिडा के स्कूल में हुआ। कहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति बराक अोबामा ने अमेरिका में ‘गन कल्चर’ पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी, लेकिन गन लाॅबी ने उन्हें ही फेल कर ‍िदया। अब तो डोनाल्ड ट्रंप का राज है, जो खुद ही ‘आंख के बदले आंख’ थ्योरी में भरोसा करते हैं।

सोचने की बात यह भी है कि पूरी दुनिया को ज्ञान बांटने और हर देश को उसकी समस्या का निदान बताने का दावा करने वाला अमेरिका अपने ही यहां ‘गन कल्चर’ क्यों खत्म नहीं कर पा रहा है? क्योंकि ये घटनाएं किन्हीं संगठित आतं‍कवादियों अथवा किसी खास विचारधारा से प्रेरित होकर अंजाम नहीं दी जा रही हैं। ज्यादातर मामलों में बच्चों की जान लेने वाले ऐसे सिरफिरे या दिमागी तौर पर बीमार लोग हैं, जिन्हें जीवन का कोई लक्ष्य या उद्देश्य नहीं है, जो कुंठा में जीने वाले और भटके हुए लोग हैं।  फ्लोरिडा के ‘स्कूल शूटर’ निकोलस का अतीत भी उपेक्षाभरा  और संस्कारविहीन रहा है। स्कूल शूटिंग समस्या का ट्रंप जो हल सुझा रहे हैं, वह तो समस्या को और जटिल करने वाला है। बच्चों की हत्याएं रोकने टीचरों को बंदूकें रखने की इजाजत देना वैसा ही है मानो आग बुझाने के लिए चिंगारियां बरसाना। दरअसल समस्या की जड़ उस अमेरिकी संस्कृति और सोच में है, जो हथियार को दोस्त समझती है। विरोधाभास यह है कि अगर अमेरिका इतना ही सु‍रक्षित देश है तो वहां इतने लोगों को बंदूकें रखने की जरूरत क्या है? जब वहां आए दिन बचपन मारा जा रहा हो और समाज का एक बड़ा तबका इससे परेशान हो, तब भी अमेरिकी तंत्र बंदूकों पर रोक लगाने से कतराता क्यों है? बुनियादी तौर पर ‘ज्यादा बंदूकें, ज्यादा सुरक्षा’ थ्योरी ही गलत है। इससे कभी कोई समस्या हल नहीं हुई। व्यक्ति की आजादी का अर्थ कुछ भी करने से है तो निकोलस जैसे स्कूल शूटर ही पैदा होंगे। कम से कम भारत को ऐसी सोच से बचना चाहिए।

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