कमल हासन के नए सियासी फूल में कितनी खुशबू ?

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न जाने क्यों भारत और खासकर दक्षिण भारत में मनोरंजन उद्दयोग में कामयाबी के झंडे गाड़ने के बाद अभिनेता अपनी पहचान के आगे ‘अभि’ शब्द हटवाना चाहते हैं। यह जानते हुए ‍िक नेता बनकर भी उन्हें अंतत: अभिनय ही करना है। ताजा मामला तमिलनाडु की राजनीति में उगे ‘नए सूरज’ यानी कमल हासन का है। कमल ने राज्य की सांस्कृतिक राजधानी मदुराई से अपनी नई सियासी पार्टी ‘मक्कल नीथि मय्यम’ ( जन न्याय केन्द्र ) यानी एमएनएम लांच की। शहर के अोट्टाकडई ग्राउंड पर जमी भीड़ को संबोधित करते हुए कमल हासन ने ऐलान किया कि उनकी नई पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘ईमानदार लड़ाई’ लड़ेगी। साथ ही द्रविड़ संस्कृति को प्रोत्साहित करेगी। कमल ने सूर्यास्त के बाद पार्टी का नया झंडा भी फहराया। उन्होने दावा ‍िकया कि नई पार्टी ‘जनता के शासन’ की दिशा में पहला कदम है। गौरतलब है कि कमल हासन तमिल और हिंदी फिल्म के जाने-माने स्टार रहे हैं। वे बेहतरीन अभिनेता हैं। इसी से उन्होने नाम और नामा कमाया। साठ का होते-होते उन्हें लगा कि अम्मा जे. जयललिता के जाने से तमिलनाडु में उपजे राजनीतिक शून्य को भरने के लिए कमल हासन जैसे लोगों की जरूरत है। अपनी नई पार्टी को कमल पूरे दक्षिण भारत की पार्टी की तरह पेश करना चाहते हैं। शायद इसीलिए उनकी पार्टी एमएनएम के झंडे में छह हाथ हैं, जो आपस में गुंथे हुए हैं। बीच में एक सितारा है, जो जनता का प्रतीक है। कमल का दावा है कि उनकी पार्टी ऐसी राजनीति के लिए प्रतिबद्ध है जो ‘जाति-धर्म के खेल’ से परे और सुशासन पर केंद्रित होगी। कमल की इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर आम आदमी पार्टी का साथ मिला। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल खुद नई पार्टी लांचिंग पर मौजूद रहे।

कमल हासन ने जो दावे किए, वो राजनीति में कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ सालों से भारतीय राजनीति का लोक लुभावन मुद्दा भ्रष्टाचार का है। सत्ता में आने के लिए हर पार्टी इसे जड़ मूल से  खत्म करने का वादा करती है और सत्ता में आते ही इसे नए सिरे से पोसने में लग जाती है। ऐसे में कमल हासन भ्रष्टाचार कैसे और ‍किस दम पर खत्म करेंगे, कोई नहीं जानता। फिर भी उनके हौसले की दाद दी जानी चाहिए। वैसे दक्षिण की राजनीति में अभिनेताअो के लिए हमेशा ही संभावनाएं रही हैं। इनमें भी सबसे लंबा राजनीतिक कॅरियर अभिनेत्री से राजनेता बनी तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयल‍लिता का रहा। वहां अभिनेताअोंका  व्यक्तिगत जलवा इतना होता है कि उसके आगे राजनीतिक‍ विचारधारा और अन्य मुद्दे फीके पड़ जाते हैं। इस ‍दृष्टि से जयललिता का उदाहरण इसलिए विशेष है, क्योंकि उन्होने उस पार्टी का भरपूर नेतृत्व किया, जो मूलत: ब्राह्मण विरोध और द्रविडवाद के कारण वजूद में आई थी। जयललिता खुद ब्राह्मण थीं, लेकिन उन्होने ब्राह्मण विरोधियों में खुद को देवी की तरह स्थापित कर लिया था।

