मोदी-राज में ‘तिलों’ की चाहत में लोकतंत्र के ‘पहाड़ों’ की खुदाई…

 

अखबारों के ये शीर्षक मन में जुगुप्सा पैदा करने वाले हैं कि ’मेघालय में दो सीटें जीतने के बावजूद भाजपा एनडीए की सरकार बनाएगी …,’ अथवा ’2 के दम पर जुटाया 34 का समर्थन…।’ भाजपा में मोदी-सरकार और अमित शाह की सल्तनत में वह सब हो सकता है, लोकतंत्र के हित में संविधान जिन कामों के लिए निषेधाज्ञा जारी करता है। लोकतंत्र में जायज-नाजायज की सीमा रेखाएं उनके लिए महत्वहीन हैं अथवा पांच-दस साल पहले अटल-आडवाणी की भाजपा जिस लोकतंत्र की दुहाई देती रहती थी, वह उनके लिए अर्थहीन है। सभी जानते हैं कि केन्द्र-सरकार की फूंक के बिना ‘2’ जैसे दुमछल्ले आंकड़े को इतना ताकतवर नहीं बनाया जा सकता था कि वो ’स्पाइडर मैन’ की तरह छलांग लगाकर 34वीं मंजिल पर पहुंच जाए…।
चाहे जैसे, कांग्रेस मुक्त और प्रति-विचार मुक्त भारत की तलाश में जुटी मोदी-सरकार निर्धारित ’माइल-स्टोन’ के पूर्णांक से 8 अंक पीछे है। उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों को एनडीए की सत्ता में तब्दील करने के बाद देश के 21 राज्यों में उनकी सरकारें बन चुकी हैं, जबकि कुल राज्यों की संख्या उन्तीस है। उल्टी गिनती शुरू होने के पहले उनका 8 सीढ़ियां चढ़ना बाकी है। ये सीढ़ियां वो कैसे चढ़ेंगे अथवा यह फासला कैसे नापेंगे? मेघालय जैसे छोटे से राज्य में मोदी सरकार की ताजा पेशकश इसका नमूना है कि सत्ता के शिखर हासिल करने के लिए उनका रोड मैप क्या है?
मेघालय में सरकार बनाने का अलोकतांत्रिक कारोबार दुर्योधन की उन मनोवृत्तियों की पुनर्स्थापना है कि ’पांडवों को पांच गांव तो क्या, सुई की नोक जितनी जमीन भी नहीं दूंगा…।’ मेघालय में कांग्रेस के दावे का खारिज करना इसी मनोवृत्ति को दर्शाता है। मार्च 2017 में भाजपाई-राज्यपालों ने गोवा और मणिपुर में बड़ा दल होने के बावजूद कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया था। साल भर बाद मेघालय में भी वही इतिहास दोहराया जा रहा है। मोदी सरकार की यह मनोवृत्ति ’पोलिटिकल-ग्रीड’ या सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा है। यह कदम दर्शाता है कि सुई की नोक जितनी सत्ता छोड़ना भी उन्हें कबूल नहीं है।
उत्तर-पूर्व में जीत के जश्न में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि विपक्ष को हार को भी पचाना सीखना चाहिए। लोकतंत्र में परिवर्तन खिलाड़ी भावना से मंजूर करना चाहिए। मोदी का यह कथन ’पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की श्रेणी में आता है। यदि कांग्रेस या विपक्षी दलों को हारना सीखना है, तो भाजपा को भी जीतने के बाद सत्ता के मद को पचाना सीखना होगा। गोवा और मणिपुर जैसे तिल जितने राज्यों के बाद मेघालय में सत्ता के छोटे से स्वर्ण मृग का शिकार नैतिक तकाजों के लिए चुनौती है। जीतने की हवस और जीतने के हौसले में फर्क होता है। हवस मर्यादा और अनुशासन को नकारती है, जबकि हौसला नियमों को बुलंद करता है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को भाजपा आज तक पचा नहीं पाई है। दिल्ली में उसे मात्र तीन सीटें मिली थीं और मेघालय में वह बमुश्किल दो सीटें ही जीत सकी है। केजरीवाल सरकार के प्रति केन्द्र-सरकार का दुराग्रहपूर्ण रवैया किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली-सरकार को अराजक और अपरिपक्व सिद्ध करने के लिए केन्द्र हर प्रकार के हथकंडों का इस्तेमाल कर रहा है। यह भी सोचना होगा कि क्या मेघालय में दो सीटों पर छोटी सी जीत को सरकार में तब्दील करना जीतने की हवस का प्रतीक है?
लोकतंत्र की राहों में कलह के कांटे देश की उम्मीदों को लहुलुहान कर रहे हैं। विपक्ष ही नहीं, भाजपा का एक समझदार तबका भी महसूस कर रहा है कि राजनीति में कटुता और कर्कशता के काले धागों की बुनावट से बचना जरूरी है। प्रतिशोध के राजनीतिक-स्ट्रक्चर का स्वभाव कभी नहीं बदलता है। लोकतंत्र की सेहत के लिए जरूरी है कि प्रतिशोध की तलवारें म्यान में ही रखी रहें…।
लोकतंत्र में सहिष्णुता की इबादत, प्रति-विचार के लिए सम्मान का दौर अब अतीत में डूब रहा है। मोदी-राज में लोकतांत्रिक राजनीति की फिलॉसफी अब लैला-मजनुओं की कहावत या राजे-राजवाड़ों के उस नीति-वाक्य का अनुसरण और अनुमोदन भर रह गई है कि ’युद्ध और प्यार’ में सब कुछ जायज है। भारत के विशाल राजनीतिक-परिदृश्य में यह फिलॉसफी नाजायज ही नहीं, बल्कि आत्मघाती भी है। धूल-मिट्टी और कीचड़ से लोकतंत्र के माथे पर मंगल-तिलक करना संभव नहीं है। इसके लिए आदर्शों और मर्यादाओं की रोली जरूरी है।
भाजपा बचाव में कांग्रेस की काली करतूतों को कवच की तरह इस्तेमाल कर रही है। लेकिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी को बदलाव के लिए चुना था, दुहराव के लिए नहीं…। दिल्ली के सम्राट का सीना सिर्फ जुमलों में ही 56 इंच का नहीं होना चाहिए। लोगों को महसूस करना चाहिए कि 56 इंच के सीने में दिल भी बड़ा है, और वह लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी भी है…।

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