मीडिया पर पूंजी के ‘एकाधिकार’ और सरकार के ‘सर्वाधिकार’ का फंदा

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मध्य प्रदेश और बिहार में तीन पत्रकारों की सरेआम हत्या और मीडिया घरानों के खिलाफ कोबरा-पोस्ट के सनसनीखेज स्टिंग-ऑपरेशन की इबारत सीधे-सीधे मीडिया के बेबस बदनुना हालात को बंया करती है। घटनाएं कह रही हैं कि अभिव्यक्ति के मासूम परिन्दों को झपटने के लिए आकाश में गिध्दों की फौज ने मोर्चा संभाल लिया है और उनको ताकत देने के लिए सत्ता के चौपाये कानून की जमीन पर पूरी चौकसी के साथ तैयार है। भिंड के पत्रकार संदीप शर्मा सहित बिहार के दो पत्रकारों की हत्या खनिज-माफिया और राजनेताओं की अंतरंग तस्वीर का खूनी तर्जुमा है, जबकि कोबरा-पोस्ट का स्टिंग-ऑपरेशन इस बात की ताकीद है कि मीडिया की अपनी ही धमनियों में बहने वाला काला खून आत्मघाती हो चुका है।
इस महामारी का इलाज ग्वालियर में हमारे पुराने साथी राकेश पाठक के अलावा डॉ. राम विद्रोही, राकेश अचल, डॉ. केशव पांडे, राजेंद्र श्रीवास्ताव, डॉ. सुरेश सम्राट और सुरेश दंडोतिया जैसे पत्रकारों की नुमाइंदगी में निकलने वाले पत्रकारों और गणमान्यत नागरिकों के जुलूस या प्रदर्शन नहीं हैं। मीडिया के दमन के जगजाहिर इरादों के खिलाफ ग्वालियर के पत्रकारों और रचनाधर्मियों की मुफस्सिल या आंचलिक कोशिशों को नया आकाश देने की जरूरत है। पत्रकार संदीप शर्मा के मामले में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि पत्रकार व्दारा सुरक्षा मांगने के बावजूद उसे सुरक्षा नहीं देना राज्य-सरकार की लापरवाही है। नोटिस राजनीति के कलुषित चेहरे को संवेदनशीलता के मेकअप से ढंकने की कोशिश है, जबकि राज्य शासन व्दारा सीबीआय जांच की घोषणा विवादों की गेंद को नवम्बर, 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव की देहरी के पार फेंकने की योजना है।
भारत की मौजूदा आबोहवा मीडिया के लिए कतई सेहतमंद नहीं है। पत्रकारों की हत्याओं के आपराधिक षडयंत्र और कोबरा-पोस्ट के स्टिंग-ऑपरेशन में मीडिया घरानों के स्वार्थपरक खुलासे दर्शाते हैं कि सूचना के माध्यम गहरे प्रदूषण की चपेट में हैं। सोमवार को दिल्ली के खोजी न्यूज पोर्टल कोबरापोस्ट ने एक स्टिंग-ऑपरेशन के जरिए खुलासा किया कि देश के कुल 17 बड़े और चर्चित मीडिया संस्थानों के सेल्स-प्रमुख पैसों के बदले हिंदूवादी एजेंडा की रिपोर्टों को छापने और प्रसारित करने के लिए तैयार थे। कोबरापोस्ट व्दारा जारी वीडियो-फुटेज में 7 न्यूज-चैनल, 6 बड़े अखबारों, 3 वेब पोर्टल और 1 न्यूज एजेंसी के सेल्स-प्रमुखों से सौदेबादी को दिखाया गया था। जैसा कि अपेक्षित था, ज्यादातर मीडिया-संस्थानों ने इस स्टिंग ऑपरेशन को नकार दिया है, लेकिन जो मीडिया के भीतर काम कर रहे हैं, वो इसके सच से भलीभांति वाकिफ और मुतमुईन हैं। मीडिया पर पूंजी के प्रभुत्व के बाद पत्रकारिता का मिजाज और सरोकार टूटने लगे हैं। मीडिया पर पूंजी की मार से ज्यादा खतरनाक पॉवर की मार सिध्द हो रही है। मीडिया-घरानों की व्यापारिक-प्रतिस्पर्धा में पत्रकारिता के तकाजों को एक दम दरकिनार करना संभव नहीं हो पा रहा था, लेकिन सत्ता के ‘पॉवर-गेम’ ने तो पत्रकारिता का परिदृश्या ही बदल दिया है। मीडिया पर पूंजी के ‘एकाधिकार’ के बाद सरकार के ‘सर्वाधिकार’ की कोशिशों ने लोकतंत्र के मुलायम और लचीले रेशमी ‘फेब्रिक्स’ को निरंकुशता के ‘प्लास्टिक-रेयॉन’ में बदल दिया है। जिसकी चुभन असहनीय हो चली है। सरकार और समाज के एटीट्यूड में भी कांटे उग आए हैं।
मीडिया को मसलने की इन सुनियोजित कोशिशों की स्क्रिप्ट को ध्यान से पढ़कर मीडिया को लोकतंत्र और समाज के हित में अपने हकों की लड़ाई लड़ना होगी। लोकतंत्र की आत्मा को बरकरार रखने की कोशिशों को नए तकाजों में ढालना होगा, क्योंकि मीडिया की लड़ाई का स्वरूप बदल चुका है। दिक्कत यह है कि सियासत की धूल-धूसरित फिजाओं के अक्स कह रहे हैं कि मीडिया के गले के नजदीक फांसी के फंदों के काले साये हदों को पार कर चुके हैं। समाज की वह आत्मा भी दरक चुकी है, जो कभी मीडिया का वकील भी थी, दलील भी थी और अपील भी थी। मीडिया और समाज के बीच सरोकारों का टूटना खतरनाक है, क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे के लिए बने हैं और एक-दूसरे के बिना गूंगे-बहरे हैं। यदि लोकतंत्र की इस लड़ाई में मीडिया और समाज एक-दूसरे के पूरक नहीं बने तो निरंकुश राजसत्ता की हवस संविधान को भी दरकिनार कर देगी।

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