क्या विश्व सुंदरियों के देश को बचा पाएगी क्रिप्टोकरेंसी ?

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भारत सहित दु‍निया के कई देश जिस क्रिप्टोकरेंसी को नकार चुके हैं, उसी के भरोसे दक्षिण अमेरिका का उत्तरी देश वेनेजुएला अपनी तकदीर बदलने का आखिरी दावं चल रहा है। कभी विश्व सुंदरियों के लिए चर्चित रहे वेनेजुएला की हालत आज भिख‍ारियों जैसी है। देश की अधिकृत मुद्रा ‘बोलीवर’ महज कागज का टुकड़ा बन चुकी है। देश के बदतर आर्थिक हालात को सम्हालने देश के राष्ट्रपति निकोलास मादुरा ने अब क्रिप्टोकरेंसी ‘पेट्रो’ बेचना शुरू कर दिया है। इस हिसाब से ‘पेट्रो’ विश्व की पहली अधिमान्य क्रिप्टोकरेंसी है। वेनेजुएला की वामपंथी सरकार ने शुरुआती बिक्री के लिए पेट्रो की 3.84 करोड़ इकाइयां आॅफर की हैं। यह बिक्री 19 मार्च तक चलेगी। राष्ट्रपति मादुरो के मुताबिक बिक्री के शुरुआती 20 घंटे में पेट्रो को 73.5 करोड़ डॉलर की पेशकश मिली। इससे उत्साहित मादुरो ने कहा-‘पेट्रो हमारी स्वतंत्रता एवं आर्थिक स्वायत्तता को मजबूत करता है। यह हमें उन विदेशी ताकतों के लालच से बचने में मदद करेगा जो हमारा तेल बाजार जब्त कर हमें घुटन में रखने की कोशिश कर रही हैं।‘

यहां यह समझना जरूरी है कि क्रिप्टोकरेंसी है क्या, यह कैसे वजूद में आई और क्यों वेनेजुएला को इसे अपनाने पर मजबूर होना पड़ा। दरअसल क्रिप्टोकरेंसी एक डिजीटल मुद्रा है, जिसका मूल्य कुछ एसेट्स के आधार पर तय होता है। इसका कोई केन्द्रीकृत नियं‍त्रण नहीं होता। यह बाजार के हिसाब से चलती है। भारत में यह ‘बिटकाॅइन’  नाम से चर्चित रही है। कई बड़े सौदे इस मुद्रा में हो भी रहे हैं। लेकिन इस की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। यह  पारंपरिक मुद्राअों की तरह यह किसी बैंक से जुड़ी नहीं होती। इसका लेन देन आॅन लाइन वेबसाइट्स पर ही होता है। बीच में भारत ने बिटकाॅइन ने खासा उछाल मारा था, फिर वो धड़ाम से नीचे आ गई। इसके असुरक्षित व्यवहार के चलते ही  भारत सरकार ने इसे मान्यता नहीं दी है। क्योंकि देश में इसके विनियमन की कोई व्यवस्था नहीं है। विश्व के कई अन्य देशों ने भी क्रिप्टोकरेंसी अपनाने की कोशिश की थी, लेकिन इसे मान्यता देने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। अलबत्ता बिचौलियो के माध्यम से क्रिप्टोकरेंसी को कहीं भी पहुंचाया जा सकता है।

