दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग कठघरे में…

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दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा लाभ के पद के आरोप में बर्खास्त आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों की बहाली के बाद लोकतंत्र के पैरोकारों को देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर घुमड़ रहे काले बादलों से जुड़े सवालों पर गंभीर विमर्श करना होगा। इसके लिए किसी पुरावे की जरूरत नहीं है कि पूर्व चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती केन्द्र सरकार के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए चुनाव आयोग जैसी संस्था की तटस्थता और विश्वसनीयता को दांव पर लगा रहे थे। जोती ने इस कृत्य से न केवल चुनाव आयोग को लांछित किया है, बल्कि राष्ट्रपति को भी विवादों के घेरे में ले लिया है। विधायकों की अयोग्यता के आदेश पर अंतिम मुहर राष्ट्रपति की ही लगी थी।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने आरोपी विधायकों को अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं दिया। यह प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है। हाई कोर्ट ने आयोग से कहा है कि वह मामले पर पुनः सुनवाई करे और तद्नुसार फैसला ले। हाई कोर्ट के ये रिमार्क आयोग की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाले हैं कि उसने मौखिक सुनवाई के नियमों का ख्याल नहीं रखा। बहरहाल, इस खबर को सिर्फ बीस विधायकों की बहाली अथवा बर्खास्तगी के कैनवास में देखना लोकतांत्रिक गुस्ताखी होगी। यह महज दिल्ली के चुनाव में भाजपा अथवा कांग्रेस के चुनाव हारने-जीतने से जुड़ा मसला नहीं है। भाजपा खुश हो सकती है कि हाई कोर्ट ने आम आदमी के विधायकों को सिर्फ फौरी राहत दी है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस भी भाजपा की भाषा का इस्तेमाल कर रही है। यह कांग्रेस का राजनीतिक दीवालियापन है कि वह इस मुद्दे को दिल्ली की चार लोकसभा सीटों अथवा विधानसभा की सत्तर सीटों के दायरे से ऊपर नहीं देख पा रही है। चुनाव आयुक्त जोती का फैसला लोकतंत्र का बड़ा घोटाला है, जिस पर हाई कोर्ट ने मुहर लगाई है। हाई कोर्ट ने पुष्टि की है कि जोती ने बगैर समुचित सुनवाई के विधायकों की अयोग्यता का निर्धारण किया है। जोती इस सवाल के लिए जवाबदेह हैं कि उन्होंने विधायकों को सुनवाई का मौका क्यों नहीं दिया? ऐसी कौन सी हड़बड़ी या आपदा थी कि जोती को ताबड़तोड़ फैसला लेना पड़ा? सवाल मोदी-सरकार की भूमिकाओं की ओर इशारा करते हैं। भाजपा यूं राहत महसूस कर सकती है कि कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं के हनन के जीवंत मुद्दे को जनता की अदालत में पेश नहीं करते हुए दिल्ली की छोटी सी राजनीति में लिपटी हुई है।
मोदी-सरकार ने जोती जैसे व्यक्तिनिष्ठ अधिकारियों को छांट-छांट कर संवैधानिक संस्थाओं में ऊंचे पदों पर बिठाया है। जोती गुजरात में मोदी के मुख्य सचिव थे। 2013 में रिटायरमेंट के बाद मोदी ने राज्य का सतर्कता आयुक्त भी बनाया था। चुनाव आयुक्त के रूप में उनकी भूमिका पर उस वक्त भी सवाल उठे थे, जबकि उन्होंने उत्तराखंड के चुनाव के साथ गुजरात के चुनाव की घोषणा नहीं की थी, ताकि मोदी गुजरात में विकास योजनाओं की घोषणा कर सकें। बीस विधायकों की बर्खास्तगी को वो अपनी सेवानिवृत्ति के पहले सुनिश्चित करना चाहते थे। पर्यवेक्षकों के अनुसार विधायकों की बर्खास्तगी में जल्दबाजी की एक वजह यह भी थी कि केन्द्र-सरकार उस दरम्यान जारी सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों की पत्रकार वार्ता से उभर रहे सवालों को मीडिया की चर्चाओं में पीछे ढकेलना चाहती थी। जोती इस बात को बखूबी जानते थे कि उनके उत्तराधिकारी ओपी रावत सरकार की कुत्सित मंशाओं में कतई सहभागी नहीं होंगे…।
बहरहाल, जोती जैसे अधिकारी लोकतंत्र की परम्पराओं और मानदंडों को ताक में रख सरकार की राजनीति को साधने का काम कर रहे हैं। नोटबंदी के सवालों पर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की खामोशी इस श्रृंखला को आगे बढ़ाती है। नीति-आयोग की भूमिका पर उठने वाले सवाल भी इसी धुरी पर टिकते हैं। गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा-सरकारों के गठन में राज्यपालों की भूमिका भी लोकतंत्र की आत्मा को झंझोड़ने वाली है। मेघालय में भी राज्यपाल ने भाजपा की समर्थित सरकार बनाने में अलोकतांत्रिक योगदान दिया है।
आयोग की कार्यशैली पर लगे कलंक के काले टीके को पूरी तरह धो पाना वर्तमान चुनाव आयुक्त ओपी रावत जैसे ईमानदार और प्रतिबद्ध अधिकारी के लिए भी संभव नहीं है…। नीति, नीयत और प्रक्रियाओं की शुद्धता को सुनिश्चित करने का चमत्कारिक फिल्टर रावत जैसे अधिकारियों के पास है, लेकिन दिक्कत यह है कि वो भी (रावत) इस साल के अंत तक सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लोकतंत्र के आसन्न खतरों से निपटने की जिम्मेदारी आखिरकार जनता के कंधे पर ही आने वाली है।

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