चुनाव चिह्न की जगह तस्वीर लगाने से नीयत कैसे बदलेगी?

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अगले माह देश में चुनाव सुधारों और जनलोकपाल को लेकर सत्याग्रह करने जा रहे समाजसेवी अण्णा हजारे ने  एक नया सुझाव दिया है। अण्णा ने कहा है कि आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी के चेहरे ( फोटो) को ही चुनाव चिह्न बनाया जाना चाहिए। इससे न सिर्फ चुनाव चिह्नों की नीलामी बंद होगी, बल्कि प्रत्याशी चुनाव जीतने के बाद भी जनता के बीच रहने को बाध्य होगा। भविष्य में भी उसे अपने चेहरे की पहचान कराने से ही वोट मिलेगा, इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। अण्णा ने यह नई बात यूपी के सदरौना स्थित मान्यवर कांशीराम शहरी आवास काॅलोनी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कही। उन्होने कहा कि अगर लोकतंत्र को मुक्त करना है तो इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को ही प्रत्याशी का चुनाव चिह्न बनाया जाना चाहिए। अण्णा ने ‘राइट टू रिजेक्ट’ को प्रभावी बनाने की पैरवी करते हुए कहा कि चुनाव प्रणाली में सुधार के बिना ना तो राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकेगी और ना ही जनहित में कार्य होगा। चुनावी खामी के कारण ही जनता की सरकार बनने के बजाय दल की सरकार बनती है, इसीलिए सरकारें जनहित के बजाय ‘दलहित’ में काम करती हैं।

अण्णा का सुझाव महत्वपूर्ण इस मायने में है कि उन्होने चुनाव सुधारों की दृष्टि से एक नया विचार सामने रखा है। उनकी इस बात में भी दम है कि देश में भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण खुद चुनाव हैं। क्योंकि चुनाव के जरिए ही मतदाता राजनीतिक दलों को सत्ता सौंपते हैं और सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल हर हथकंडा अपनाते हैं। चुनावी जीत हासिल करने के लिए सियासी दल और प्रत्याशी पैसा पानी की तरह बहाते हैं। बहाने के लिए पहले पैसा अलग-अलग तरीकों से जुटाना पड़ता है। यहीं से भ्रष्टाचार का श्रीगणेश होता है। मार्केटिंग की भाषा में कहें तो चुनाव जीतना भी आजकल एक इन्वेस्टमेंट है, जिसकी वसूली सरकार बनाकर अथवा चुनाव जीतने के बाद विभिन्न तरीकों से की जाती है। यानी सत्ता में आने के लिए भी पैसा चाहिए और सत्ता में बने रहने के लिए भी पैसा चाहिए। यह पैसा‍ ‍किस रास्ते से आए इसको लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां मौन रखना पसंद करती हैं। मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे राजनीतिक बांड इसी ‘सु‍नियोजित गोपनीयता’ का हिस्सा माना जा सकता है।

भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है। कोई भी राजनीतिक दल समान सोच के व्यक्तियों का संगठन होता है, जिसका काम एक निश्चित विचारधारा अथवा दृष्टि को जनता के समक्ष रखकर उससे सत्ता संचालन का अधिकार प्राप्त करना होता है। ऐसे में राजनीतिक दल, वे चाहे कितने भी भ्रष्ट क्यों न हों, जनमत तैयार करने, उसे शिक्षित करने का काम अपने ढंग से करते हैं। साथ ही  वे  देश को राजनीतिक स्थिरता देने और इसके लिए कैडर तैयार करने का काम भी हैं। बहुदलीय लोकतंत्र में जनता के सामने विकल्प होता है कि वह किसी एक अथवा समान विचारधारा के दलों को सत्ता की चाबी सौंपें। राजनीतिक दलों के ये प्रत्याशी पार्टी चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतते हैं। यह अधिकार उन्हें पार्टी देती है। निर्दलीय प्रत्याशियों के मामले में चुनाव अायोग उन्हें चुनाव चिह्न चुनने का विकल्प देता है। इसी आधार पर लोग उन्हे वोट देते हैं।