इतना जोखिम होते हुए भी वेनेजुएला सरकार ने क्रिप्टोकरेंसी ‘पेट्रो’ को अधिकृत मुद्रा घोषित किया है तो इसकी वजह देश की भयावह कंगाली है। इसके पीछे कई कारण है। वेनेजुएला वो देश है, जो भारत से भी सौ साल पहले आजाद हो गया था। इस देश में जैविक विविधता अत्यधिक है और विश्व का  सबसे बड़ा तेल भंडार भी है। इसके चलते देश की 95 फीसदी अर्थव्यवस्था तेल पर ही निर्भर है। क्रूड आॅइल के गिरते दामों ने इस देश का भी कचूमर निकाल दिया है। हालत यह है कि देश की तीन करोड़ आबादी में से 66 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। लोगों के पास न तो खाने के लिए है और न ही ठीक से पहनने के लिए। काम धंधे लगभग ठप हो चुके हैं। यूं देश में दो दशकों से साम्यवादी सरकार है, लेकिन उसके राज में हालात सुधरने के बजाए खराब ही हुए हैं। इसका एक कारण अंतरराष्ट्रीय ‘षडयंत्र’ भी है। राष्ट्रपति मादुरो ने अपने बयान में इसी पर हमला किया है। वेनेजुएला में साम्यवादी सरकार अमेरिका को कभी रास नहीं आई। अमेरिका की ट्रंप सरकार ने वेनेजुएला पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। नतीजा यह है कि वेनेजुएला की प्रतिभूतियां अमेरिकी नहीं खरीद सकते। आज देश की बड़ी आबादी पड़ोसी कोलंबिया पलायन कर गई है। खाने के लिए दंगे और मारकाट होना आम बात है। दुनिया में सबसे ज्यादा मर्डर भी वेनेजुएला में होते हैं। महंगाई का आलम यह है कि रूपए में ‍िगने  तो एक लीटर दूध अस्सी हजार रूपए में आएगा। एक किलो मीट चाहिए तो 3 लाख रू. गिनने होंगे। लेकिन अधिकांश आबादी के पास ये खरीदने के लिए भी पैसे ही नहीं हैं। लोग सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। वेनेजुएला की इस आर्थिक बदहाली के चलते पड़ोसी देशों ने भी पल्ला झाड़ लिया है। हालत यह है कि

दक्षिण अमेरिकी देश पेरू की राजधानी लीमा में अप्रैल में होने वाले सम्मेलन में वेनेजुएला के राष्‍ट्रपति को न बुलाने पर कई देशों ने सहमति जता दी है। जबकि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो  ने सम्मेलन में जाने  की स्वीकृति दे दी है।

 

कुल मिलाकर दुनिया के मेले मे वेनेजुएला अकेला ऐसा देश है, जिसे अपने हालात से खुद लड़ना है। ऐसे मे राष्ट्रपति मादुरो ने बहुत जोखिम भरा दांव खेला है। बकौल मादुरो ‘बड़ी समस्या का समाधान भी बड़ा ही होगा।‘ सो, उन्होने यह समाधान क्रिप्टोकरेंसी ‘पेट्रो’ में खोजा है। लोगों से कहा जा रहा है कि वे अपने दैनंदिन भुगतान के लिए ‘पेट्रो’ खरीदें। पेट्रो का मूल्य क्रूड आइल के बैरल के रेट के हिसाब से तय किया गया है। मादुरो की यह कोशिश कितनी सफल होगी, कहना मुश्किल है। फिर भी उनके सामने ‘मरता क्या न करता’ वाली‍ स्थिति है। इसी साल अप्रैल में देश में चुनाव भी होने हैं। ऐसे में यह संदेश देना जरूरी है कि मादुरो कंगाली में डूबते देश को बचाने के ‍िलए क्या कुछ कर रहे हैं। वेनेजुएला के इस प्रयोग को पूरी दुनिया हैरत और कौतुहल के साथ देख रही है। अगर ‘पेट्रो’ वेनेजुएला को माली बदहाली से उबार सका तो दुनिया के कुछ और ऐसे देश भी क्रिप्टोकरेंसी अपनाने की सोचेंगे। ऐसा हुआ तो विश्व की स्थापित मुद्राअो की हालत पतली होगी। अगर ‘पेट्रो’ प्रयोग फ्लाॅप हो गया तो क्रिप्टोकरेंसी को अधिकृत  मुद्रा बनाने का प्लान भी फेल होगा और शायद राष्ट्रपति मादुरा का राजनीतिक भविष्य भी।

 

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