‘पेरियार’ की मूर्ति तोड़ने के बाद भाजपा का राजनीतिक भूल-सुधार

 

मुद्दा यह नहीं है कि आज देश के किस हिस्से में, कौन से इलाके में भारत के इतिहास में अपना विशेष स्थान रखने वाले नेताओं की मूर्तियों को तहस-नहस किया जा रहा है? सवाल यह है कि इस नफरत की बुनियाद क्या है? अथवा दुनिया भर में एक विशिष्ट कालखंड में सारी दुनिया का विश्वास और सम्मान अर्जित करने वाले सामाजिक विचार और राजनीतिक दर्शन के इन प्रतिनिधि-प्रतीकों से भाजपा इतनी भयभीत क्यों है?
त्रिपुरा में जीत हासिल करने के बाद नार्थ त्रिपुरा के बेलोनिया में ब्लादिमिर लेनिन की साढ़े ग्यारह फुट ऊंची मूर्ति को ढहाने के बाद यह सवाल कौंधने लगा है कि भाजपा की हिन्दू-फिलॉसफी से मतभेद रखने वाले दीगर नेताओं के साथ सरकार क्या यही सलूक करने वाली है? मार्क्सवादी कार्यकर्ताओं के कार्यालयों और घरों में भारी तोड़फोड़ के जरिए यह संदेश देने की कोशिश नाजायज है कि भाजपा की यह जीत मार्क्सवादी और समाजवादी विचारधारा की पूर्णाहुति है। तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में रूढ़िवादी हिन्दुत्व के घोर विरोधी सामाजिक नेता ईवीआर रामास्वामी पेरियार की प्रतिमा को खंडित करने की कोशिशें किसी भी नजरिए से हिन्दू पुनरुत्थानवाद की इबारत लिखने में कामयाब नहीं होगी। पेरियार दलितों के हक में सवर्ण जातियों के अत्याचार के विरूद्ध सामाजिक आंदोलन के जनक माने जाते हैं। पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने की यह घटना तमिलनाडु के भाजपा नेता एच राजा के भड़काऊ ट्वीट के कुछ घंटों बाद सामने आई थी।
लेनिन और पेरियार की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने वाले राजनीतिक कृत्य आग भड़काने वाले हैं। इसकी पहली प्रतिक्रिया कोलकाता में देखने को मिली, जहां जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मूर्ति के साथ बदसलूकी की घटना हुई। उत्तर प्रदेश के विभिन्न नगरों में बाबा साहब अम्बेडकर की मूर्तियों पर हमले भी तनाव बढ़ाने वाले हैं।
भारत वैसे ही मूर्ति पूजक देश है। ब्लादिमिर लेनिन बाहरी हो सकते हैं, लेकिन पेरियार, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर और डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी तो अपनी जमीन के पुरखे हैं। उनकी मूर्तियों के साथ खिलवाड़ राजनीतिक-स्वार्थों की पराकाष्ठा है इन नेताओं की सूची में गांधी-नेहरू जैसे नाम भी जुड़ सकते हैं। हिन्दुत्व की कट्टर विचारधारा की प्रवर्तक हिन्दू महासभा गांधी की गौरव-गाथा की तुलना में नाथूराम गोडसे की काली-कथाओं की प्रवक्ता के रूप में सक्रिय है। मौजूदा सरकार के शीर्ष पुरुष नरेन्द्र मोदी जवाहरलाल नेहरू की तुलना में सरदार पटेल के गुणों के ग्राहक हैं, खुद को उनका राजनीतिक-अवतार मानते हैं, तो इसके क्या मायने यह है कि नेहरू की मूर्तियों को उखाड़ फेंकने का सिलसिला भी शुरू होने वाला है?
भारत में कदाचित ही कोई नगर होगा, जहां इन नेताओं की मूर्तियां नहीं होंगी। भारत की सामाजिक और आर्थिक तंगदिली और अन्याय का निराकरण इनके सियासी सोच का आधार रहा है। हिन्दुत्व के नाम पर नफरत की जो बुनियाद आज रखी जा रही है, वो शुभ नहीं है। राजनीतिक पसंद और नापसंद के तराजू पर इन लोगों को तौलना मुनासिब नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता के गरूर को काबू में रखना जरूरी है। सरकार के शपथ लेने के पहले ही प्रतिशोध की तलवारें म्यान से निकलना लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
भले ही राजनीतिक नफे-नुकसान की दृष्टि से मूर्ति तोड़ने के मसले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सख्त रवैय्या अख्तियार कर लिया हो, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मौन-स्वीकृति के बाद ही यह काम शुरू हुआ था। त्रिपुरा में लेनिन की दो मूर्तियों और कोई डेढ़ हजार विरोधियों की सम्पत्ति को तोड़ने-फोड़ने के बाद चौबीस घंटे तक भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की खामोशी शाबासी बनकर इस कृत्य के लिए कार्यकर्ताओं की पीठ थपथपाती रही। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव के ट्वीट में इठलाता आल्हाद गौरतलब है कि ’यह मूर्ति-भंजन परिवर्तन का सूचक है।’ ट्वीटर पर त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय का चिहुंक उठना गवाही देता है कि सब कुछ सुनियोजित था। तथागत राय ने ट्वीट किया था कि- ’जो काम एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार कर सकती है, उस काम को एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार ही नष्ट कर सकती है…।’ समझना मुश्किल नहीं है कि पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने के बाद भाजपा नेतृत्व को समझ आया कि राजनीतिक दृष्टि से यह सब बहुत ही नुकसानदेह है।

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