‘रॉक-स्टार’ राजनीति में ‘सादगी’ रोल-मॉडल कैसे हो सकती हैं?

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भाजपा से हारने के बाद भी त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणक सरकार की सादगी, शालीनता और ईमानदार शख्सियत के बारे में मीडिया लगातार कुछ न कुछ लिख रहा है। सोने के तख्त पर विराजमान राजनीति के वर्तमान दौर में एक आदर्श के रूप में माणिक सरकार का उल्लेख उम्मीदों को हरा करता है कि समाज के एक कोने में सार्वजनिक जीवन में शालीनता, सादगी और ईमानदारी की चाहत अभी भी बची है। इसका सुखद पहलू यह भी है कि लोगों के जहन में अपने देश-प्रदेश के उन लोगों की यादें ताजा हो उठी हैं, जो किसी न किसी रूप में माणिक सरकार की प्रतिकृति माने जा सकते है। माणिक सरकार के बहाने ईमानदारी और सादगी में पगी उन राजनीतिक-हस्तियों के पुनर्स्मरण से जाहिर होता है कि एक लौ बाकी है, जो तूफानों के बीच अभी बुझी नहीं है। ‘सुबह सवेरे’ के वरिष्ठ संपादक अजय बोकिल ने माणिक सरकार के बाद 12 मार्च को जब मध्यभारत के पहले मुख्यमंत्री लीलाधरजी जोशी के व्यक्तित्व की सादगी और ईमादारी को याद क्याी किया, लोगों के जहन में पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री, उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त जैसे नेताओं के नाम उभऱने लगे।
देश के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक सईद नकवी ने माणक सरकार के एक ऐसे संस्मरण का उल्लेख किया है, जो भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे की यादों को ताजा कर देता है। सईद नकवी ने त्रिपुरा-प्रवास के दौरान माणिक सरकार से जानना चाहा था कि उनके राज्य में बड़े होटल न होना क्या सरकारी नीति का हिस्सा है ? माणिक सरकार का कहना था कि ‘पांच सितारा होटल, बार-रेस्तरां खुलने से सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और हम यह असंतुलन लेकर नहीं चल सकते हैं।’ इसी मिलता-जुलता सवाल मैंने मध्य प्रदेश में पटवा-सरकार (1990-1992) के कार्यकाल में ठाकरेजी से पूछा था कि सरकार विधायकों को भी वाहन और आवास जैसी सुविधाएं क्यों नहीं उपलब्ध कराती है, ताकि वो अपने क्षेत्रों में ठीक से काम कर सकें? ठाकरे जी कहना था कि इससे विधायक, कार्यकर्ता और आम-लोगों के बीच दूरियां और विषमताएं बढ़ती हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि इन नेताओं की बिरादरी और वल्दियत के आगे भले ही कांग्रेस, भाजपा या कम्युनिस्ट लिखा हो, लेकिन उनकी सादगी, शालीनता और ईमानदारी का डीएनए एक था। माणिक सरकार घोर कम्युनिस्ट थे और ठाकरे ठेठ दक्षिणपंथी राजनीतिक-बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते थे। देश की सर्वशक्तिमान पार्टी भाजपा का प्रमुख होने के बावजूद कुशाभाऊ ठाकरे की जिंदगी लोहे की छोटी सी पेटी में रखे दो जोड़ धोती-कुर्ते में सिमटी थी। विचार-धाराओं में जानलेवा वैमनस्य और विभिन्नता के बावजूद उनके सोचने-समझने और जीने के ‘बेसिक्स’ एक जैसे थे। सोचना होगा कि यह कौन सा जज्बा है, जो विपरीत ध्रुवों पर सक्रिय लोगों की जीवन-शैली और मिजाज को एकलय और एकरंग में ढालता है।
राजनीति में इन हस्तियों का होना नमी पैदा करता है, लेकिन किस्सों का सिलसिला जहन को झकझोरता है कि भीतर तक अभिभूत करने वाले ये शख्स वर्तमान राजनीति में क्या हमारा रोल-मॉडल बन सकेंगे…? अथवा रोल-मॉडल क्यों नहीं हो सकते…? रोल-मॉडल के रूप में ऐसे नेताओं की चौतरफा तलाश दहशत पैदा करती है कि सत्ता के स्वर्ण-मृगों के पीछे भागते वर्तमान राजनेता मधुवनों के तपस्वी जैसे तेवर कैसे अख्तियार कर सकेंगे…? असुरों से घिरी सत्ता की यज्ञशाला में क्या सेवा के गायत्री-मंत्र का सामूहिक पाठ संभव है…?
राजनीति के टाकिंग-पॉइंट ही बदल गए है। राजनीति के मौजूदा फार्मेट में, जबकि मीडिया या समाज के देखने और समझने के तौर-तरीको में 360 डिग्री बदलाव आया है, मूल्य-आधारित राजनीति की कल्पना बेमानी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चार वर्षों में चालीस साल पुरानी राजनीति को उलट दिया है। माणिक सरकार या ठाकरे जैसे पुराने नेताओं की यादें लोरी की गुनगुनाहट और मिठास का एहसास हैं, जो आजादी के बचपन के साथ पुराने समय की बात हो चुकी है। रॉक-स्टार के नए दौर में राजनीति का रोल-मॉडल मोदी जैसे नेता ही हो सकते है, जिनके नाम से बाजार में जैकेट और कुरते बिकते हैं अथवा जिनकी ब्राण्ड-वेल्यू में अंबानी-अडानी चार चांद लगाते हैं।

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