अब अण्णा का सुझाव यह है कि प्रत्याशी पार्टी के अधिकृत चुनाव चिह्न के बजाए अपनी तस्वीरें लगाकर वोट बटोरें। इससे लोगों को पता चलेगा कि उन्होने किस व्यक्ति को चुनकर विधानमंडल में भेजा है। व्यक्ति की पहचान ही पार्टी की पहचान होगी। लोग सीधे व्यक्ति से जवाब तलब कर सकते हैं। जवाबदेही के लिए उसे जनता के बीच ही रहना होगा।

अण्णा के इस सुझाव की भावना भले पवित्र हो, लेकिन उसकी व्यावहारिकता पर कई सवाल हैं। अगर प्रत्याशियों की फोटो ही चुनाव चिह्न बना दी जाएगी तो पार्टी से व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। अर्थात यह व्यक्ति विशेष के चेहरे पर ही जनमत संग्रह जैसा होगा। दलीय लोकतंत्र इसकी इजाजत नहीं देता। वह विचारधारा और पार्टी कार्यक्रम को तवज्जो देता है। केवल फोटो पर वोट बटोरने से दलीय अनुशासन भंग होने का खतरा भी है। इससे नई अराजकता पैदा हो सकती है। केवल चेहरे पर चुने हुए लोगों को एक निश्चित तंत्र में लाना कठिन हो सकता है। अण्णा का दावा है कि ऐसा करने से भ्रष्टाचार मिटेगा। इसका मैकेनिज्म क्या होगा, यह शायद अण्णा को ही पता होगा। क्योंकि जब चेहरे पर ही वोट पड़ेंगे तो लोग जीतने के लिए वो तरीके भी अपना सकते हैं, जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। और फिर फोटो लगाने से चुनाव में पैसे की भूमिका कम कैसे होगी? किसी के चेहरे पर ईमानदार या भ्रष्ट होना नहीं लिखा होता। सुदर्शन चेहरे भी जम्हूरियत के कातिल हो सकते हैं। सत्ता का मद भले मानुसों को भी माफिया में बदल देता है।

भारत जैसे देशों में भ्रष्टाचार की असली वजह नैतिक ईमानदारी का टोटा है न कि कानूनों की कमी। अमूमन यहां ईमानदार वही होता है, जिसे भ्रष्टाचार का मौका नहीं ‍िमलता अथवा वह मिले मौके के दोहन का दुस्साहस नहीं कर पाता। राजनीतिक दल भी अपने नेताअो एवं कार्यकर्ताअोंके भ्रष्टाचार को अनदेखा इसलिए करते हैं, क्योंकि इस भ्रष्ट धन से ही सत्ता की दीवारें मजबूत होती हैं। इसी कारण पूरा तंत्र इतना निर्लज्ज और निर्भीक हो गया है कि भ्रष्टाचार के तालाब में कोई मछली बेदाग रहना भी चाहे तो वह तालाब से बाहर कर दी जाएगी या फिर तालाब उसे भी गंदा कर देगा। चुनाव चिह्न वाली वर्तमान व्यवस्था में व्यक्ति से ज्यादा संगठन की महत्ता है, भले ही वह किसी व्यक्ति विशेष द्वारा ही संचालित क्यों न हो। लेकिन अण्णा के सुझाव के मुताबिक अगर  राजनीतिक तत्वज्ञान पर प्रत्याशियों के चेहरे हावी होने लगेंगे तो एक नया कदाचार शुरू हो जाएगा। करप्शन को लकर अण्णा की चिंता जायज है, लेकिन उसे काबू में करने का उनका सुझाव नितांत अव्यवहारिक है। क्योंकि अगर कोई भ्रष्टाचार न करना ठान ले तो उससे करप्शन कैसे कराया जा सकता है ? भ्रष्टाचार रोकने अथवा कम करने के लिए जीवन शैली और सत्ता उपभोग के मापदंड भी बदलने होंगे, केवल चेहरे को चुनाव चिह्न बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा।

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