जहां तक कमल हासन की पार्टी का सवाल है तो वह राज्य में कमोबेश सक्रिय 56 राजनीतिक पार्टियों के बाद 57 वीं पार्टी होगी। उपलब्‍ध जानकारी के मुताबिक राज्य में ये पार्टियां मुख्‍य रूप से पांच धाराअो में बंटी हैं। इनमें 7 तमिल राष्ट्रवादी पार्टियां, 13 द्रविडवादी पार्टियां, 15 भारतीय राष्ट्रीय पार्टियां, 18 क्षेत्रीय पार्टियां और 3 समाजवादी/ साम्यवादी पार्टियां हैं। एक पार्टी रजनीकांत की और आने वााली है।

कमल जानते हैं कि समकालीन तमिल राजनीति की बुनियाद मुख्‍यत: तमिल अस्मिता के संरक्षण, द्रविडवाद और अन्य स्थानीय मुद्दों पर टिकी है। बीते पांच दशकों से राज्य की सियासत दो पार्टियों द्रमुक और अन्नाद्रमुक में बंटी है। जयललिता के निधन के बाद भाजपा यहां राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की जमीन तलाश रही है, लेकिन उसे खास सफलता नहीं मिली है। ऐसे में सवाल यह है कि कमल हासन नया क्या कर सकेंगे? राज्य की राजनीति में उनकी सफलता की संभावना कितनी है? वे लीक- लीक ही चलेंगे या लीक से हटकर चलेंगे? इन सवालों  के जवाब अभी मिलने हैं। जमीनी सचाई यह है कि खुद को नास्तिक मानने वाले कमल वैष्णव अयंगार ब्राह्मण परिवार से आते हैं, जो अत्यंत अल्प संख्या में हैं। इसका अर्थ है कि राज्य में उन्हें जातीय समर्थन मिलना संभव नहीं है। कमल द्रविड वाद के समर्थक हैं, लेकिन प्रदेश की दो बड़ी पार्टियां मजबूती से यही राजनीति सालों से करती आ रही हैं। फिर बचता है भ्रष्टाचार का मुद्दा । भ्रष्टाचार इस देश के जन-जन की पीड़ा है, लेकिन वह चुनावी राजनीति का मुद्दा कभी नहीं बनता। क्योंकि जब समाज का ही नैतिक पतन हो गया हो तो राजनीति को गंगा की पवित्र करने का दावा महज शोशेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है। कमल हासन का व्यक्तिगत जीवन भी ऐसा नहीं है कि लाल बहादुर शास्त्री की तरह कोई उनसे  प्रेरणा ले। नास्तिक होते हुए भी उन्होने फिल्मों में कई देवी देवताअों के चरित्र निभाए। उनकी तमिल ब्लाक बस्टर फिल्म ‘दशावतारम्’ में कमल ने वैष्णव मत के महात्म्य की स्थापना और शैव मत की आलोचना की थी। वही कमल अब धर्म निरपेक्षता के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं। चर्चा यह भी है कि वे कल को रजनीकांत की संभावित पार्टी से हाथ मिला सकते हैं। कमल का झुकाव  वामपंथ की अोर है, लेकिन वे भगवा को खारिज भी नहीं करना चाहते। इसीलिए उनकी पार्टी के तिरंगे झंडे में एक रंग केसरिया भी है। कमल यह नारा दे रहे हैं कि ‘कल हमारा है !’ लेकिन यह होगा कैसे यह समझना कठिन है। क्योंकि तमिल जनता एक तरफ द्रविडवाद की समर्थक है तो निजी तौर पर अत्यंत धार्मिक भी है। शायद ही ऐसा कोई मुद्दा हो, जिस पर कमल दूसरी तमिल पार्टियों से हटकर कोई स्टैंड ले सकें। हालांकि केजरीवाल की नजर में कमल में काफी संभावनाएं हैं। लेकिन द्रमुक नेता एमके स्ट‍ालिन कमल हासन को ऐसा ‘कागज का फूल’ मानते हैं, जिसमें कोई गंध नहीं है। किसी भी राजनीतिक पार्टी अथवा राजनेता में यह गंध समर्पित कैडर और एक निश्चित विचारधारा के लोकव्यापीकरण के लिए किए जाने वाले सतत संघर्ष से आती है। वरना सियासी दलों के बाजार में एक और नई दुकान खुल जाने से ज्यादा नई पार्टी का बनाने का कोई महत्व नहीं है।

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