जब मंदारिन चीनी बनी पाक की तीसरी राजभाषा…!

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एक खबर जिसके जरिए पाकिस्तान को कूटा जा सकता था,  हाथ से जाती रही। मीडिया में इसका आगाज हो भी गया था, लेकिन जल्द ही साफ हुआ ‍कि बात वो नहीं है, जैसी बताई जा रही है। मामला पाकिस्तान में मंदारिन चीनी भाषा को राजभाषा का दर्जा देने का है। दो दिन पहले खबर उड़ी कि पाकिस्तान ने चीन के दबाव में अब चीनी भाषा को भी मुल्क की तीसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया है। इसके बाद पाकिस्तान और वहां की सरकार सोशल मीडिया में ट्रोल होने लगे। पहला हमला तो अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे और अब निर्वासित जिंदगी बिता रहे डाॅ. हुसैन हक्कानी ने किया। उन्होने तंज किया कि बीते 70 सालों में पाकिस्तान ने राजभाषा के रूप में उन भाषाअों को जगह दी, जो पाक में ज्यादातर लोगों की मातृभाषा नहीं है। अर्थात उर्दू, अंग्रेजी और अरबी। अब इसमें मंदारिन चीनी भी शामिल हो गई है। इसके बाद कई भारतीयों ने भी पाक को ट्रोल करना शुरू कर दिया कि यह फैसला साबित करता है कि पाकिस्तान चीन के कितने दबाव में है। कुछ ने कहा कि पाकिस्तान अब पूरी तरह चीन का गुलाम बन चुका है। पाकिस्तान में भी कई लोगों ने इस खबर पर नाराजी जताई। वे इसे पाकिस्तान के आत्मसम्मान से जोड़ कर देख रहे थे।

जिज्ञासा स्वाभाविक है कि ऐसी खबर उड़ी कैसे? बताया जाता है कि एक पाक चैनल ‘अब तक’( इसे ‘आज तक’ की नकल मान सकते हैं) ने एक खबर चलाई  कि पाक सीनेट ( संसद) ने एक प्रस्ताव पारित किया कि चीनी राष्ट्रभाषा मंदारिन चीनी को पाकिस्तान की राजभाषा भी बना दिया जाए ताकि इससे दोनो देशो के सम्बन्ध और घनिष्ठ हों तथा युवा चीनी सीखने के प्रति ज्यादा आकर्षित हों। समाचार एजेंसियां इस खबर को इस रूप में ले उड़ीं कि अब चीनी भी पाकिस्तान की अधिकृत राजभाषा होगी। कई लोगों ने इसमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक काॅरिडोर को मजबूत करने की मजबूरी को बूझा। यह भी कहा गया ‍िक पाकिस्तान के साथ साथ चीनी को पूरे दक्षिण एशिया में एक अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

चीन द्वारा पाक में बनाए जा रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक काॅरिडोर को लेकर भारत सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में शंकाएं हैं। क्योंकि पाक ने पाक अधिकृत कश्मीर का कुछ भाग इसके लिए चीन को दे दिया है। इस काॅरिडोर से पाक का कितना भला होगा, कहना मुश्किल है, लेकिन इसके जरिए चीन को सीधे हिंद महासागर तक पहुंचना आसान हो जाएगा, यह तय है। यह चीन की राजनीतिक, सै‍िनक और आर्थिक महत्वांक्षाअों की भरपाई का ही एक हिस्सा है। चूंकि पाकिस्तान को अमेरिकी मदद घटने से वह काफी कुछ चीन पर ही ‍निर्भर हो गया है, इसलिए भी मंदारिन चीनी को राजभाषा बनाने की खबर भी आग तरह फैली।

चीन अपना वैश्विक प्रभाव बढ़ाने के साथ अपनी भाषा को भी खूब प्रमोट कर रहा है। चीनियों में अंगरेजी न जानने अथवा कम जानने का अपराध बोध हम भारतीयों की तरह कभी नहीं रहा। चीन की राष्ट्रभाषा मंदारिन चीनी है, जो देश की बहुसंख्यक हान जाति की भी भाषा है। चीन के अलावा यह ताईवान, सिंगापुर, मकाअो, और हांगकांग की राजभाषाअों से एक है। लेकिन पाकिस्तान में उसे जानने वाले बहुत कम हैं। हालांकि खबर के साथ यह दावा भी ‍िकया गया कि चीन पाक के मजबूत होते सम्बन्धों के चलते पाकिस्तान में युवा चीनी सीखने की अोर उद्यत हो रहे हैं। हालांकि चीनी सीखना अंग्रेजी सीखने  की तुलना में काफी कठिन है।

पाकिस्तान में भी विरोध के स्वर इसलिए सुनाई दिए क्योंकि पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू वहां महज 8 फीसदी लोगों की मातृभाषा है। उच्च स्तर पर सरकारी काम अंग्रेजी में ही होता है, जो किसी की भी मातृभाषा नहीं है। इसके विपरीत देश में सबसे बोली जाने वाली पंजाबी या फिर सिंधी,बलूची अथवा पश्तो में से किसी को राजभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। इसको लेकर वहां सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कोई हल नहीं निकला। ऐसे में अनपेक्षित रूप से चीनी को राजभाषा का दर्जा मिलना वैसे ही था कि जैसे भारत में चीनी को भी अधिकृत भाषा की हैसियत मिल जाए।

मी‍डिया से उछली इस खबर पर लोगों ने इसलिए भी यकीन कर लिया कि चीन का पाक में दखल बढ़ता जा रहा है। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि चीन पाक को अपना उपनिवेश बनाना चाहता है। मंदारिन चीनी को राजभाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित करवाना उसी दिशा में एक गहरी चाल है। जब इस खबर पर बवाल मचा और भारत में पाकिस्तान की जमकर कुटाई होने लगी तो इस अर्द्धसत्य का सच सामने आया। पता चला कि प्रस्ताव सीनेट ने पारित जरूर किया था, लेकिन पाकिस्तान सरकार ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। हो सकता है कि पाकिस्तान सरकार ने पर्दे के पीछे से एक कंकड़ फेंक कर देखा हो कि कितनी लहरें उठती हैं और भारी विरोध के बाद उसका खंडन कर ‍िदया। यहां सवाल केवल इतना है कि भारत का अंध विरोध पाकिस्तान से क्या-क्या करवाएगा? साझा इतिहास तो वह नकारता ही है, क्या वर्तमान को नकारने के लिए चीनी को भी अपनाने में नहीं हिचकेगा? यूं एक भाषा के बतौर चीनी सीखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन पाक जो करता है, उसकी नीयत और चाल कुछ और ही होती है। ऐसा देश, जो अपना घर फुंकने से चिंतित होने के बजाए दूसरे का घर जलाकर खुश होता है। ऐसे में कल को चीनी भी पाक की राजभाषा बन जाए तो हमे बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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